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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 656 में से

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पृष्ठ 416

४१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

मुखमें रख लिया तो उसी समय राजा और मन्त्रिपुत्र भी विनायकके मुखमें चले गये। उन सबने विनायकदेवके उदरदेशमें समस्त विश्वका अवलोकन किया॥ ७-९॥ विनायकदेवके उदरमें भ्रमण करते हुए उन लोगोंने पर्वत, वृक्ष, सरिता, सागर, वापी तथा तडागोंसे समन्वित, मनुष्योंसे भरी हुई सप्तद्वीपवती पृथिवीको देखा। देवता, गन्धर्व, मुनिजन, सिद्धगण, यक्ष, निशाचर, सर्प और अप्सराओंसे शोभायमान स्वर्गादि ऊर्ध्ववर्ती लोकोंको देखा और पाताल आदि सात अधोलोकोंको भी उस समय देखा ॥ १०-१११/२ ॥ इस प्रकार विनायकके उदरदेशमें स्थित विविध कोष्ठों (उदरके अन्तराल)-में भाँति-भाँतिके ब्रह्माण्ड- समूहोंको उन्होंने देखा। उनका चित्त विस्मयाविष्ट हो गया था। तदुपरान्त उन्होंने उद्विग्न होकर देवदेव विनायककी शरण ली और मनोयोगपूर्वक वे विनायकदेवसे प्रार्थना करने लगे- 'हे कृपानिधे ! उद्विग्न चित्तसे भटकते हुए हमलोगोंपर आप अनुग्रह कीजिये' ॥ १२-१४॥ तब बालरूपधारी विभु विनायकने [उनके अन्तःकरणमें प्रकट होकर] काशिराज और मन्त्रिपुत्रोंको मार्ग दिखलाया। फिर रोमांचित हुए विनायकदेवके रोमकूपोंसे वे लोग बाहर निकल आये तथा पूर्वकी भाँति काशिराजने अपने नगरको सर्वथा सुरक्षित देखा। राजाने बालरूपमें क्रीड़ा करते हुए कश्यपपुत्र उन विनायकको देखकर और उन्हींकी अनुकम्पासे विचार-सामर्थ्य प्राप्त करके बड़ी ही प्रसन्नतासे उनका स्तवन किया - ॥ १५-१६१/२ ॥ राजा बोले- हे नाथ! मैंने आपके कुक्षिदेशमें स्थित होकर आपकी परम मायाका परिचय पा लिया है। आप ही देवता, मनुष्य, दिशा, [विविध प्रकारके] स्वर्गों, सरिताओं और पाताल आदि अधोलोकोंको उत्पन्न करनेवाले हैं; क्योंकि आपके रोमकूपोंमें कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड विद्यमान है। [आपके उदरदेशमें] भटकते हुए मैंने आपके अनुग्रहसे उन सबको देखा है ॥ १७-१९॥ हे विश्वकर्ता! आपके आश्चर्यजनक क्रियाकलाप मैंने बहुत बार देखे हैं। मैं युद्ध करनेके लिये गया था और [उस युद्धभूमिमें मेरे साथ] सेना भी आयी थी। मेरी सेनाने नरान्तकके सैन्यबलको शीघ्र ही जीत लिया था और बादमें मन्त्रिपुत्रोंके साथ मैंने नरान्तकको संकटापन्न कर दिया, किंतु उसने एकाएक मेरी सेनाको परास्त करके क्षणभरमें मुझे भी बन्दी बना लिया ॥ २०-२११/२॥ तदुपरान्त मैंने अपने समस्त नगरको दग्ध होते देखा और बादमें उस कालपुरुषको भी देखा, जिसने नरान्तककी अनेक प्रकारकी सेनाको क्षणभरमें खा लिया था। वह पुरुष नरान्तकको पकड़कर आपके समीप आया और इसके पश्चात् वह कालपुरुष और हम सभी लोग आपके उदरमें प्रविष्ट हो गये। हे प्रभो! मैंने वहाँ भी आपका दर्शन किया। वहींपर हमने समग्र विस्तारके साथ सम्पूर्ण जम्बूद्वीपका भी दर्शन किया था ॥ २२-२४॥ हे जगदीश्वर ! ऐसे ही हमने उदरके दूसरे अन्तरालमें विस्तृत भूमण्डलको देखा। इस [विश्वप्रपंचको देखने]- के कारण उद्विग्न हम लोग आपके शरणापन्न हुए॥ २५॥ तदुपरान्त आपकी आज्ञासे रोमांचद्वार अर्थात् स्वाभाविक आनन्दवश उद्घाटित रोमकूपोंसे हम बाहर निकल आये। तदुपरान्त [बाहर भी] हमें अपना विशाल प्रासाद और बालरूपधारी आप दृष्टिगोचर हुए॥ २६॥ हे देव ! हे विभो ! यह कैसा आश्चर्यजनक मायाजाल है? वह पुरुष कौन है, जिसने [नरान्तककी] विशाल सेनाका भक्षण किया था? वह दैत्य नरान्तक किसके द्वारा पकड़ा गया था और किसने दैत्यको बचाया था तथा हम लोगोंको [बाहर] निकलनेके लिये किसने रोमांचद्वार दिखलाया था? हे देव ! मुझ भक्तके इस प्रकारके सन्देहको आप यत्नपूर्वक दूर कीजिये ॥ २७-२८१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-जब इस प्रकारका प्रश्न उन बुद्धिमान् नरेशने किया तो विनायकदेवने कृपापूर्वक उनके मस्तकपर अपना करतल रखा। तत्काल ही राजा दिव्यज्ञानसे सम्पन्न हो गये और उन काशिराजने बड़े ही भक्तिभावसे देवदेव विनायकका स्तवन किया - ॥ २९-३०१/२ ॥ राजा बोले- हे कश्यपात्मज ! आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा सूर्य हैं। पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, दिशाएँ, पर्वतोंसहित वृक्षराशि, सिद्धगण, गन्धर्वगण, यक्ष-राक्षसादि, मुनिगण और मनुष्य ये सभी आपका ही