श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 304, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
दोनोंके पैरोंको पकड़कर बहुत बार घुमाया और फिर जमीनपर पटक दिया। तब लोगोंने देखा कि जमीनपर गिरे हुए उन दोनोंके प्राण निकल चुके हैं॥ १४-१५॥ उस समय उनके देहपातद्वारा हुई ध्वनिसे तीनों लोक प्रकम्पित हो उठे। उन विनायकके महान् पराक्रमको आज प्रत्यक्ष देखकर महामुनि धर्मदत्तको लोकमें प्रचलित विनायककी प्रसिद्धिकी वार्ताके विषयमें पूर्ण विश्वास हो गया। तदनन्तर ब्राह्मण धर्मदत्त उन बालक विनायकके साथ आगे बढ़े। उसी समय उन्होंने छद्मवेश धारण करनेवाले एक मदोन्मत्त महान् बलशाली हाथी (-के रूपवाले कुण्ड नामक दैत्य)-को देखा, जो इधर-उधर भागते हुए लोगोंको मारनेके लिये उद्यत हो रहा था॥ १६-१८॥ महान् वीर भी उस हाथीको देखकर इधर-उधर भागने लगे। वहाँ उस समय दौड़ते हुए लोगोंका महान् कोलाहल व्याप्त हो गया॥ १९॥ सर्वत्र धूल उसी प्रकार छा गयी, जैसे कि कोहरेके द्वारा पर्वत ढक दिये जाते हैं। तदनन्तर वह महाबलशाली हाथी राजाके मदोन्मत्त हाथियोंको मारने चल पड़ा॥ २०॥ महलके भीतर निवास करनेवाले लोगोंने हाथियोंके उस अत्यन्त भयंकर युद्धको देखा। वहाँ बँधे हुए घोड़ोंको देखकर उन हाथियोंने अश्वशालाको भी तहस- नहस कर दिया॥ २१॥ बन्धनमुक्त हुए घोड़े तथा हाथी दसों दिशाओंमें भाग चले। ब्राह्मण धर्मदत्त उन बालक विनायकको साथ लेकर ज्यों-ही घरके अन्दर जानेको उद्यत हुए, उसी समय बालक विनायकने उस हाथीकी सूँड़को मरोड़ डाला और वे बलपूर्वक उसके ऊपर आरूढ़ हो गये। बालक विनायकने अंकुशके द्वारा उस हाथीके गण्डस्थलको बार-बार वेध डाला॥ २२-२३॥ [उसके कारण] चारों ओर रक्त बहने लगा और वह हाथी सभी लोगोंको भयभीत करनेवाली चिंघाड़की ध्वनि करते हुए भूमितलपर गिर पड़ा॥ २४॥ विशाल शरीरवाले उस हाथीके गिरनेसे सभी सामानोंसहित असंख्य संख्यामें वहाँके भवन टूट गये॥ २५॥ पर्वतों, वनों तथा खानोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी। धूलके छा जानेसे हुए अन्धकारके छँट जानेपर नगरमें निवास करनेवाले लोग वहाँ आये। महान् भयंकर आकृतिवाले उस हाथीको मरा हुआ देखकर वे भयसे व्याकुल हो उठे। कुछ बलशाली पुरुष उसके पास गये और उन्होंने बलपूर्वक उस हाथीसे बालकको नीचे उतारा॥ २६-२७॥ ब्राह्मण धर्मदत्तने बालक विनायकको पुनः अपनी गोदमें ले लिया। फिरसे कोई नया उत्पात न हो जाय, इस शंकासे वे शीघ्र ही बालकको घरके अन्दर ले गये। उस अपशकुनके शान्त हो जानेपर ब्राह्मण धर्मदत्तने ब्राह्मणोंको धन प्रदान किया और पृथक्-पृथक् उपचारोंके द्वारा बालक विनायककी पूजा की॥ २८-२९॥ उन्होंने वस्त्र, अलंकार एवं पुष्पोंसे पूजन किया और विविध प्रकारके एकत्रित नैवेद्योंका उन्हें भोग लगाया। दक्षिणाके निमित्त धर्मदत्तने सिद्धि तथा बुद्धि नामक अपनी दो कन्याएँ उन्हें समर्पित कीं और भूमिपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया, तदनन्तर प्रसन्न मनवाले ब्राह्मण धर्मदत्तने आनन्दातिरेकसे गद्गद वाणीमें कहा-॥ ३०-३१॥ आज मेरा भाग्य सफल हो गया है, जो कि मैंने आपके चरणाम्बुजका दर्शन किया। आप जगत्के स्वामी हैं, जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं, जगत्के साक्षीरूप हैं। समस्त जगत्के गुरु हैं, आप मेरे कहनेसे मेरे पूर्वजोंका उद्धार करनेके लिये यहाँ आये हैं। ऐसा कहते हुए उन मुनि धर्मदत्तको विनायकदेवने एक उत्तम आसनपर बैठाया और [अपने पिता कश्यपजीके मित्र होनेके कारण पितृभावसे स्वयं भी] अत्यन्त भक्तिपूर्वक मुनिकी पूजा की॥ ३२-३३१/२॥ सिद्धि तथा बुद्धिसे समन्वित वे बालक विनायक देवी गंगा तथा पार्वतीसे युक्त, त्रिशूल हाथमें धारण करनेवाले त्रिनेत्र भगवान् शिवके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। उसी समय एक जृम्भा नामक सुन्दरी वहाँ