दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ दोहावली जाता है, परंतु वास्तवमें उसकी स्वाभाविक टेढ़ी चाल नहीं मिटती] ॥३३४॥ कृसधन सखहि न देब दुख मुएहुँ न मागब नीच। तुलसी सज्जन की रहनि पावक पानी बीच ॥३३५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सज्जनोंकी स्थिति ऐसी हो जाती है जैसे आग और पानीके बीचमें रहना। वे थोड़ी पूँजीवाले मित्रसे तो धन माँगकर उसे कष्ट नहीं देंगे (ऐसा करनेमें उन्हें अग्निमें जलनेके समान पीड़ा होती है) और धनवान् नीच मनुष्यसे वे मरनेपर भी (अत्यन्त विपत्तिमें भी) नहीं माँगेंगे (क्योंकि उससे माँगना उन्हें जलमें डूब जानेके समान प्राणघातक प्रतीत होता है। अतः वे अभावका कष्ट ही सहते रहते हैं) ॥३३५॥ संग सरल कुटिलहि भएँ हरि हर करहिं निबाहु। ग्रह गनती गनि चतुर बिधि कियो उदर बिनु राहु ॥३३६॥ भावार्थ—सरल (सज्जन) और कुटिल (दुष्ट) का साथ हो जानेपर भगवान् विष्णु और शिव ही निर्वाह (रक्षा) करते हैं। राहुके ग्रहोंकी गणनामें गिने जानेपर चतुर ब्रह्माने उसको बिना पेटका बना दिया (यदि वह पेटहीन न होता तो उसका तथा अन्य ग्रहका सङ्ग निभता ही नहीं; क्योंकि वह दुष्ट ग्रह होनेके कारण साथी सरल ग्रहोंको कभी खा डाले होता) ॥३३६॥ स्वभावकी प्रधानता नीच निचाई नहिं तजइ सज्जनहू कें संग। तुलसी चंदन बिटप बसि बिनु बिष भए न भुअंग ॥३३७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सज्जनका सङ्ग होनेपर भी