श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 306, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- पन्द्रहवाँ अध्याय काशीनरेशद्वारा अपनी सभामें विनायकके अद्भुत कर्मोंका वर्णन, ज्वालामुख, व्याघ्रमुख तथा दारुण नामक राक्षसोंका काशीपुरीको दग्ध करना, बालक विनायकके द्वारा तीनों असुरोंका वध तथा काशीपुरीको पूर्ववत् बना देना और राजाद्वारा विनायककी स्तुति ब्रह्माजी बोले—दूसरे दिन काशीनरेश बालक विनायकको साथ लेकर अपने मित्रों एवं मन्त्रियोंसे समन्वित होकर लोगोंके साथ सभामण्डपमें आये ॥ १ ॥ उन्होंने गुणोंसे सुसम्पन्न महान् आशयवाले उन सर्वश्रेष्ठ विनायकको आगे करके उन सभीसे बालकके बहुतसे गुणोंका वर्णन किया ॥ २ ॥ राजा बोले—'मैं अपने पुत्रके विवाहको सम्पन्न करानेके लिये महर्षि कश्यपके पास उन्हें बुलानेके लिये गया, तब उन्होंने अपने पुत्र इन विनायकको मेरे साथ भेज दिया। इनके साथ जब मैंने यहाँके लिये प्रस्थान किया ही था कि अनेक अद्भुत प्रकारके राक्षस तथा एक-पर-एक अनेक अरिष्ट उपस्थित हुए, जिन्हें न पहले कभी देखा गया था और न जिनके विषयमें सुना ही गया था ॥ ३-४॥ सर्वप्रथम इन्होंने राक्षसोंके अधिपति धूम्राक्षका वध किया। तदनन्तर उसके जघन तथा मनु नामक दो पुत्रों [-को नरान्तकके पास फेंक दिया] और फिर [उनके सहयोगी] पाँच सौ राक्षसोंका संहार किया ॥ ५ ॥ नगरमें पहुँचनेपर इन्होंने बालकका रूप धारण करके वहाँ आये हुए विघण्ट तथा दन्तुर नामक राक्षसोंका वध किया। जो महाबली विधूल नामक राक्षस आँधी-तूफानके रूपमें होकर इन्हें आकाशमें उड़ाना चाहता था, उसे तथा पतंग नामक राक्षसका भी इन्होंने वहाँ नगरमें संहार किया। वहाँ राजद्वारपर स्थित तथा पाषाणरूपधारी कूट नामक राक्षसको भी इन्होंने मार डाला। काम तथा क्रोध नामक राक्षसोंका भी इन्होंने वध किया, ये दोनों गधेका रूप धारण करके आये थे। इन्होंने हाथीका रूप धारणकर आये हुए कुण्ड नामक निशाचरको मारा ॥ ६-८ ॥ अन्य भी जो अरिष्ट आयेंगे, उन्हें ये विनायक नष्ट कर डालेंगे। इस समय आप लोग ब्राह्मणोंके साथ मन्त्रणा करके मेरे पुत्रके विवाहके विषयमें निश्चय करें। देवताओंकी स्थापना, हरिद्रालेपन, मण्डपकी स्थापना तथा विवाहके लिये सामग्री एकत्र करनेके सम्बन्धमें ज्योतिषशास्त्रके विद्वानोंसे परामर्श करना चाहिये' ॥ ९-१० ॥ ब्रह्माजी बोले—उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर मन्त्रियोंने राजासे कहा—'हे नृपश्रेष्ठ! हमको यह निश्चित रूपसे प्रतीत होता है कि जबतक यह बालक नगरमें रहेगा, तबतक विवाह नहीं हो सकेगा; क्योंकि इसके यहाँ रहनेपर दिन-प्रतिदिन महान् उत्पात होते रहेंगे ॥ ११-१२ ॥ हे राजन्! आप पन्द्रह दिनके बाद अथवा एक मास बीत जानेपर पुत्रका विवाह करें।' राजाके द्वारा 'ठीक है' ऐसा कहे जानेपर वे सभी अपने-अपने घरको चले गये ॥ १३ ॥ तदनन्तर काशिराज तथा विनायक दोनों ही भोजन करनेके पश्चात् सुखपूर्वक सो गये। हे मुनि व्यासजी! जब मध्यरात्रिका समय आया और सभी लोग निद्रामें सो गये, उसी समय ज्वालामुख, व्याघ्रमुख तथा दारुण नामक तीन असुर वहाँ आये, वे पूर्वमें मारे गये दैत्यों और राक्षसोंके वधका बदला लेना चाहते थे ॥ १४-१५ ॥ इन तीनोंमें जो ज्वालामुख नामक पहला राक्षस था, वह सम्पूर्ण काशीनगरीको दग्ध कर देना चाहता था। दारुण नामक राक्षस वायुरूप होकर उसकी सहायताके लिये तैयार था। तीसरा जो व्याघ्रास्य नामक असुर था, वह वहाँसे भागनेवालोंको खा जानेवाला था। इस प्रकारका पहलेसे ही निश्चय करके आये हुए वे राक्षस बड़े ही उच्च स्वरसे चीत्कार करने लगे ॥ १६-१७ ॥ उस आवाजसे तीनों लोक काँप उठे, लोग अत्यन्त संशयग्रस्त हो गये। वे कहने लगे—'क्या यह प्रलयकाल