भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 656 में से

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पृष्ठ 301

क्री०ख०-अ०१३ ] * दूतोंका अपने राजा नरान्तकसे बालक विनायकके पराक्रमका वर्णन करना * २१९ तथा पताकाओं और अल्पनाओंसे सजी हुई थी ॥ १२ ॥ तदनन्तर मन्त्रीगण तथा काशीनगरीके नागरिकजन विविध वाद्यों एवं दुन्दुभियोंकी ध्वनि करते हुए और अनेक प्रकारके पूजाके उपचारोंको लेकर बालक विनायकके समीपमें गये। उन सभीने सोलह उपचारोंके द्वारा बड़े श्रद्धा-भक्तिपूर्वक विनायकका पूजन किया और राजाका भी पूजन किया, तदनन्तर वे सभी नगरीके अन्दर प्रविष्ट हुए ॥ १३-१४॥ बालक विनायकके नगरीमें प्रवेश करते ही उनको देखनेकी इच्छुक नगरकी सभी स्त्रियाँ भवनोंके ऊपर चढ़ गयीं; कोई उनके दर्शनके लिये आभूषणों तथा वस्त्रोंकी अस्त-व्यस्त स्थितिमें घरसे बाहर निकल पड़ीं। कुछ स्त्रियाँ पिता, भाई, पति, माता तथा सखियोंकी अवहेलनाकर तथा कोई भोजनपात्रका भोजन छोड़कर तथा कोई भोजन करते हुए पतिको छोड़कर बाहर चली आयीं ॥ १५-१६ ॥ एक स्त्रीको जब कुटुम्बीजनोंने बाहर जानेसे रोक दिया तो उसने आँखें बन्दकर वहीं भगवान् विनायकका भक्तिपूर्वक ध्यान करते हुए अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया, यह अद्भुत घटना हुई ! ॥ १७ ॥ कुमारी कन्याओंने बालक विनायकके ऊपर लाजा तथा पुष्पोंकी वर्षा की। विमानपर आरूढ़ होकर देवता उस महोत्सवको देख रहे थे ॥ १८ ॥ ब्राह्मणोंने उन विनायकको परब्रह्म परमात्माके रूपमें देखा। क्षत्रियोंने उन्हें युद्धके लिये उद्यत एक महान् पराक्रमी वीर योद्धाके रूपमें देखा। सभी वैश्योंको वे संहार करनेवाले रुद्रके रूपमें दिखायी दिये। शूद्रोंने उन्हें भगवान् विष्णुके रूपमें तथा राजाके रूपमें देखा ॥ १९-२० ॥ जिस-जिस व्यक्तिकी जैसी भावना थी, उसने उन्हें उसी रूपमें उसी प्रकार देखा, जैसे कि लाल, श्वेत तथा पीत वस्त्रादिपर रखा श्वेत वर्णका स्फटिक वैसा ही लाल, श्वेत तथा पीत रंगका दिखायी देता है। एक ही पुरुष जैसे किसीका पिता होता है, किसीका भाई होता है तथा किसीका साला होता है, उसी प्रकार सभीने विनायकको अपनी भावनाके अनुसार देखा ॥ २१ १/२ ॥ तदनन्तर बालक विनायकने उस पुरीके अन्दर स्थित उन दोनों विघण्ट तथा दन्तुर नामक महान् असुरोंको देखा और उन्हें बालक्रीड़ा करनेके लिये आदरपूर्वक बुलाया। उन दोनों दैत्योंका मनोभाव अत्यन्त दूषित था, वे बालकोंके साथ (बालक बनकर) आये थे॥ २२-२३ ॥ वे दोनों बालकवेशधारी दैत्य जब बालक विनायकका आलिंगन करनेका प्रयत्न करने लगे तो विनायकने उन दोनोंका दुष्ट मनोभाव जान लिया। फिर तो उन्होंने उन दोनोंका आलिंगनकर उन्हें मसलकर वैसे ही चूर-चूर कर दिया, जैसे हाथमें स्थित फूल चूर-चूर कर दिया जाता है। तदनन्तर उन्होंने उन्हें भूमिपर छोड़ दिया, उन राक्षसोंने दस योजनतककी भूमिको ढक लिया। काशिराज तथा अन्य लोग भी यह दृश्य देखकर दंग रह गये ॥ २४-२५ ॥ आकाशमें स्थित देवताओंने उस बालकपर पुष्पोंकी वर्षा की। कुछ लोग 'साधु-साधु, जय हो-जय हो' आदि ध्वनि करने लगे ॥ २६ ॥ मुनियों तथा देवताओंने अपनी मायासे मनुष्यरूप धारणकर बाललीला प्रदर्शित करनेवाले उन विनायककी स्तुति की। वे कहने लगे, जो दोनों असुर इन्द्र आदि

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