भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 305

क्री०ख०-अ०१४] * धर्मदत्त नामक ब्राह्मणका काशिराजके यहाँ आना * ३०३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 आयी ॥ ३४-३५ ॥ वह पीले रंगके वस्त्र धारण की हुई थी, उसने सुन्दर कंकण तथा मनोहर आभूषण पहन रखे थे। वह धूम्राक्ष नामक राक्षसकी पत्नी थी और अत्यन्त दुष्ट मनोभाव रखनेवाली थी ॥ ३६ ॥ वह अत्यन्त मधुरवाणीमें बोली—'यह उत्तम निधान है। यहाँ बहुतसे अरिष्ट हो रहे हैं, उन्हें प्रयत्न करके नष्ट किया जा सकता है। ऐसी स्थितिमें इस बालकको तथा इसके माता-पिताको कैसे सुखभोग हो सकता है?', सभी स्त्रियोंसे ऐसा कहकर वह बालक विनायकसे कहने लगी ॥ ३७-३८ ॥ हे विभो! यह मेरा महान् भाग्य है, जो कि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ। हे देवेश्वर! बहुतसे दुष्टोंका वध करते-करते आप थक गये हैं। अतः हे महामते! इस सुगन्धित तैलका उबटन लगाइये। मैं तुम्हारे अंगोंकी मालिश कर दूँगी तथा तेल और उबटन भी लगा दूँगी। तब बालक विनायकके द्वारा 'ठीक है'—ऐसा कहे जानेपर हाथमें विष ली हुई उस स्त्रीने विषके प्रभावकी उत्कटताका वर्धन करनेवाले उस तेलको उनके चरणोंमें लगाया ॥ ३९–४१॥ जँभाई लेती हुई वह जृम्भा उस तेलके द्वारा बालक विनायककी मालिश करने लगी। वहाँ उपस्थित लोगोंने उसे भली स्त्री माना। वह दुष्ट भाववाली स्त्री जृम्भा बालक विनायककी उसी प्रकार सेवा करने लगी, जैसे शुभ भाववाली स्त्री अपने पतिकी सेवा करती है ॥ ४२ ॥ तदनन्तर उस विषमिश्रित तेलके प्रभावसे बालक विनायकके शरीरमें अत्यधिक जलन होने लगी। तब विनायकने ज्ञानयोगके बलपर यह जान लिया कि यह तो दूषित मनोवृत्तिवाली राक्षसी है ॥ ४३ ॥ तब शीघ्र ही विनायकने एक नारियलके फलसे उसके मस्तकपर प्रहार किया, जिससे वह जमीनपर गिर पड़ी और अपने वास्तविक निशाचरीरूपमें आ गयी। अपने शरीरसे बहनेवाले रक्तके मध्यमें वह दो योजन दूरतक फैल गयी। उस समय वे ब्राह्मण धर्मदत्त तथा अन्य सभी उपस्थित लोग अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये ॥ ४४-४५ ॥ तदनन्तर ब्राह्मण धर्मदत्तने बालक विनायककी विधिवत् पूजा की और उन्हें छः रसोंसे समन्वित अत्यन्त स्वादुपूर्ण विविध प्रकारके पक्वान्नोंका भोजन कराया ॥ ४६ ॥ उस अवसरपर देवताओंने पुष्पोंकी वर्षा की तथा स्त्रियोंने उनकी पूजा की, आरती की और लाजाओंकी उनपर वर्षा की ॥ ४७ ॥ तदनन्तर वे काशीनरेश उन विनायकको ले जानेके लिये वहाँ आये और उन्होंने उन्हें रथपर बैठाया। तदुपरान्त विविध वाद्योंकी ध्वनि, गन्धर्वोंके गायन तथा अप्सराओंके द्वारा आगे-आगे किये जाते हुए नृत्यके साथ राजा उन विनायकको सकुशल अपने भवनमें ले गये ॥ ४८-४९ ॥ अनेक वीरोंसे घिरे हुए तथा काशिराजके रथपर विराजमान वे बालक विनायक उसी प्रकार प्रतीत हो रहे थे, मानो सिंहपर आरूढ़ और हाथमें शस्त्र धारण किये हुए एवं देवताओंसे घिरे हुए इन्द्र हों ॥ ५० ॥ उस समय सिद्धि तथा बुद्धिसे समन्वित वे विनायक उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे कि गंगा तथा पार्वतीसे समन्वित शिव सुशोभित होते हैं। अनेक बन्दीजनोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए उन विनायकने राजाके भवनमें प्रवेश किया। जगदीश्वर विनायकके इस प्रकारके बालचरित्रोंका जो श्रवण करेगा, वह सभी प्रकारके मनोरथोंको प्राप्त कर लेगा और कभी भी शत्रुओंके द्वारा प्रपीड़ित नहीं होगा ॥ ५१-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'काम-क्रोध आदि दैत्योंके वधका वर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४॥