श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 312, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ]
‘आप कौन हैं, तथा वे विनायक कौन हैं ?॥ ३॥ यदि वे विनायक मेरे उपास्यदेवके अनुरूप स्वरूपवाले होंगे तो मैं अवश्य उनके दर्शनके लिये जाऊँगा।' इस प्रकार उनके द्वारा मना कर दिये जानेपर जब मैं किस प्रकार लम्बे मार्गको तय करूँगा, इस प्रकारकी चिन्ता कर ही रहा था तो उन्होंने मेरे सिरपर हाथ रखकर आँखें बन्द करनेको कहा और फिर मुझे मेरे घर प्रेषित कर दिया। क्षणभरके बाद जब मैंने आँखें खोलीं तो हे देव! मैंने अपनेको आपके समक्ष अपने घरमें स्थित पाया। उन मुनि भृशुण्डीजीके आश्रम-मण्डलका स्मरणकर मेरे चित्तमें महान् हर्ष हो रहा है। राजाके इस प्रकारके वचनको सुनकर विनायकदेव हँस पड़े॥ ४-६$^{१}/_{२}$॥ विनायक बोले—हे नृपश्रेष्ठ! इस समय आप थक गये हैं, फिर भी पुनः उन भृशुण्डीके आश्रममें जाइये। मेरा 'गजानन' यह नाम सुनते ही वे मुनि यहाँ अवश्य आ जायँगे। उन सर्वस्वरूप धारण करनेवाले विनायकदेवके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन काशिराजने [फिरसे] अपनेको महर्षि भृशुण्डीके आश्रममें स्थित देखा। काशिराजको पुनः आया हुआ देखकर महर्षि भृशुण्डी अपने मनमें यह तर्क-वितर्क करने लगे कि ये राजा पुनः यहाँ क्यों आये हैं अथवा ये अब क्या कहेंगे? तदनन्तर राजा उन मुनिश्रेष्ठ भृशुण्डीजीको प्रणामकर बोले—॥ ७-१०॥ हे विप्र! आपके स्वामी 'गजानन' ने आपको बुलाया है। 'गजानन' यह नाम सुनते ही वे अत्यन्त प्रफुल्लित हो उठे और मूर्च्छित-से हो गये॥ ११॥ उनके शरीरमें रोमांच हो आया और आनन्दमें निमग्न होनेके कारण उनके नेत्रोंसे आनन्दाश्रु बहने लगे। 'यदि मेरे पंख होते तो मैं उड़कर वहाँ चला जाता'॥ १२॥ इस प्रकारकी उत्कण्ठावाले वे विप्र भृशुण्डी राजाके साथ चल पड़े। कभी भी इधर-उधर नहीं चलनेवाले वे भृशुण्डीमुनि जब चलने लगे तो अचल पृथ्वी भी चलायमान हो उठी। वे पृथ्वीदेवी काँपते हुए उनके पास आकर उन मुनिसे कहने लगीं—'हे मुनिश्रेष्ठ! आप मेरी रक्षा करें।' तब मुनि बोले—'हे धरे! तुम्हें
[दायाँ स्तम्भ]
मुझसे कोई भय नहीं है'॥ १३-१४॥ अपने स्वामी गजाननका दर्शन करनेके लिये मैं शीघ्रतासे जा रहा हूँ, उन पृथ्वीदेवीसे ऐसा कहकर वे श्रेष्ठ द्विज आगे जानेके लिये चल दिये॥ १५॥ तीसरा पग आगे बढ़ानेके बाद उन्होंने [राजाको] वह काशीपुरी दिखलायी, अपनी नगरी काशीको देखकर राजा हर्षित होकर उन मुनिश्रेष्ठसे बोले—॥ १६॥ आपकी कृपासे अत्यन्त वेगपूर्वक चलनेसे हम शीघ्र ही काशीनगरीमें पहुँच गये हैं। हे मुने! आप-जैसे तपस्वी तथा जपपरायण जनोंकी महिमा अत्यन्त दुर्ज्ञेय है॥ १७॥ ऐसा कहनेके अनन्तर वे नृपश्रेष्ठ काशिराज शीघ्र ही उन मुनिको अपने भवनमें ले गये। राजाने उन्हें सुवर्णके आसनपर विराजमानकर पाद्य, अर्घ्य तथा विष्टर आदिद्वारा महान् भक्तिसे उनकी पूजा की॥ १८$^{१}/{२}$॥ ऋषि बोले—हे राजन्! आपने मेरे साथ छल किया है, मैं यहाँ गजाननको कहीं नहीं देख रहा हूँ। शीघ्र ही उन्हें दिखाओ, नहीं तो मैं आपको शाप देकर अपने आश्रम चला जाऊँगा॥ १९$^{१}/{२}$॥ राजा बोले—वे गजानन बालरूप होकर बालकोंके साथ खेल खेल रहे हैं, जैसे कोई वीर धूलसे धूसरित होकर सुशोभित होता है, वैसे ही विनायक भी सुशोभित हो रहे हैं। तब उन भृशुण्डीमुनिने विनायकदेवको देखा, वे अपनी सूँड़से सुशोभित हो रहे थे। करोड़ों सूर्योंके समान उनकी आभा थी, वे दो भुजाओं और दो दाँतोंवाले थे। तदनन्तर मुनि कुपित होकर राजासे बोले—'मैं इन्हें कैसे नमस्कार कर सकता हूँ?॥ २०-२२॥ हे राजन्! उस महान् पुरुषको धिक्कार है, जो कि अपनेसे छोटेको नमस्कार करता है। हाथीके गण्डस्थलको विदीर्ण करनेवाला सिंह क्या कभी घासको खाता है?'॥ २३॥ ब्रह्माजी बोले—उन बालक विनायकने जब मुनि भृशुण्डीके वचनोंको सुना तो लीलाके लिये शरीर धारण किये हुए प्रभु कौतूहलसे समन्वित हो गये और मुनिसे बोले—॥ २४॥ विनायक बोले—हे मुनि भृशुण्डी! आपके वे स्वामी किस स्वरूपके हैं, इस समय आप मुझे बतायें॥ २४$^{१}/_{२}$॥