दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ११३ करते हैं) और अच्छी तरह बना-बनाकर बातें करते हैं, परंतु उनके हृदयमें कपट भरा रहता है। ऐसे लोगोंसे दिल खोलकर कैसे मिला जाय ! (तात्पर्य यह है कि आजकल लोग ऊपरसे चिकनी-चुपड़ी बातें बनाना और देखनेमें सभ्यताका व्यवहार करना तो सीख गये हैं, परंतु उनके हृदयमें सरल प्रेम नहीं है; वे उस मयूरके समान हैं, जिसका शरीर बड़ा ही मनोहर और वाणी अत्यन्त मधुर होती है; परंतु जो हृदयका इतना कठोर होता है कि बड़े-बड़े जहरीले साँपों- को निगल जाता है) ॥३३२॥ कपट अन्ततक नहीं निभता चरन चोंच लोचन रँगौ चलौ मराली चाल । छीर नीर बिबरन समय बक उघरत तेहि काल ॥३३३॥ भावार्थ—बगुला चाहे अपने चरण, चोंच और आँखोंको हंसकी तरह रँग ले और हंसकी-सी चाल भी चलने लगे; परंतु जिस समय दूध और जलको अलग-अलग करनेका अवसर आता है, उस समय उसकी पोल खुल जाती है ॥३३३॥ कुटिल मनुष्य अपनी कुटिलताको नहीं छोड़ सकता मिलै जो सरलहि सरल ह्वै कुटिल न सहज बिहाइ । सो सहेतु ज्यों बक्र गति ब्याल न बिलहिं समाइ ॥३३४॥ भावार्थ—कुटिल मनुष्य अपने स्वभावको नहीं छोड़ सकता । यदि वह किसी सरलहृदय पुरुषसे सरल होकर मिलता भी है तो समझ लेना चाहिये कि उसके ऐसा करनेमें कोई-न-कोई हेतु अवश्य है। जैसे साँप टेढ़ी चालसे बिलमें नहीं घुस सकता [इसलिये बिलमें घुसनेके लिये वह उस समय टेढ़ी चाल छोड़कर सीधा हो