श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 415, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०५९] * काशिराजकी नरान्तकसे मुक्ति * ४१३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उस कालपुरुषको देखा, तो उसके भयवश त्वरित गतिसे नरान्तक स्वर्ग जा पहुँचा। जब वहाँ भी उसने अपने पीछे आते हुए [उस] कालपुरुषको देखा तो वह धरातलपर कूद पड़ा और पातालमें प्रविष्ट हो गया। पातालमें जाते हुए नरान्तकको उस कालपुरुषने बाल पकड़कर वैसे ही खींच लिया, जैसे बिलमें प्रवेश करते हुए अतीव बलवान् सर्पको गरुड़ खींच लेते हैं ॥ ४१-४३ ॥ तदुपरान्त उस बलशाली कालपुरुषने नरान्तकसे कहा—'नरान्तक! कहाँ जाओगे, तुम तो मेरे सामने ही दीख रहे हो। अरे महापापी! तूने शिवके वरदानसे मदमत्त होकर देवताओं और ऋषियोंको सताया है तथा इतने मनुष्योंका संहार किया है, जिसकी कोई संख्या नहीं है ॥ ४४-४५ ॥ अरे दुष्ट! तेरा ही संहार करनेके लिये विनायकदेव अवतीर्ण हुए हैं। इसलिये समग्र अभिमानका त्यागकर उनकी शरणमें चला जा। उनके चरणकमलका अवलोकन करते ही तेरे सारे पाप विनष्ट हो जायेंगे' ॥ ४६ १/२ ॥ ऐसा कहकर वह कालपुरुष दैत्यराज नरान्तकको बलपूर्वक विनायकके समीप ले आया और फिर स्वामी विनायकदेवको प्रणाम करके कहने लगा— ॥ ४७-४८ ॥ 'हे विनायक! हे विभो! आपके आदेशानुसार मैंने विशाल दैत्यसेनाका पूर्णरूपसे भक्षण कर लिया है। इस नरान्तकने भी मुझे अत्यधिक पीड़ा पहुँचायी है, मैं इसे पकड़कर आपके पास ले आया हूँ। अब मुझे थकावट दूर करनेके लिये कोई शयनयोग्य स्थान प्रदान कीजिये और सबको सुखी करनेके लिये इसको मोक्ष दीजिये' ॥ ४९-५० ॥ कालपुरुषके ऐसे कथनको सुनकर उससे विभु विनायकने कहा—'तुम मेरे मुखके भीतर प्रविष्ट हो जाओ और इच्छानुरूप निद्रासुख प्राप्त करो।' विनायकके मुखसे निकली इस प्रकारकी उत्तम बात सुनकर वह पुरुष उनके मुखमें प्रविष्ट हुआ और उन्हींके स्वरूपमें विलीन हो गया। जैसे पृथिवीसे उद्भूत गन्ध उसीमें लीन हो जाती है, वैसे ही विनायकसे समुत्पन्न वह पुरुष उन्हींमें लीन हो गया ॥ ५१-५३ ॥ जो मनुष्य इस आदरणीय उत्तम आख्यानका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह निश्चय ही कामनाओंको सिद्ध करके अन्तमें मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'नरान्तकनिग्रह' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥ उनसठवाँ अध्याय काशिराजकी नरान्तकसे मुक्ति मुनि बोले—बालरूपधारी विनायकने उस पुरुषको कैसे उत्पन्न किया था, जिसने नरान्तककी सेनाका भक्षण किया और जो नरान्तकको [विनायकके समीप] ले आया था। यह बात मुझे स्पष्ट रूपसे बतलाइये, इस विषयमें मुझे अत्यधिक सन्देह हो रहा है ॥ १ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—जो परब्रह्म गुणोंसे परे है, वही ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मक विनायकके रूपमें सगुण-साकार होकर भास रहा है। वे विनायकदेव पृथ्वीका भार हरने, दुष्टोंका विनाश करने और स्वधर्म अर्थात् वेदानुमोदित धर्ममर्यादाके रक्षणके लिये अनन्तानन्त रूपोंको धारण करते हैं ॥ २-३ १/२ ॥ वे ही अपनी शक्तिसे विश्वकी रचना करते हैं, पालन करते हैं और संहार करते हैं। वे [यद्यपि स्वतन्त्र हैं, तथापि] लोक [-व्यवहारकी सिद्धि]-के लिये [उत्पत्ति- विनाशादिकी] निमित्तभूता पराशक्ति नियतिका अनुवर्तन करते हैं। इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये, क्योंकि वे विभु अनेकानेक मायाओंके आश्रय हैं ॥ ४-५ ॥ उनकी ही इच्छासे इस जगत्की सर्वविध प्रवृत्तियाँ होती हैं। अब मैं उनकी मायाका तुमसे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा ॥ ६ ॥ नरान्तकके द्वारा बन्दी बनाये गये मन्त्रिपुत्र और काशिराज जबतक राजधानी पहुँचते, उतने समयतक वह कालपुरुष दैत्यराजके द्वारा संरक्षित उस सेनाका भक्षण करता रहा। तदुपरान्त जब विनायकने उस कालपुरुषको