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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 656 में से

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पृष्ठ 315

क्री०ख०-अ०१८] * बालक विनायकका ज्योतिषी बनकर आये दैत्यका वध करना * ३१३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

राजाने पूछे थे। [वह बोला-] हे राजकुँअर! मेरा 'हेमज्योतिर्विद्' यह नाम है। मैं गन्धर्वलोकसे आया हूँ और निवासके लिये आपका आश्रय चाहता हूँ॥९-१०॥ मैं भूत, भविष्य तथा वर्तमानकालकी सभी घटनाओं तथा अरिष्ट-निवारण-सम्बन्धी शान्तिकर्मोंको जानता हूँ। हे निष्पाप! आप जिन-जिन प्रश्नोंको पूछेंगे, मैं उन सभीका उत्तर प्रदान करूँगा ॥ ११ ॥ हे राजन्! आपके यहाँ जो अरिष्ट आये हैं, उन सबका मुझे ज्ञान है, आपके लिये भविष्यमें आनेवाले अरिष्टोंके लक्षणोंको जानकर ही मैं यहाँ आया हूँ। हे नृपश्रेष्ठ! इसीलिये मुझे आपके राज्याश्रयमें रहनेकी इच्छा है॥ १२१/२ ॥ राजा बोले- हे महामुने! किस कारणसे यहाँ अरिष्ट उत्पन्न हो रहे हैं तथा आगे भी कौन-कौन अरिष्ट होंगे? आप उन्हें सत्य-सत्य मुझे बतायें। आपमें विश्वास हो जानेपर ही मैं आपको अपने भवनमें निवास प्रदान करूँगा। इतना ही नहीं, मैं आपको योग-क्षेम करनेवाली आजीविका भी प्रदान करूँगा ॥ १३-१४१/२ ॥ ज्योतिषी बोला- हे राजपुत्र! कश्यपका पुत्र विनायक जबतक आपके घरमें रहेगा, तबतक निश्चित ही अनेक विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न होंगी; क्योंकि वह विघ्नोंका स्वामी है, अतः उसे आप किसी निर्जन वनमें छोड़ आइये ॥ १५-१६ ॥ ऐसा होनेपर आपके घरमें तथा नगरमें कहीं कोई विघ्न नहीं होंगे, इसके यहाँ स्थित रहनेपर जल सारे नगरको डुबो डालेगा ॥ १७॥ यदि वह जल किसी प्रकार नष्ट भी हो जायगा तो वायुद्वारा प्रेरित पर्वत नगरको निश्चित ही चूर-चूर कर डालेंगे। हे राजन्! इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १८॥ आप यह क्यों नहीं जान रहे हैं कि इसके आनेसे पूर्व कोई उपद्रव नहीं होते थे। अपने पतनकी सम्भावनाको देखनेवाले राजाको चाहिये कि वह कपट करनेवाले, लोभी, अपवित्र, अत्यन्त शूरवीर तथा अत्यधिक अभिलाषा रखनेवाले व्यक्तिपर कभी भी विश्वास नहीं करे; क्योंकि राज्यकी प्राप्तिकी अत्यधिक इच्छा रखनेवाले ये लोग


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

राजाकी हत्यातक कर देते हैं ॥ १९-२० ॥ आपका राज्य आपके हाथसे छिन जायगा, इसे जानकर ही मैं आपको यह सब बतानेके लिये यहाँ आया हूँ। जानकार व्यक्तिको यह चाहिये कि वह राजाको उसके हितकी तथा उसके अहितकी बात अवश्य बतलाये। हे राजन्! मेरी बातपर विचार करके जैसी आपकी इच्छा हो, वैसा करें ॥ २११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- उस छद्म ज्योतिषीकी बात सुनकर राजाने उससे कहा- ॥ २२ ॥ राजा बोले- हे मुने! आपने अपने भूत और भविष्यके ज्ञानके बलपर जो सब कुछ मुझसे कहा है, वह मुझे उसी प्रकार मिथ्या प्रतीत हो रहा है, जैसे कि तत्त्वज्ञान हो जानेपर यह जगत्-प्रपंच मिथ्या भासित होता है। आपकी कही हुई बातोंपर विश्वास होनेपर मैं आपको आजीविका प्रदान करूँगा। हे गणकश्रेष्ठ! आपने अभी इस बालकको ठीकसे जाना नहीं है ॥ २३-२४॥ यदि यह बालक चाहे तो दूसरे ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरसहित बहुत-से ब्रह्माण्डोंकी रचना कर सकता है। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यदि आपको अपने कथनपर पक्का विश्वास है तो इसे आप स्वयं गहन घनघोर वनमें छोड़कर पुनः यहाँ वापस आ जायें ॥ २५-२६ ॥ लोगोंसे द्वेष रखनेवाले अनेक बलवान्से भी बलवान् [राक्षसों]-को इसने मार गिराया है, फिर स्वयंसे ही द्वेष रखनेवालेको यह कैसे जीवित रखेगा ? ॥ २७ ॥ इस बालकके मनमें किसीके प्रति अनिष्टकी भावना हो, ऐसा हम सोच भी नहीं सकते। इसने काशी नगरी तथा सम्पूर्ण राज्यकी अनेक उत्पातोंसे अनेक बार रक्षा की है। जो इन्द्र नहीं है, उसे यह इन्द्र बनानेकी क्षमता रखता है। यह शक्तिरहितको शक्तिसम्पन्न, लघुको गुरु, उच्चको नीच, नीचको उच्च तथा समर्थको असमर्थ बना सकता है ॥ २८-२९ ॥ राजाकी बात सुनकर वह ज्योतिषी क्रोधसे लाल हो गया। अपना मुख नीचे करके उसने पुनः कुछ कहना प्रारम्भ किया ॥ ३० ॥ मैंने तो आपके हितकी ही बात कही थी, किंतु