दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १०७ हाथसे विष घोलकर मछलीको दे दे, पर यदि मछली बिना जलके (जलसे बाहर निकलनेपर) जीवित रह जाय तो तुम कवियोंको दोष दे सकते हो (यह कह सकते हो कि यह सब कवियोंकी झूठी कल्पना है)। तात्पर्य यह कि जलके द्वारा चाहे जैसी नीचता होनेपर भी एकाङ्गी प्रेमका पालन करनेवाली मछली जलके वियोगमें नहीं जी सकती ॥ ३१७ ॥ मकर उरग दादुर कमठ जल जीवन जल गेह । तुलसी एकै मीन को है साँचिलो सनेह ॥३१८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मगर, पानीके साँप, मेढक और कछुए आदि जलचर जीवोंका भी जल ही जीवन है और जल ही घर है, परंतु जलके साथ सच्चा प्रेम तो एक मछलीका ही है। (और सब जीव जलके बिना स्थलपर भी जीवित रह जाते हैं, परंतु मछली तो जलको वियोग होते ही प्राण त्याग कर देती है) ॥ ३१८ ॥ मयूरशिखा बूटीका उदाहरण तुलसी मिटै न मरि मिटेहुँ साँचो सहज सनेह । मोरसिखा बिनु मूरिहुँ पलुहत गरजत मेह ॥३१९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सच्चा और स्वाभाविक प्रेम मर मिटनेपर भी नहीं मिटता। बादलोंके गरजते ही [मेघके प्रति प्रेम करनेवाली सूखी हुई] मयूरशिखा बूटी बिना जड़की होने- पर भी [तुरंत] पनप उठती है ॥ ३१९ ॥ सुलभ प्रीति प्रीतम सबै कहत करत सब कोइ । तुलसी मीन पुनीत ते त्रिभुवन बड़ो न कोइ ॥३२०॥