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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली ११७ भलाई करना बिरले ही जानते हैं ग्यान अनभले को सबहि भले भलेहू काउ । सींग सूँड़ रद लूम नख करत जीव जड़ घाउ ॥३४५॥ भावार्थ—बुराई करनेका ज्ञान तो सभीको है, परंतु भलाईका ज्ञान तो कभी किसी भलेको ही होता है। मूर्ख जानवर (गैंडा, हाथी, सिंह, चँवरी गाय, बंदर आदि) अपने सींग, सूँड़, दाँत, पूँछ तथा नख इत्यादिसे दूसरोंको चोट ही पहुँचाते हैं [उनसे भलाई करना नहीं जानते ]॥ ३४५ ॥ संसारमें हित करने वाले कम हैं तुलसी जग जीवन अहित कतहूँ कोउ हित जानि । सोषक भानु कृसानु महि पवन एक घन दानि ॥३४६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जगत्में जीवोंका अहित करनेवाले बहुत हैं, हित करनेवाला तो कहीं कोई एकाध ही जानो । सूर्य, अग्नि, पृथ्वी, पवन सभी जलको सुखानेवाले हैं, देनेवाला तो एक बादल ही है॥ ३४६ ॥ सुनिअ सुधा देखअहिं गरल सब करतूति कराल । जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ॥३४७॥ भावार्थ—अमृत तो केवल सुननेमें ही आता है; परंतु विष जहाँ-तहाँ प्रत्यक्ष देखे जाते हैं । विधाताके सभी काय विकराल हैं । कौए, उल्लू और बगुले जहाँ-तहाँ (सर्वत्र) दिखायी देते हैं, परंतु हंस तो केवल एक मानसरोवरमें ही मिलते हैं [दूसरोंकी बुराई करने- वाले नीच सभी जगह मिलते हैं, परंतु परहितमें लगे हुए संत तो सत्सङ्गमें ही मिलते हैं] ॥३४७॥

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