दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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नीच मनुष्य अपनी नीचताको नहीं छोड़ता। चन्दनके वृक्षोंमें निवास करके भी साँप विषरहित नहीं हुए ॥३३७॥ भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु । सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु ॥३३८॥ भावार्थ—भला आदमी अपनी भलाईसे और नीच अपनी नीचता- से ही शोभा पाता है। अमृतकी प्रशंसा इसलिये की जाती है कि वह अमरत्व प्रदान करता है, और विष वही सराहनीय है जिससे [शीघ्र और सहज ही] मृत्यु हो जाय ॥३३८॥ मिथ्या माहुर सज्जनहि खलहि गरल सम साँच । तुलसी छुवत पराइ ज्यों पारद पावक आँच ॥३३९॥ भावार्थ—सज्जन पुरुषके लिये असत्य विष है और दुष्टके लिये सत्य विषके समान है। सज्जन असत्यको और दुष्ट सत्यको छूते ही वैसे ही भाग जाते हैं जैसे अग्निकी आँच लगते ही पारा उड़ जाता है ॥३३९॥ सत्संग और असत्संगका परिणामगत भेद संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ । कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥३४०॥ भावार्थ—संतोंका सङ्गमोक्ष (भवबन्धनसे छूटने) का और विषयी पुरुषोंका सङ्ग संसारबन्धनमें पड़नेका मार्ग है। इस बातको संत कवि ज्ञानी और वेद-पुराणादि सद्ग्रन्थ सभी कहते हैं ॥३४०॥ सुकृत न सुकृती परिहरइ कपट न कपटी नीच । मरत सिखावन देइ चले गीधराज मारीच ॥३४१॥ भावार्थ—पुण्यात्मा पुरुष अपने पुण्यको और नीच, कपटी मनुष्य अपने कपटको मरते दमतक नहीं छोड़ते। जटायु और मारीच मरते-