भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 656 में से

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पृष्ठ 413

क्री०ख०-अ०५८] * काशिराजकी पत्नीका विलाप करना * ४११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अट््ठावनवाँ अध्याय काशिराजकी पत्नीका विलाप करना और विनायककी सिद्धि नामक शक्तिका विशाल सेना और क्रूर नामक कालपुरुषको प्रकट करना, कालपुरुषद्वारा नरान्तककी सेनाका भक्षणकर उसे विनायकके पास ले आना ब्रह्माजी बोले- इधर नरान्तक हर्षपूर्वक आधा ही मार्ग तय कर पाया था कि तबतक काशिराजकी पत्नीको यह सूचना प्राप्त हो गयी कि राजाको बन्दी बनाया गया है। राजपत्नी इस बातसे अतिशय शोकाकुल हो गयी और [असुरोंके द्वारा किये गये विनाशसे] जो बच निकले थे, वे नागरिक भी शोकमग्न हो गये। जलहीन सरोवरमें स्थित मछलियोंकी भाँति व्याकुल उन लोगोंने अत्यधिक क्रन्दन किया ॥ १-२ ॥ शत्रुओंके द्वारा पतिको बन्दी बनाये जानेसे व्याकुल हुई महारानी वायुवेगसे गिरे कदलीवृक्षकी भाँति भूतलपर गिर पड़ीं। उन्हें मूर्च्छा आ गयी और उनकी कान्ति नष्ट हो गयी। [कुछ समयके पश्चात् जब उन्हें चेतना हुई तो] वे सखियोंके साथ विलाप करने लगीं और रोती हुई बोलीं- ॥ ३१/२ ॥ अम्बा [राजभार्या] बोलीं-जो शत्रुओंका मर्दन करनेवाले, गजसेनाके संहारक और सिंहके सदृश वीरतापूर्ण चेष्टाओंवाले थे, वे काशिराज कैसे शृगालतुल्य दैत्यके द्वारा बलपूर्वक बन्दी बनाये गये ? दैत्यसमूहके विनाशक एवं मदमत्त हजारों हाथियोंके समान बलशाली मेरे स्वामीका बल कहाँ चला गया ? भगवान् महेश्वर मुझपर किसलिये रुष्ट हो गये ? कब मैं अपने पतिको देख सकूँगी ? ॥ ४-६॥ अब मैं किस देवताका आश्रय लूँ, जो उनको शीघ्र ही मुक्त करा सके ? कश्यपपुत्र विनायकके कारण राजाने प्रबल संग्राम किया। राजाका वह सब (शरणागतरक्षणका भाव) व्यर्थ हो गया। वे [कर्तव्याकर्तव्यके विषयमें] मोहग्रस्त हो गये और बालककी बातोंमें आकर व्यर्थमें ही प्रबल वैरियाँसे विरोध कर बैठे ॥ ७-८॥ पतिको बन्दी बना लेनेवाले उस महादैत्य नरान्तकको सबके बिना अर्थात् बिना सभी साधनोंसे सम्पन्न हुए कौन जीत सकेगा? आज तो मुझ मन्दभागिनीके लिये यह प्रलयकाल ही आ गया है। मुझको और पृथिवीको [अकारण ही] वैधव्य क्यों प्राप्त हुआ है ? उन (राजा)-के जैसा कोई करुणासागर कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता, जो हमें शरण दे सके ॥ ९-१० ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारके राजपत्नीके शोकपूर्ण उद्गार सुनकर बलवान् कश्यपपुत्र विनायकने बड़े जोरसे गर्जना की। वह गर्जनघोष ब्रह्माण्डको फाड़ देनेवाला जान पड़ता था ॥ ११ ॥ उनकी गर्जनासे प्रतिध्वनित आकाश और दिशाएँ भी गरज उठीं, जिससे पर्वतों और वनोंकी आधारभूमि सारी पृथ्वी काँप उठी। पक्षीगण गिर पड़े और मरने लगे तथा मनुष्योंमें विह्वलता छा गयी ॥ १२१/२ ॥ तदुपरान्त क्रोधसे विकृत नेत्रोंवाले विनायकने सिद्धि नामक शक्तिकी ओर देखकर कहा- 'अरे ! उस भीषण संग्रामके अवसरपर तू कहाँ चली गयी थी?' तब सिद्धिने विनायकके मनोभावको जानकर विविध प्रकारकी सेनाओंको प्रकट किया ॥ १३-१४॥ [सिद्धिद्वारा] प्रादुर्भूत हुए वे हजारों वीर भयानक मुखोंवाले थे। उनके दाँत हलके समान, जिह्वाएँ सर्प-जैसी और मस्तक पर्वतोंके समान विशाल थे ॥ १५ ॥ वे वीर इस प्रकारसे मुखोंको फैलाये थे, मानो एकाएक भूमण्डलको ही निगलना चाह रहे हों। उन महाबली पुरुषोंके सैकड़ों नेत्र थे और वे मुखसे अग्नि- ज्वालाएँ उगल रहे थे। उनके नथुनोंमें प्रविष्ट होकर बड़े-बड़े हाथी भी ओझल हो जाते थे और जिनके श्वासवेगसे चन्द्रमा और सूर्य भी भूतलपर गिर जाते थे ॥ १६-१७ ॥ जिनकी जटाएँ सम्पूर्ण पृथिवीको बुहार देती थीं और जिनके हाथ हजार योजन लम्बे तथा पैर दो हजार

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