भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 311

क्री०ख०-अ०१७] * काशिराज तथा भृशुण्डीको विनायकके यथार्थ स्वरूपका दर्शन * ३०९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] यथार्थ स्वरूपका वर्णन करनेमें अन्य कौन दूसरा समर्थ हो सकता है? हे मुने! इस समय वे महर्षि कश्यपजीके घरमें अवतीर्ण हुए हैं॥ ३७-३८॥ वे ‘विनायक’ इस नामसे तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हैं। उन सात वर्षके अद्भुत स्वरूपवाले बालक विनायकने महान् अद्भुत कर्म किये हैं। जिन कर्मोंको करनेमें साक्षात् जगदीश्वर भी समर्थ नहीं हैं, उन कर्मोंको उन्होंने किया है॥ ३९-४०॥ मेरे घरमें वे जिस स्वरूपसे निवास कर रहे हैं, उस स्वरूपको मैं आपको बताऊँगा। वे देवाधिदेव इस समय मेरे यहाँ ब्रह्मचारीके रूपमें स्थित हैं॥ ४१॥ जिस समय उन्होंने महर्षि कश्यपके घरमें अवतार धारण किया था, उस समय उनकी कान्ति अत्यन्त दिव्य थी। वे चार भुजाओंवाले थे, दिव्य माला तथा वस्त्रोंको उन्होंने धारण कर रखा था, दिव्य अलंकारोंसे विभूषित थे। उन्होंने दिव्य आयुध धारण कर रखा था, वे अत्यन्त बुद्धिमान् थे, दिव्य सुगन्धित द्रव्योंका अनुलेपन उनके अंगोंमें अनुलेपित था। तदनन्तर महर्षि कश्यपके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर उन्होंने तत्क्षण ही सामान्य शिशुका रूप धारण कर लिया था॥ ४२-४३॥ मुनि भृशुण्डी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! जिन परमेश्वरका मैं ध्यान करता हूँ और जिनकी कृपासे देवताओं तथा ऋषियोंके लिये भी दुर्लभ ये मेरी सूँड निकली है, वे आपके द्वारा बताये गये स्वरूपवाले नहीं हैं, वे मेरे देव

[दायाँ स्तम्भ] यदि मुझे बुलायेंगे तो मैं जहाँ-कहीं भी चला जाऊँगा॥ ४४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—मुनि भृशुण्डीके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर राजा अत्यन्त चिन्ताग्रस्त हो गये और बोले—इस समय मेरे सौभाग्यके साथ ही महान् दुर्भाग्यका भी उदय हो गया है। आपसे आशा लगाकर मैं महाभयंकर पर्वतों और वनोंको पार करके यहाँ आया हूँ और आपका दुर्लभ दर्शन मैंने प्राप्त किया है। हे विभो! मैं आपको अपने भवनमें ले जानेके लिये जबरदस्ती नहीं करूँगा॥ ४५-४७॥ यह सुनकर मुनि दयार्द्र हो उठे, उन्होंने राजाके सिरपर हाथ रखा और कहा—'हे राजन्! आप अपनी आँखें बन्द करें।' इस प्रकारसे कहे गये उन काशिराजने मुनिके कथनानुसार अपनी आँखें बन्द कर लीं॥ ४८॥ क्षणभर बाद जब राजाने अपनी आँखोंको खोला तो उन्होंने देखा कि वे मुनिकी कृपासे अपने घरमें स्थित हैं। तदनन्तर काशिराजने विनायकदेवको वह सारा समाचार बतलाया। राजा मुनि भृशुण्डीके दर्शनसे अत्यन्त आनन्दित थे, लेकिन उनके न आनेसे वे बहुत दुखी भी थे॥ ४९-५०॥ राजाने कहा—'वे मुनि भृशुण्डी आपके कथनको सुनानेपर और मेरे प्रयत्न करनेपर भी नहीं आये। ब्राह्मणोंके साथ बलका प्रयोग करनेपर वे सब भस्म कर देते हैं, इसी कारण मैंने कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की'॥ ५१॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'काशिराजके प्रत्यागमनका वर्णन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६॥

सत्रहवाँ अध्याय काशिराज तथा गजाननभक्त मुनि भृशुण्डीको विनायकद्वारा अपने यथार्थ स्वरूपका दर्शन कराना, विनायकके 'आशापूरक' नामकी प्रसिद्धि

[बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी बोले—सर्वज्ञ होनेपर भी विनायकदेवने मुनि भृशुण्डीके आश्रमसे वापस आये हुए नृपश्रेष्ठ काशिराजसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें बड़े ही आदरपूर्वक पूछा—॥ १ ॥ वहाँ जाकर आपने क्या कहा और उन्होंने क्या

[दायाँ स्तम्भ] उत्तर दिया? हे राजन्! मुझे वह सब विस्तारसे बताइये। वह सब सुनकर मैं आपको युक्ति प्रदान करूँगा॥ २॥ राजा बोले—उन भृशुण्डीजीको मैंने आपकी कही हुई बात बतायी और स्वयं भी मैंने उनसे यहाँ आनेके लिये बहुत प्रार्थना की। इसपर वे मुनि बोले—