श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 309, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१६ ] * काशिराजका दण्डकारण्यमें महर्षि भृशुण्डीके आश्रममें गमन * ३०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[ऊपरी भाग - बायाँ स्तम्भ] स्वेच्छानुसार ब्राह्मणोंमें वितरित कर दिया ॥ ५३-५४ ॥ राजाने अमात्योंको तथा वीरोंको वस्त्र प्रदान किये। राजाने उन सभीको विदा करके विनायकके साथ भोजन करनेके अनन्तर सुखपूर्वक शयन किया ॥ ५५ ॥
[ऊपरी भाग - दायाँ स्तम्भ] जो व्यक्ति विनायकद्वारा करायी गयी काशीपुरीकी मुक्तिके वर्णनको श्रद्धाभक्तिसे श्रवण करता है, वह अपनी सभी अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और कहीं भी अरिष्टोंसे बाधित नहीं होता ॥ ५६ ॥
[अध्याय समाप्ति पुष्पिका] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'ज्वालास्य आदि राक्षसोंका वध करके नगरीको मुक्त करानेका वर्णन' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय काशिराजका दण्डकारण्यमें महर्षि भृशुण्डीके आश्रममें गमन, काशिराज तथा गजाननके अनन्य भक्त भृशुण्डीका वार्तालाप
[मुख्य भाग - बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी ! अब मैं आश्चर्यजनक कथाको सुनाता हूँ, आप श्रवण करें। इसका भक्तिपूर्वक श्रवण करनेसे मनुष्य अत्यन्त सुख प्राप्त करता है ॥ १ ॥ वे काशिराज प्रातःकाल उठकर नित्य कर्मोंका सम्पादन करनेके अनन्तर महलसे बाहर निकले। उन्होंने बालक विनायकके भवनमें जाकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी पूजा की, तदनन्तर उन्होंने बालक विनायकसे भोजन करनेहेतु प्रार्थना की। विनायकने विविध प्रकारके पकवानोंसे तृप्ति प्राप्त होनेके अनन्तर होनेवाली डकार ली ॥ २-३ ॥ राजाने वहाँपर बचे हुए लड्डुओं, पायस आदि पदार्थों, पुओं, बड़ों, सूपमिश्रित पवित्र भात, दधि, दुग्ध, मधु, घृत तथा क्वथिका अर्थात् कढ़ीसे युक्त पात्रोंको देखा। साथ ही उन विनायकके शरीरपर विद्यमान मणि तथा मुक्तासे बनी माला, अत्यन्त मूल्यवान् तथा नवीन विविध अलंकारोंको देखा। तब काशिराजने उन विनायकको पुनः नमस्कार करके उनसे पूछा— ॥ ४-६ ॥ हे जगदीश्वर ! किस भक्तके द्वारा आपकी यह पूजा की गयी है ? आपकी कृपासे मैं उन्हें जानना चाहता हूँ और उनका दर्शन करना चाहता हूँ ॥ ७ ॥ इस प्रकारसे कहनेवाले अपने भक्त काशिराजसे विनायकदेवने अपने भक्तद्वारा की गयी पूजाके विषयमें इस प्रकार बताया ॥ ८ ॥ विनायकदेव बोले—हे राजन् ! इस समय आपने जो मुझसे पूछा है, उसे मैं बताता हूँ, आप सुनें। हे नृपात्मज ! उसे मैं आपको संक्षेपमें ही बताता हूँ ॥ ९ ॥
[मुख्य भाग - दायाँ स्तम्भ] दण्डकारण्य देशके नामल नामक नगरमें भृशुण्डी नामक मेरा एक भक्त निवास करता है; वह भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीनों कालोंको जानता है। वह शीघ्र ही तीनों लोकोंकी सृष्टि करने, उसकी रक्षा करने तथा उसके संहार करनेकी सामर्थ्य रखता है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव उसके दर्शनकी नित्य अभिलाषा रखते हैं ॥ १०-११ ॥ सभी समयोंमें मेरा ध्यान-स्मरण करते रहनेसे उनके समस्त पाप विनष्ट हो गये हैं और उन्होंने अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है। प्राचीन समयकी बात है, जब वे तपस्यामें लीन थे, उसी समय उनकी दोनों भौंहोंके मध्य एक शुण्ड प्रकट हो गया था, तभीसे वे तीनों लोकोंमें भृशुण्डी इस नामसे प्रसिद्ध हो गये। मुझपर अनन्य भक्तिभाव रखनेके कारण मृत्युलोकमें होनेपर भी उन्होंने मेरा सादृश्य प्राप्त कर लिया है ॥ १२-१३ ॥ आज शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथि है, उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मेरा पूजन किया है। हे राजन् ! मेरे शरीरसे टपकते हुए घृत, दुग्ध, दधि तथा मधुको आप देख लें। हे नृपश्रेष्ठ ! मेरे द्वारा भोजन करनेसे जो अन्न बच गया है, उसे तो आपने देख ही लिया है ॥ १४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर काशिराजने कहा—'हे देवाधिदेव ! हे जगत्के स्वामी ! मैं उनका दर्शन करना चाहता हूँ, वे कैसे यहाँ आयेंगे ?' ॥ १५१/२ ॥ विनायक बोले—हे राजन् ! आप आज ही उनके आश्रम-स्थलको जाइये। उनकी पूजा करके तथा उन्हें