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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 656 में से

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पृष्ठ 313

क्री०ख०-अ०१७] * काशिराज तथा भृशुण्डीको विनायकके यथार्थ स्वरूपका दर्शन * ३११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मुनि बोले—मेरे वे स्वामी दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले हैं, उनकी दस भुजाएँ हैं, उनके कण्ठदेशमें मोतियोंकी माला सुशोभित रहती है। वे अपनी सिद्धि तथा बुद्धि नामक पत्नियोंसे समन्वित रहते हैं। उनके कानोंमें कुण्डल सुशोभित रहते हैं। उनका मुख सूँड़से युक्त है, उनके कान लम्बे हैं। वे सिन्दूरसे अनुलेपित रहते हैं। उनकी विशाल नाभि शेषनागसे सुशोभित रहती है, उनके चरणोंसे नूपुरोंकी ध्वनि होती रहती है। वे महान् मुकुटसे शोभाको प्राप्त होते हैं, उनके दस हाथोंमें दस आयुध विद्यमान रहते हैं। उनके एक दाँत है, उनके मस्तकपर चन्द्रमा विराजमान हैं। उनके कटिदेशमें छोटी-छोटी घण्टियाँ विराजित रहती हैं, उनका वाहन मयूर है और देवतागण उनकी चरणपादुकाओंकी वन्दना करते रहते हैं॥ २५-२८॥ ब्रह्माजी बोले—उनका इस प्रकारका वचन सुनकर बालक विनायकने उसी प्रकारका स्वरूप धारण कर लिया, वे कमलके आसनपर विराजमान थे और सृष्टि, रक्षा तथा संहार करनेवाले थे॥ २९॥ मुनि भृशुण्डी अपने उपास्यदेव उन गजाननका दर्शनकर अत्यधिक प्रेमके वशीभूत हो गये, उन्हें प्रणाम करनेकी भी सुध-बुध नहीं रही, वे जमीनपर लोट गये। उनके शरीरमें रोमांच हो आया, परमानन्दमें निमग्न हो वे नाचने लगे। जब उन्हें शरीरका भान हुआ, तब उन्होंने यथाविधि उन्हें प्रणाम किया॥ ३०-३१॥ पृथक्-पृथक् उपचार-द्रव्योंसे उन्होंने पूजा की। [आराध्य और आराधकका दर्शनकर] राजा बोले— आज मेरे पूर्वजन्ममें किये गये महान् पुण्यफलका उदय हो गया। आज मैंने देव विनायकके भक्त होनेके अद्भुत सुखका अनुभव किया है। तदनन्तर काशिराजने उन विनायकदेव तथा मुनिवर भृशुण्डीजीका यथाविधि अभिवन्दन-पूजन किया॥ ३२-३३॥ ऊँचे आसनोंपर विराजमान वे दोनों परस्परमें वार्तालाप करने लगे। परमात्मा देव विनायकने अपनी दसों भुजाओंसे मुनि भृशुण्डीका आलिंगन किया और अत्यन्त हर्ष प्रकट किया। उन दोनोंको इस प्रकारसे प्रेमवश गद्गद देखकर काशिराजकी भी आँखोंसे आँसू निकल पड़े॥ ३४ १/२ ॥ गजानन बोले—आपकी श्रद्धा-निष्ठा मुझे ज्ञात है, इस विषयमें काशिराजने भी मुझे बता दिया था। आपकी भावनाके अनुसार ही मैंने यह दस भुजाओंसे मण्डित विग्रह धारण किया। हे मुने! अन्य दूसरे लोग भी जिस-जिस भावसे मेरा ध्यानकर मेरा भजन करते हैं, मैं उनकी भावनाके अनुसार वैसा ही रूप धारण करता हूँ और जो अनन्य भावसे विश्वासपूर्वक मेरी भक्ति करते हैं, उन्हें मैं उनका मनोभिलषित फल प्रदान करता हूँ॥ ३५-३७॥ दुराचारी राक्षसोंके भयसे भयभीत देवी पृथ्वी सत्यलोकमें ब्रह्माजीकी शरणमें गयी थीं, तब ब्रह्माजीने मुझे दुष्टोंके वधके लिये प्रेरित किया था। देवमाता अदितिको दिये गये वरदानके कारण मैं महर्षि कश्यपके पुत्रके रूपमें 'कश्यपनन्दन' नामसे अवतरित हुआ। मैं पृथ्वीके भारको दूर करूँगा और इन्द्र आदि देवताओंको उनका अपना पूर्व स्थान प्रदान करूँगा और दैत्योंका अनेक बार विनाश करूँगा। [हे मुने!] आपकी अत्यन्त उत्कट साधनाको देखकर ही मैंने इस प्रकारका स्वरूप धारण किया है। मैं देवान्तक राक्षसको उसके भाईसहित मारकर अपने धामको चला जाऊँगा॥ ३८-४० १/२ ॥ ऋषि बोले—हे प्रभो! आपके सभी लोगोंको सुख प्रदान करनेवाले; सभी प्रकारके क्लेशोंका हरण करनेवाले, सभी देवताओंद्वारा वन्द्य तथा मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले युगल चरणोंका दर्शनकर और आपको साक्षात् अपने समक्ष पाकर आज मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, पवित्र हो गया हूँ॥ ४१-४२॥ हे विश्वात्मन्! मुझे वर प्रदान करें, जिससे कि मैं तृप्त हो जाऊँ। हे विघ्नरक्षक! जब-जब भी मैं आपके इस स्वरूपका ध्यान करूँगा, तब-तब हे करुणानिधान! आप मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दीजियेगा तथा आपका 'आशापूरक' अर्थात् आशाको पूर्ण करनेवाला यह नाम प्रसिद्धिको प्राप्त हो जाय॥ ४३-४४॥ गजानन बोले—जब-जब आप मेरे दर्शनोंकी