श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 299, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१२ ] * काशीनरेशका मुनि कश्यपके आश्रममें आगमन * २१७ हाथतककी पृथ्वी उसके गिरनेसे ढक गयी ॥ ३२ ॥ उस राक्षस धूम्राक्षके दो पुत्र जो जघन तथा मनु नामसे विख्यात थे और पिताकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे, वे पिताकी वैसी स्थिति देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उन्होंने पासमें ही स्थित बालक विनायकको भी देखा। तब वे दोनों काल तथा यमके समान अपना मुख खोलकर उसके पास दौड़ पड़े ॥ ३३-३४ ॥ उन जघन तथा मनु नामक राक्षसोंने अत्यन्त क्रोधके आवेशमें होकर काशीनरेशसे कहा कि 'इस बालकको लाकर तुमने हमारे पिताको क्यों मरवाया है ? प्राचीन समयकी बात है, मेरे पिता धूम्राक्षने ही नरान्तकसे तुम्हारी रक्षा की थी, अरे राजन् ! उसे युक्तिपूर्वक मार करके अब तुम जीवित कैसे रह सकते हो?' ॥ ३५-३६ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारका वचन सुनकर वे काशीनरेश अत्यन्त व्याकुल होकर काँपने लगे और अपने मनमें विचार करने लगे कि मैं कश्यपजीके अपस्मार-रोगीके समान इस बालकको अपने साथ क्यों लाया ? यदि नरान्तक क्रुद्ध हो गया तो वह बलपूर्वक मेरे राज्यका हरण कर लेगा, तब मेरी रक्षा कौन करेगा? ऐसा सोचकर राजा शपथपूर्वक बोले- ॥ ३७-३८ १/२ ॥ राजा बोले- अरे निशाचरो! मैं ब्राह्मण तथा ईश्वरकी शपथ लेकर कहता हूँ कि इस निमित्त मैं इस बालकको कदापि नहीं लाया हूँ। यह मेरे पुरोहित महर्षि कश्यपका पुत्र है और विवाहका कार्य सम्पादित करनेके लिये मेरे द्वारा लाया गया है ॥ ३९-४० ॥ आप लोग मेरे पुत्रके विवाहमें विघ्न न करें। इस बालकको ले जायँ। राजाकी इस प्रकारकी बात पूरी हो जानेपर मुनिपुत्र वह विनायक राजासे बोला - ॥ ४१ ॥ बालकको शत्रुके हाथमें क्यों सौंप रहे हैं? आप अदिति तथा कश्यपको क्या उत्तर देंगे? ॥ ४२ ॥ यदि महर्षि कश्यप क्रुद्ध हो जायँगे तो वे आपको भस्म कर डालेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है। मुनि कश्यपजीके बालक उन विनायकके इस प्रकार कहनेपर वे दोनों राक्षस उसे खा जानेके लिये उसी प्रकार दौड़ पड़े, जैसे कि विडाल चूहेको खानेके लिये दौड़ पड़ता है। तब बालक विनायकने अपना मुख फैलाकर भयानक गर्जना की ॥ ४३-४४ ॥ उस गर्जनाको सुनकर तीनों लोक काँप उठे। उसके द्वारा छोड़े गये निःश्वाससे वे दोनों राक्षस उड़कर उसी प्रकार बादलोंके बीच पहुँच गये, जैसे कि आँधीके द्वारा कोई तिनका उड़ा दिया जाता है ॥ ४५ ॥ दो मुहूर्त बीत जानेके अनन्तर वे दोनों राक्षस जघन और मनु नरान्तकके नगरमें अलग-अलग स्थानोंमें ऐसे गिरे, जैसे कि आँधी-तूफानके द्वारा पर्वतके शिखरपर दो बड़ी-बड़ी चट्टानें गिरी हों। उन दोनोंके गिरे शरीरोंसे अनेक घर चूर-चूर हो गये ॥ ४६-४७ ॥ उस समय मुखद्वारा किये गये चीत्कार तथा हाथद्वारा किये गये उरताडनके शब्दोंसे महान् हाहाकार होने लगा। तब 'यह क्या हो गया? यह क्या हो गया'- ऐसा कहते हुए दूत दौड़ते हुए वहाँ आये ॥ ४८ ॥ राक्षस धूम्राक्षके दोनों पुत्र मर गये हैं- ऐसा सुनकर दूतोंने उन दोनोंको ठीकसे देखा तो उन्हें जीवित देखकर उन्होंने उन्हें सावधान किया ॥ ४९ ॥ तदनन्तर उन दोनों जघन और मनुने दूतोंको सारा वृत्तान्त क्रमशः बतलाया कि किस प्रकार कश्यपके पुत्रने पिता धूम्राक्षका वध किया और कैसे वे दोनों उसके श्वास छोड़नेसे यहाँ आ गिरे। साथ ही यह भी बताया कि वह बालक काशिराजके साथ रथमें बैठकर जा रहा है। दूतोंने इस प्रकारकी बात सुनकर नरान्तकसे उस बालकके विषयमें बतलाया ॥ ५०-५१ ॥ अपने निरपराध चाचा धूम्राक्षके वध और कश्यपऋषिके अपराधी पुत्र विनायकका काशिराजके साथ गमनका समाचार सुनकर नरान्तककी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं, तदनन्तर उसने अपने समक्ष हजारकी संख्यामें स्थित निशाचरोंको देखकर उस बालकको पकड़ लानेकी उन्हें आज्ञा दी - ॥ ५२-५३ ॥ 'हे राक्षसो ! मुनि कश्यपके पुत्रको पकड़कर ले आओ। यदि वह युद्ध करे तो उसे मार डालना। अथवा तुम उस काशिराजके रथको ही यहाँ ले आना। अब तुम लोग शीघ्र ही जाओ' ॥ ५४ ॥