दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि [मणिके लोभसे सर्प- को मारनेके लिये आये हुए] व्याधको मणि अपने प्रकाशसे भले ही सर्प दिखला दे, [और इस प्रकार उसकी मृत्युमें सहायक बनकर शत्रु का काम करे] परंतु [इससे क्या मणिके प्रति सर्प- का अनुराग कम हो जाता है ? क्या मणिके वियोग में सर्प अन्धा नहीं हो जाता.?* (अर्थात् वह अन्धा हो जाता है) और मणिसे उसका प्रेम नहीं हटता ॥ ३१५ ॥
कमलका उदाहरण
जरत तुहिन लखि बनज बन रबि दै पीठि पराउ । उदय बिकस अथवत सकुच मिटै न सहज सुभाउ ॥३१६॥ भावार्थ—कमलोंके वनको पालेसे जलते हुए देखकर भी सूर्य उनकी ओर पीठ देकर (उनकी अवहेलना करके) चाहे भाग जाय, परंतु सूर्यके उदय होनेपर खिल जाना और अस्त होनेपर सिकुड़ जाना—कमलोंका यह सहज स्वभाव (स्वाभाविक प्रेम) नहीं मिट सकता ॥ ३१६ ॥
मछलीका उदाहरण
देउ आपने हाथ जल मीनहि माहुरु घोरि । तुलसी जिऐ जो बारि बिनु तौ तु देहि कबि खोरि ॥३१७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जल चाहे स्वयं अपने
*कहा जाता है कि रातको मणिधर सर्प अपनी मणि निकालकर जमीनपर रख देता है और उसके प्रकाशसे ओस चाटा करता है और आहारकी खोज किया करता है। व्याध आकर उस मणिपर गोबर डाल देता है, जिससे मणिका प्रकाश ढक जाता है और सर्प मणिको न पाकर अंधा हो जाता है और सिर पटक-पटककर मर जाता है।