श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 310, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the complete transcription of the text from the image:
३०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रणाम करके अपने पुत्रके विवाहमें आनेके लिये प्रयत्नपूर्वक प्रार्थनाकर उन्हें यहाँ बुला ले आइये तथा मेरा इस प्रकारका वचन भी उनसे कहियेगा ॥ १६-१७ ॥ हे मुने ! क्योंकि विनायकदेव मेरे घरमें आये हैं, वे आपके द्वारा भक्तिपूर्वक की गयी पूजासे अत्यन्त सन्तुष्ट हैं। हे मुने ! वे भी आपका दर्शन करना चाहते हैं, मुझे उन्होंने ही आपके पास भेजा है। मुझे भी आपके दर्शनकी तथा पूजाकी महान् अभिलाषा है। अतः आप मेरे घर पधारकर मेरे घर तथा मेरी सम्पदाको सफल बनायें। हे राजन् ! इस प्रकार आपके द्वारा कहे जानेपर तथा मेरा नाम लेनेसे वे मेरे भक्त भृशुण्डी उसी क्षण आ जायेंगे ॥ १८-२० १/२॥ ब्रह्माजी बोले-विनायकके द्वारा इस प्रकारसे कहे गये उन काशिराजने उनकी पूजा करके प्रस्थान किया। तूणीर और धनुष धारण करके शीघ्रगामी अश्वपर आरूढ़ होकर नदियों, पर्वतों तथा वनोंको पार करके धीरे-धीरे राजा चल पड़े ॥ २१-२२ ॥ भृशुण्डीजीके आश्रममें पहुँचकर राजा घोड़ेसे उतर पड़े। भृशुण्डीमुनिका दर्शनकर राजाने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया ॥ २३ ॥ मुनिने राजाका स्वागत-सत्कार किया और काशिराजने भी प्रसन्नतापूर्वक उन ऋषिका पूजन किया। मुनिकी आज्ञा पाकर राजा बैठ गये। तदनन्तर उन्होंने वहाँके महान् वनमें, सरोवरों, वृक्षों, लताओं, पुष्पों तथा फलोंसे समन्वित उस सुन्दर आश्रमको देखा। भगवान् शिवका निवासस्थान कैलास, विष्णुलोक अथवा सत्यलोक भी उस आश्रमके समान न था ॥ २४-२५ ॥ उस आश्रममें वेदमन्त्रोंका उच्चारण हो रहा था। शास्त्रोंका पाठ हो रहा था तथा गीत एवं नृत्य आदिसे वह आश्रम सुशोभित हो रहा था। वहाँ अग्निहोत्र हो रहा था, विविध प्रकारके जलाशयों, पक्षियों तथा जलचर प्राणियोंसे वह समन्वित था ॥ २६ ॥ उस आश्रमका दर्शनकर प्रसन्नचित्त राजाको परम आनन्दका अनुभव हुआ। उन्होंने मुनि भृशुण्डीको दण्डवत् प्रणाम किया और उन्हें अपने पुत्रके विवाहका समाचार, भृशुण्डीद्वारा की गयी विनायककी पूजा और विनायकद्वारा प्राप्त आज्ञाका सम्पूर्ण वृत्तान्त भी बतलाया। तदनन्तर राजाने यह भी प्रार्थना की कि आप मेरे भवनमें चलनेका कष्ट करें ॥ २७-२८ ॥ ऋषि बोले-हे महाराज ! यह बतायें कि आप कौन हैं और आपके वे विनायक कौन हैं? ॥ २८ १/२ ॥ राजा बोले-मुझे आप सूर्यवंशमें उत्पन्न जानें और मैं काशिराज इस नामसे विख्यात हूँ। आपके वे अभीष्टदेव विनायक महर्षि कश्यपके पुत्र हैं। उन्हें भोजन करानेके लिये जब मैं उनके पास निमन्त्रण देने गया, तब मैंने उनके द्वारा आपके महान् यशका वर्णन सुना। आपने चतुर्थी तिथिको विविध उपहार-सामग्रियोंसे जो उन विनायकका पूजन किया था, उन्होंने मेरे नगरमें भोजन आदिसे तृप्त हो जानेपर उन अवशिष्ट सामग्रियोंको मुझे दिखलाया था ॥ २९-३१॥ उन्होंने मुझसे कहा है कि हे राजन् ! मेरा नाममात्र लेनेसे वे मुनि स्वयं यहाँ आ जायेंगे। अतः हे महामुने ! मैं आपको अपने नगरमें ले जानेके लिये आपसे प्रार्थना करनेहेतु यहाँ आया हूँ। आपका दर्शन भी इन चक्षुओंसे करना अत्यन्त दुर्लभ है, इसलिये मैं यहाँ आया हूँ ॥ ३२१/२॥ ब्रह्माजी बोले-काशिराजके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे मुनि भृशुण्डी अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये और बोले-'क्या यह सत्य है अथवा असत्य है? जो विनायकदेव वेदोंके जाननेवालोंके लिये भी अगोचर हैं, वेदान्तशास्त्रके मर्मज्ञोंके मनसे भी परे हैं, वे ही परमात्मा गणेश आपके भवनमें कैसे स्थित हैं? इस विषयमें मेरे मनमें सन्देह हो रहा है। तैंतीस करोड़ देवता जिसके दर्शनके लिये आये हों, वह मैं आपके वचनको मानकर अपने आश्रमको छोड़कर कैसे आपके साथ जा सकता हूँ? हे राजन् ! यदि वे देव विनायक आपके भवनमें स्थित हैं तो आप उनके यथार्थ स्वरूपका वर्णन कीजिये, तभी मैं आपके घर चल सकता हूँ' ॥ ३३-३६ १/२॥ राजा बोले-उनके अनन्त स्वरूप हैं, जिनकी गणना करनेमें ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं और न सहस्र मुखवाले शेष ही समर्थ हैं। इसलिये हे द्विज ! तब उनके