श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- आदेश पाते ही वे सभी राक्षस वायुके समान तीव्र वेगसे शीघ्र ही चल पड़े, वहाँ उन्होंने महर्षि कश्यपजीके पुत्र बालक विनायक तथा काशिराजको देखा, उन दोनोंने भी उन निशाचरोंको देखा। तदनन्तर बालक विनायकने भयभीत कर देनेवाली भीषण गर्जना की, जिसे सुनकर कई निशाचर प्राणोंका परित्यागकर भूमिपर गिर पड़े ॥ ५५-५६ ॥ कुछ राक्षस भाग चले, कुछ पैर टूट जानेपर वहाँसे निकल पड़े, बालक विनायकके बाणोंसे कुछ राक्षसोंके सिर कट गये और कुछ विद्ध उदरवाले हो गये। किसी-किसीके मुख कट गये, किसीकी आँखें फूट गयीं और किन्हींके जंघा तथा बाहुएँ भग्न हो गयीं; कुछ दूसरे निशाचर भाग करके नरान्तकके पास आ पहुँचे और उन्होंने बालक विनायकद्वारा किये गये उत्पातका सारा समाचार नरान्तकको सुनाया ॥ ५७-५८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत विनायककृत निशाचरवध' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय दूतोंका अपने राजा नरान्तकसे बालक विनायकके पराक्रमका वर्णन करना, काशिराजसहित बालक विनायकका काशीनगरीमें प्रवेश, काशिवासियोंको विविध रूपोंमें विनायकका दर्शन, बालक विनायकके वधकी दृष्टिसे वहाँ आये विघण्ट तथा दन्तुर आदि अनेक राक्षसोंका वध, काशिराजद्वारा विनायकका पूजन तथा सत्कार
दूत बोले- [हे स्वामिन् !] आपकी आज्ञा प्राप्त करके हम लोग रथमें स्थित उस विनायकके समीप गये। हम सभीको वह यमराजके समान दिखायी दिया ॥ १ ॥ हे स्वामिन् ! हे अनघ ! उसके भयसे सभी निशाचर मृत्युको प्राप्त हो गये, आपकी कृपासे हम जीवित रह गये और आपके पास आये हैं ॥ २ ॥ जैसे सिंहोंके समूहसे हाथियोंकी रक्षा होती है, वैसे ही ईश्वरकी ही कृपासे हम लोग जीवित बच गये। तीनों लोकोंमें ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो उस बालकके साथ युद्ध कर सके ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोले-दूतोंका यह वचन सुनकर नरान्तक बोला-'तुम लोग मूर्खतावश क्या बोल रहे हो, कहाँ वह बालक और कहाँ मैं नरान्तक ! प्रलयकालीन अग्निके सम्मुख एक पतंगा क्या कर सकता है? क्या चूहेके खोदनेसे मेरुपर्वत गिर सकता है?' ॥ ४-५ ॥ तदनन्तर नरान्तकने अपने दूतोंको आज्ञा देते हुए कहा कि काशिराजकी नगरीको लूट डालो और वहाँ कुछ ऐसा करो, जिससे कि वह राजा उद्विग्न हो उठे। उसके व्याकुल हो जानेपर वह कश्यपका पुत्र भी व्यग्र हो उठेगा अथवा सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा उन दोनोंका वध कर डालना ॥ ६-७ ॥ इसके पश्चात् नरान्तकने अपने उन निशाचर दूतोंको अत्यन्त मूल्यवान् अनेकों रत्न, विशिष्ट वस्त्र तथा विविध अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। तब वे सभी निशाचर नरान्तकको प्रणाम करके काशीपुरीको चल पड़े। अपनी सेनाके द्वारा दिशा-विदिशाओंको व्याप्त करके वे परस्पर वार्तालाप भी कर रहे थे ॥ ८-९ ॥ उनका जो महान् सेनापति था, वह निशाचरोंको यह आदेश दे रहा था कि हे दैत्यो ! जिसे भी वह बालक दिखायी पड़े, वह उसे मार डाले ॥ १० ॥ अगर ऐसा नहीं होगा तो वह मेरे लिये दण्डनीय होगा, उसके लिये मैं ही प्राणोंको विनष्ट करनेवाला बन जाऊँगा। इस प्रकारका आदेश प्राप्त करनेवाले वे दैत्य दसों दिशाओंमें फैल गये ॥ ११ ॥ रथमें बैठे हुए उस काशिनरेशके साथ वह विनायक काशीपुरीमें गया। वह काशीनगरी नाना प्रकारके ध्वज