भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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११८ दोहावली जलचर थलचर गगनचर देव दनुज नर नाग । उत्तम मध्यम अधम खल दस गुन बढ़त बिभाग ॥३४८॥ भावार्थ—जलमें रहनेवाले, स्थलपर रहनेवाले और आकाशमें विचरनेवाले जीवों तथा देवता, राक्षस, मनुष्य और नाग—इन सब योनियोंमें उत्तमकी अपेक्षा मध्यम, मध्यकी अपेक्षा अधम और अधमकी अपेक्षा नीच—दुष्ट प्राणियोंकी संख्या दसगुनी अधिक हो जाती है (उत्तमसे मध्यम दसगुने, मध्यमसे अधम दसगुने और अधमसे नीच दसगुने हैं, उत्तम बहुत ही थोड़े हैं) ॥ ३४८ ॥ बलि मिस देखे देवता कर मिस मानव देव । मुए मार सुबिचार हत स्वारथ साधन एव ॥३४९॥ भावार्थ—बलिदानके बहाने देवताओंको और राज्य-कर (दण्ड) के बहाने राजाओंको देख लिया। दोनों ही स्वार्थ साधनेवाले विचारशून्य और मरेको ही मारनेवाले हैं ॥ ३४९ ॥ सुजन कहत भल पोच पथ पापि न परखइ भेद । करमनास सुरसरित मिस बिधि निषेध बद बेद ॥३५०॥ भावार्थ—कर्मनाशा और गङ्गाजीके बहाने जैसे वेद विधि और निषेध दोनों तरहके कर्मोंका वर्णन करते हैं (कर्मनाशामें नहानेका निषेध है और गङ्गास्नानकी विधि है) वैसे ही सत्पुरुष [ग्रहण और त्यागके लिये] भले-बुरे दोनों ही मार्ग बतलाते हैं, परंतु पापी मनुष्य इस भेदको नहीं समझते ॥ ३५० ॥ वस्तु ही प्रधान है, आधार नहीं मनि भाजन मधु पारई पूरन अमी निहारि । का छांड़िअ का संग्रहिअ कहहु बिबेक बिचारि ॥३५१॥