भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 656 में से

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पृष्ठ 414

४१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- योजनकी दीर्घतावाले थे ॥ १८ ॥ उन वीरोंका स्वामी क्रूर विनायकके समीप आकर पूछने लगा- 'हे प्रभो ! मेरे लिये क्या कर्तव्य है ? प्रभो ! मैं भूखा हूँ, अतः सर्वप्रथम आप मुझे तृप्ति देनेवाला भक्ष्य प्रदान कीजिये।' इस प्रकारसे निवेदन करते हुए उस वीरपुरुषसे विनायकने कहा- ॥ १९-२० ॥ 'नरान्तकके द्वारा भलीभाँति संरक्षित इस विशाल सेनाका तुम भक्षण करो और उस नरान्तकको मारकर शीघ्र ही उसका मस्तक मेरे पास ले आओ। अगर तुम उसकी सेनाको खाकर तृप्त न हो सके तो तुमको खानेके लिये कुछ और दूँगा।' कश्यपात्मज विनायकसे इस प्रकारकी आज्ञा प्राप्त करके [उसने] उनको प्रणाम किया और घोर गर्जन करके नरान्तकके समीप जा पहुँचा ॥ २१-२२१/२ ॥ उसकी घोर गर्जना और वैसे [भयावह] रूपके कारण नरान्तक तथा उसके सैनिक भयभीत हो गये और वे दसों दिशाओंमें भागने लगे। [तब वह क्रूर] उन सभी सैनिकोंको हाथमें ले-लेकर मुखमें डालने लगा। उस समय भूतलसे उठती धूलके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा था। उस घनघोर अँधेरेमें नरान्तकके सैनिक मशालोंके सहारे कुछ देख पा रहे थे ॥ २३-२५ ॥ उस भयानक पुरुषको देखकर कुछ सैनिकोंने प्राण त्याग दिये। जो मर चुके थे और जो जीवित थे, उन सभीको वह वेगपूर्वक खाता जा रहा था ॥ २६ ॥ इस प्रकार समस्त सेनाका विनाश होते देख नरान्तक अपने मनमें सोचने लगा कि' [अरे !] यह तो कालका भी काल आया हुआ है। अब मुझे क्या करना चाहिये, यह तो बड़ा ही बलवान् जान पड़ता है।' ऐसा कहते हुए उसने देखा कि आधी सेना तो खायी जा चुकी है ॥ २७-२८ ॥ [नरान्तक सोचने लगा कि अरे !] 'यह तो प्रलयाग्निके समान सेनाका बलपूर्वक संहार करनेमें लगा है। [यदि इसे रोका न गया तो] यह इस (सेना)-को वैसे ही निश्शेष कर देगा, जैसे महर्षि अगस्त्यने समुद्रको किया था' ॥ २९ ॥ उस समय सभी दैत्य सैनिक भयानक चीत्कार कर रहे थे। कुछ योद्धा खा लिये गये थे और कुछ चरणोंके आघातसे पीस डाले गये थे। कुछ उसकी श्वासवायुके आघातसे मर गये, तो कुछने केवल उसके भयसे ही प्राण त्याग दिये। [भागते हुए] सैनिक एक-दूसरेपर गिरते जा रहे थे ॥ ३०-३१॥ वे उस नरान्तकको चीखते हुए बुला रहे थे कि 'आइये, यहाँ आइये और हमें बचा लीजिये।' उधर वह (विनायकका गण) हाथके प्रहारसे सैनिकोंको मार- मारकर तत्काल ही उनको खाता जा रहा था ॥ ३२ ॥ असंख्य सैनिकोंको खा लेनेपर भी उसकी जठराग्नि शान्त नहीं हो पा रही थी। हे मुने ! उस गणने [इस प्रकारसे] अश्वारोहियों, गजारोहियों, रथारोहियों और पैदल सैनिकोंको खाया तथा हाथी आदि बहुतसे वाहक पशुओंको मार डाला ॥ ३३१/२ ॥ तब इस प्रकारके कोलाहलको सुनकर उस नरान्तकने धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ायी और भूतलपर अपने घुटने टेक करके दोनों [कन्धोंमें बँधे तरकसों]-से बाण निकालकर धनुषको खींचा तथा बाणवर्षा करने लगा ॥ ३४-३५ ॥ तब बाणवर्षाके कारण अँधेरा छा गया और [आकाशमें उड़ते] पक्षी तथा बहुत-से राजसैनिक भूतलपर गिरने लगे। दैत्यराज नरान्तकके द्वारा छोड़े गये बाणोंको वह पुरुष (विनायकका गण) निगलता जा रहा था। उसके रोमकूपोंमें असंख्य बाण प्रविष्ट होते जा रहे थे और उन (रोमकूपों)-से रुधिर बह रहा था। इसपर भी उसे अणुमात्र वेदना नहीं हो रही थी। तदुपरान्त नरान्तकने अपने सामर्थ्यसे [बहुत-सारे] अस्त्रोंको उत्पन्न किया ॥ ३६-३८ ॥ तब उस गणने उन सभी अस्त्रोंको वैसे ही निगल लिया, जैसे आजगरी (मादा अजगर) अण्डे निगल लेती है। नरान्तकके अस्त्र कुण्ठित हो गये, शस्त्र नष्ट हो गये और उसका बाणसंग्रह भी समाप्त हो चुका था। तब वह बलहीन दैत्यराज भाग निकला। उसके पीछे-पीछे वह कालपुरुष भी दौड़ने लगा ॥ ३९-४० ॥ भूतलपर दौड़ते-भटकते उस दैत्यने जब पीछा करते

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