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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १११ भावार्थ—शराबसे भरे हुए मणिमय पात्र और अमृतसे पूर्ण मिट्टी- के बर्तनको देखकर जरा विवेकपूर्वक विचारकर कहो कि इन दोनोंमें किसका त्याग करना चाहिये और किसका ग्रहण ? (तात्पर्य यह कि उत्तम वस्तु सामान्य स्थानमें हो तो भी उसे लेना चाहिये, परंतु बुरी वस्तु उत्तम स्थानमें हो तो भी उसका त्याग ही करना चाहिये)॥३५१॥ प्रीति और वैर की तीन श्रेणियाँ उत्तम मध्यम नीच गति पाहन सिकता पानि । प्रीति परिच्छा तिहुन की बैर बितिक्रम जानि ॥३५२॥ भावार्थ—प्रीतिकी परीक्षामें उत्तम, मध्यम और नीच—इन तीनोंकी स्थिति क्रमशः पत्थर, बालू और जलके समान है (अर्थात् उत्तम पुरुषकी प्रीति पत्थरकी लीकके समान अमिट है, मध्यम मनुष्य- की प्रीति बालूकी रेखाके समान—दूसरी हवा न लगनेतक ही है और नीचकी प्रीति तो जलकी लकीरके समान है। जैसे अँगुलीसे जलमें लकीर करते जाइये, साथ-ही-साथ वह मिटती चली जायगी, ऐसे ही नीचकी प्रीति तत्काल नष्ट हो जाती है); परंतु वैर इसके विपरीत (उत्तम पुरुषका जलकी लकीरके समान तत्काल नष्ट होनेवाला, मध्यमका बालूकी रेखाके समान कुछ समयतक रहनेवाला और नीच- का पत्थरकी लकीरके सदृश चिरस्थायी होता है) ॥ ३५२ ॥ जिसे सज्जन ग्रहण करते हैं उसे दुर्जन त्याग देते हैं पुन्य प्रीति पति प्रापतिउ परमारथ पथ पांच । लहहिं सुजन परिहरहिं खल सुनहु सिखावन साँच ॥३५३॥ भावार्थ—पुण्य, प्रेम, प्रतिष्ठा, प्राप्ति (लौकिक लाभ) और परमार्थका पथ—इन पाँचोंका सज्जनगण तो ग्रहण करते हैं और दुष्टलोग त्याग देते हैं। इस सच्ची सीखको सुनो ॥ ३५३ ॥

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