श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
देवताओंके लिये भी अजेय थे, उन दोनोंको इन बालक विनायकने चूर्ण-चूर्ण कर डाला ॥ २७१/२ ॥ असुरोंका वध करनेके अनन्तर गलियोंको पार करता हुआ काशिराजका रथ आगे-आगे बढ़ने लगा ॥ २८ ॥ इसके पश्चात् पतंग तथा विधुल नामक दो महान् बलशाली दुष्ट दैत्य वेगशाली आँधीके रूपमें बालक विनायकको मार डालनेकी इच्छासे रथके समीपमें आये। उस धूलभरी आँधीसे भूमिके ढक दिये जानेके कारण सभी लोग अत्यन्त व्याकुल हो उठे। बड़े-बड़े भवन तथा वृक्षोंके समूह टूटकर जमीनपर गिर पड़े ॥ २९-३० ॥ लोगोंके उत्तरीय वस्त्रोंके आकाशमें उड़ा दिये जानेसे वे वस्त्र आकाशमें स्थित पक्षियोंके भाँति दिखायी दे रहे थे। किसी-किसीके सिरसे पगड़ी उड़-उड़कर दसों दिशाओंमें गिर रही थी ॥ ३१ ॥ उस समय महान् कोलाहल व्याप्त हो गया। कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था। प्रचण्ड आँधीसे काशिराजका रथ भी जब आकाशमें उड़ने-जैसा हो उठा तो बालक विनायकने उसे स्तम्भितकर भूमिपर ही रोक दिया। उस वात्याचक्र (बवंडर)-के कारण शक्तिहीन- से हुए लोग वैसे ही भूतलपर गिरने लगे, जैसे सद्योजात शिशु गिर पड़ता है ॥ ३२१/२ ॥ तदनन्तर उन राक्षसोंको अत्यन्त बलवान् जानकर बालक विनायकने अपनी एक ही मुट्ठीसे दोनोंकी शिखाओंके बालोंको पकड़कर बलपूर्वक उन्हें आकाशमें देरतक घुमाया और फिर जमीनपर पटक दिया, तब लोगोंने देखा कि उन दोनोंके प्राण निकल गये हैं। तब वहाँ उपस्थित लोग आपसमें यह कहने लगे कि कश्यपजीका यह पुत्र निश्चित ही कोई बलशाली देवता है; क्योंकि इसने योजनभर विस्तारवाले इन दोनों असुरोंको मार गिराया है ॥ ३३-३५ ॥ इतनी छोटी-सी अवस्थामें इतना पराक्रम किसीमें भी नहीं देखा जाता है। उनका वह महान् सामर्थ्य देखकर काशिराजने भी प्रसन्नता व्यक्त की ॥ ३६ ॥ उन्होंने अपने रथसे उतरकर उन विनायकको प्रणाम किया और वे बोले—हे महायोगिन् ! बालक होनेपर भी आपके कृत्योंके रहस्यको ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जान सकते हैं, तो चर्म चक्षुवाले हम मनुष्योंको आपकी महिमाका ज्ञान कहाँसे हो सकता ? आप इस जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं और इस जगत्के पालन एवं उसकी रक्षाके लिये आप अनेक रूप धारण करते हैं। हे स्वामिन् ! हे विभो ! आपके अवतारोंकी कोई गणना नहीं है ॥ ३७-३९१/२ ॥ तदनन्तर रथ काशिराजके भवनके लिये आगे चल पड़ा। तभी बालक विनायकने अपने समक्ष एक पाषाणरूपधारी [कूट नामक] दैत्यको देखा। उन्होंने अपने अस्त्र परशुसे उसपर आघात किया, जिससे वह पाषाणरूप दैत्य सौ टुकड़ोंमें विभक्त हो गया ॥ ४० ॥ उसमेंसे एक भयंकर महान् असुर प्रकट हुआ, जो चमकते हुए दाँतों और दाढ़ोंवाला तथा दाढ़ीसे युक्त था, वह विशाल कायावाला पुरुष पिंगल वर्णका था ॥ ४१ ॥ उसे देखकर सभी बालक तथा अन्य लोग भी भाग चले। बालक विनायकने अपनी मुट्ठीके आघातसे उसे भी मार डाला और तब वह भूमिपर गिर पड़ा ॥ ४२ ॥ तब लोगोंने उस बालकको भगवान्का साकार रूप माना। अत्यन्त प्रसन्नचित्त काशिराजने उस बालक विनायकको अपने रथसे नीचे उतारा और शीघ्रतापूर्वक स्वयं उसे लेकर अपने भवनके अन्दर प्रवेश कराया, वहाँ उन्होंने स्वर्णसे निर्मित रत्नजटित अपने सिंहासनपर उन्हें बिठाया। यथाविधि सोलह उपचारों, अत्यन्त मूल्यवान् वस्त्रों, आभूषणों तथा दिव्य सुगन्धित द्रव्योंद्वारा उनकी पूजा की ॥ ४३-४५ ॥ राजा अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गये। उन्होंने उनकी स्तुति की और उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने अपने मित्रगणोंके साथ मधुरादि छहों रसोंसे युक्त भोज्य पदार्थों तथा व्यंजनोंसे समन्वित नाना प्रकारके पक्वान्नों और विविध प्रकारकी खीरका उन्हें भोजन कराया। इसके अनन्तर शीघ्र ही राजाने बहुत प्रकारके फल उन्हें समर्पित किये एवं अष्टांग प्रणाम किया और रत्नमय सुवर्णपात्रमें ताम्बूल प्रदान किया। इसके पश्चात् बालकोंके मध्यमें बैठे हुए राजाने भी शीघ्र भोजन किया ॥ ४६-४८ ॥
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