भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 656 में से

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३१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अभिलाषा रखेंगे, तब-तब मैं आपके पास उपस्थित हो | मुनि भृशुण्डी भी पद्मासन लगाकर उनके ध्यानमें स्थित जाऊँगा और आपने बड़े ही भक्तिभावपूर्वक जो मेरा | हो गये। उस समय वहाँ लोग विनायककी वैसी अद्भुत ‘आशापूरक’ नाम रखा है, यह भी प्रसिद्धिको प्राप्त हो | लीला देखकर परम आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ४८-४९ ॥ जायगा ॥ ४५ ॥ | परमात्मा विनायकके बालरूपमें किये गये चरित्रको ब्रह्माजी बोले—इन वरोंको प्राप्तकर मुनि भृशुण्डीने | देखकर काशिराज बोल उठे—‘इस संसारमें मेरा जन्म अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें प्रणाम किया। उन मुनिके | लेना धन्य हो गया; क्योंकि मैंने ब्रह्मा आदि देवोंके लिये द्वारा प्रणाम करनेपर गजाननने उन द्विजके मस्तकपर | भी अत्यन्त दुर्लभ गजाननके इस स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन धीरेसे हाथ रखा और पुनः उनसे कहा—‘हे ब्रह्मन्! | किया है’॥ ५०१/२ ॥ जो-जो भी आपका अभीष्ट होगा, वह सब निश्चित | तदनन्तर अत्यन्त प्रसन्न मनवाले काशिराज उन रूपसे पूर्ण होगा। हे मुने! आपको कभी भी मेरा | बालक विनायकका हाथ पकड़कर उन्हें भवनके अन्दर विस्मरण नहीं होगा’॥ ४६-४७१/२ ॥ | ले गये। उन्हें स्वादिष्ट अन्नका भोजन कराया और ब्रह्माजी बोले—इतना कहनेके अनन्तर वे विनायक | पूर्वकी भाँति शयन कराया। हे मुने! उनसे अनुमति लेकर बालकका रूप धारणकर पुनः बालक्रीडा करने लगे। वे | स्वयं राजा भी सो गये ॥ ५१-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत ‘मुनि (भृशुण्डी)-को वर प्रदान करनेका वर्णन’ नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥ अठारहवाँ अध्याय बालक विनायकके बालचरितके वर्णन-प्रसंगमें एक दैत्यका ज्योतिषी बनकर काशिराजके दरबारमें आना और विनायकद्वारा उसका वध व्यासजी बोले—हे लोकेश्वर! दूसरा दिन हो | सिरपर बहुत बड़ी पगड़ी पहने हुए था। वह अपने जानेपर कौन-सी बात हुई, उसे मुझे बताइये, सुनते हुए | शरीरके बारह अंगोंमें गोपीचन्दनका तिलक लगाये हुए भी मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ ॥ १ ॥ | था। उसकी दाढ़ी बहुत विशाल थी। वह ज्योतिषी ब्रह्माजी बोले—हे ब्रह्मन्! मैं विनायकदेवद्वारा | काशिराजके समीपमें आया, जबतक वह पासमें पहुँचता, किये गये दिव्य चरित्रको संक्षेपमें बताता हूँ, उसे आप | उससे पूर्व ही राजाने उसे प्रणाम किया ॥ ५-६ ॥ सावधान होकर सुनें, वह कथा सभी प्रकारके पापोंका | राजा अपने आसनसे उठ खड़े हुए और अपने विनाश करनेवाली है ॥ २ ॥ | आसनके समीप ही उसको आदरपूर्वक बिठाया। उससे भगवान् सूर्यके उदय हो जानेपर काशिराज तथा | कुशल पूछी, आगमनका कारण पूछा और यह भी पूछा बालक विनायकने अपना नित्य कर्म सम्पन्न किया। | कि किस स्थानसे आना हुआ है ॥ ७ ॥ तदनन्तर बालक विनायक तो खेल करनेके लिये चले | हे विप्रेन्द्र! आपका क्या नाम है, आप किस गये और राजा राजसभामें भद्रासनपर विराजमान हुए ॥ ३ ॥ | विद्याके ज्ञाता हैं और आपने कौन-सी साधना की है? उसी समय एक दैत्य ब्राह्मणका वेष धारण करके | हे मुने! हे कृपानिधे! ये सारी बातें मुझपर कृपाकर वहाँ आया। वह ज्योतिःशास्त्रमें पारंगत था, उसने अपने | सत्य-सत्य बतलायें ॥ ८ ॥ बायें हाथमें ताड़पत्रसे बनी पुस्तक और दाहिने हाथमें | ब्रह्माजी बोले—हे महामुनि व्यासजी! इस प्रकारसे जपमाला धारण कर रखी थी ॥ ४ ॥ | पूछे गये उस छद्मरूपधारीने शीघ्र ही आशीर्वाद प्रदान वह गुलाबी रंगके वस्त्र धारण किये हुए था तथा | किया और क्रमशः उन सभी प्रश्नोंका उत्तर दिया, जो