दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ दोहावली मरते इसी बातकी सीख दे गये हैं (जटायुने सीताके छुड़ानेके प्रयत्न- में परोपकारार्थ प्राण छोड़े और मारीचने मरते समय भी रामके-से स्वरमें 'हा लक्ष्मण' कहकर सीताजीको धोखा दिया) ॥३४१॥ सज्जन और दुर्जनका भेद सुजन सुतरु बन ऊख सम खल टाँकिफा रुखान । पर हित अनहित लागि सब साँसति सहत समान ॥३४२॥ भावार्थ—सज्जन पुरुष सुन्दर (लाभकारी) कपास और ऊखके पौधेके समान हैं और दुर्जन टाँकी और रुखानीके* समान । सज्जन और दुर्जन दोनों ही समान रूपसे कष्ट सहते हैं; परंतु सज्जन सहते हैं पराये हितके लिये और दुष्ट दूसरोंके अहितके लिये ॥३४२॥ पिअहिं सुमन रस अलि बिटप काटि कोल फल खात । तुलसी तरुजीवी जुगल सुमति कुमति की बात ॥३४३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि [भ्रमर और भील दोनों ही वृक्षोंके सहारे जीते हैं, किंतु] भ्रमर फूलोंका रस ही पीते हैं (फूलोंको भी नहीं चुनते) और कोल-भील वृक्षको काटकर उसका फल खाते हैं। यह सुबुद्धि और कुबुद्धिकी बात है ॥३४३॥ अवसरकी प्रधानता अवसर कौड़ी जो चुकै बहुरि दिएँ का लाख । दुइज न चंदा देखिएँ उदौ कहा भरि पाख ॥३४४॥ भावार्थ—आवश्यकताके समय मनुष्य यदि कौड़ी देनेमें भी चूक जाय तो फिर [अनावश्यक बिना मौके] लाख रुपया देनेसे भी क्या होता है ? द्वितीयाके चन्द्रमाको न देखा जाय तो फिर पक्षभर चन्द्रमा उदय होता रहे, उससे क्या होगा ? ॥३४४॥ *बढ़इयोंका लोहेका एक औजार।