भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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१०८ दोहावली भावार्थ—सभी यह कहते हैं कि प्रेम और प्रियतम दोनों ही सुलभ (सस्ते) हैं और सब ऐसा करते भी हैं (किसीको प्रियतम बनाकर उससे प्रेम करते हैं), परंतु तुलसीदासजी कहते हैं कि [सच्चे प्रेमके नाते] मछलीसे बढ़कर पवित्र तीनों लोकोंमें दूसरा कोई नहीं है (मछली जलसे निष्काम प्रेम करती है और वियोग होते ही प्राण त्याग देती है; दूसरे ऐसा नहीं करते) ॥३२०॥ अनन्यताकी महिमा तुलसी जप तप नेम व्रत सब सबहीं तें होइ । लहै बड़ाई देवता इष्टदेव जब होइ ॥३२१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जप, तप, नेम तथा व्रत आदि सब साधन तो सभीसे बन सकते हैं, परंतु मनुष्य बड़ाई तब पाता है, जब वह देवता (भगवान) को अपना [एक मात्र] इष्टदेव- प्रेमका देवता बना लेता है ॥३२१॥ गाढ़े दिनका मित्र ही मित्र है कुदिन हितू सो हित सुदिन हित अनहित किन होइ । ससि छबि हर रबि सदन तउ मित्र कहत सब कोइ ॥३२२॥ भावार्थ—सुखके दिनोंमें चाहे कोई मित्र या शत्रु कुछ भी क्यों न हो (कोई महत्वकी बात नहीं है) सच्चा मित्र तो वही है जो बुरे (विपत्तिके) दिनोंमें प्रेम करता है। सूर्य अपने घरमें (अमा- वस्याके* दिन) चन्द्रमाकी शोभाको हरण कर लेता है, फिर भी उसको सब 'मित्र' ही कहते हैं (क्योंकि वह विपत्तिमें चन्द्रमाका हित करता है, अपनी किरणोंसे सदा उसे प्रकाश देता रहता है*) ॥३२२॥ *अमावस्याके दिन सूर्य और चन्द्र एक साथ रहते हैं। 'मित्र' सूर्यका नाम भी है।