भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 656 में से

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पृष्ठ 307

क्री०ख०-अ०१५ ] * काशीनरेशद्वारा अपनी सभामें विनायकके अद्भुत कर्मोंका वर्णन * ३०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] उपस्थित हो गया है या फिर क्या शत्रुसेना आक्रमणके लिये आ पहुँची है?'॥ १८॥ ज्वालामुख नामक महान् कायावाले उस दैत्यने अपने नीचेके ओष्ठको पृथ्वीपर टिका लिया और ऊपरके ओष्ठको आकाशतक फैला लिया, बीचमें नदीकी भाँति जीभको स्थापित करके वह अपने मुखसे अग्निकी ज्वालाओंको प्रकट करने लगा और आकाशसहित उस काशीनगरीको दग्ध करने लगा। जिस प्रकार हनुमान्‌जीने अपनी पूँछकी अग्निसे समस्त लंकानगरीको जला डाला था, वैसे ही इस ज्वालामुख नामक दुष्ट राक्षसने अपने मुखकी ज्वालाओंसे काशीनगरीको दग्ध कर डाला, नगरीके वृक्ष, लताएँ, उद्यान तथा भवनोंके समूह जलकर राख हो गये ॥ १९-२१॥ उस समय महान् कोलाहल व्याप्त हो गया। लोग मुख तथा हाथोंको पीटते हुए क्रन्दन करने लगे। अपने- अपने सभी कार्योंको छोड़कर लोग दसों दिशाओंमें भाग चले। नगरसे जो भी बाहर जा रहा था, उसे व्याघ्रास्य नामक राक्षस खाता जा रहा था। वही उसका भोजन था, बालकोंको तो वह अचार-चटनीकी तरह चाट जा रहा था ॥ २२-२३ ॥ कुछ लोग ढीले वस्त्रोंमें तो कुछ बिना वस्त्र पहने

[दायाँ स्तम्भ] ही भाग रहे थे, कुछ स्त्रियाँ केवल उत्तरीय ओढ़े अथवा कुछ अपने पतिके वस्त्रोंको पहनकर ही भाग चलीं॥ २४॥ वे सभी व्याघ्रास्य राक्षसके उस फैले हुए विशाल मुखको कोई गुफा समझकर जान बचानेकी इच्छासे उसमें प्रविष्ट हो जा रहे थे। वे दूसरे लोगोंको भी वहाँ आनेके लिये बुला रहे थे। तब उस असुरने उन सबको खा डाला ॥ २५॥ असमयमें ही प्रलयकी जैसी स्थिति हो जानेपर काशिराज अपने राज्य, धन, स्त्री, पुत्र आदि तथा अन्य सभी वस्तुओंका परित्यागकर केवल उस बालक विनायकको अपने कन्धेपर बैठाकर विभिन्न स्थानोंमें, घर-घरमें भ्रमण करने लगे। वे अत्यन्त दुःखसे संतप्त हो उठे थे तथा उस अग्निके तेजसे व्याकुल थे ॥ २६-२७॥ मेरे द्वारा मूर्खताके कारण यह क्यों लाया गया, यह तो सभी अरिष्टोंका जनक है, सब कुछ हरण करनेवाला तथा अपशकुनोंका कारण है ॥ २८ ॥ यह जीवित नहीं बचेगा तो मैं महर्षि कश्यप तथा अदितिको क्या जवाब दूँगा ? इसने पहले तो सभी बड़े- बड़े अरिष्टोंको दूर कर दिया था, किंतु इस समय यह चुप क्यों बैठा है, मैं इसका कारण नहीं जान पा रहा हूँ। इस प्रकारसे शोक करते हुए काशिराज बालक विनायकको लेकर ऊँचे दुर्गमें चढ़ गये ॥ २९-३०॥ किंतु वहाँ भी वायुकी सहायतासे वह अग्नि आ पहुँची। तब राजाके सेवकोंने आग बुझानेके लिये घड़ों एवं चर्मसे बने (मशक) पात्रोंसे जल छिड़कना शुरू किया ॥ ३१॥ राजाकी रानियाँ लोकलाज छोड़कर अपने बच्चोंको साथ लेकर दुर्गसे बाहर निकल पड़ीं। तदनन्तर विह्वल होकर काशिराज भी दुर्गसे नीचे उतर आये ॥ ३२ ॥ अश्व, खच्चर तथा उनमें सवार वीर सैनिक, रथ, हाथी तथा उनमें सवार वीर सैनिक, पैदल सैनिक और नगरके सभी लोग अपना-अपना गोधन लेकर नगरसे बाहर चले गये। उस महाविनाशके समय सभी लोगोंके पलायन कर जानेपर काशिराज विनायकको तथा विनायक काशिराजको खोजने लगे ॥ ३३-३४॥