श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 412, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- पापी ले जा रहे हैं, तो यह हमारे लिये बड़ी बदनामीकी बात होगी, अतः हम असुरोंसे युद्ध करेंगे। ऐसा कहकर उत्साहपूर्वक युद्ध करनेवाले उन नरेशने अपने अश्वको चलनेका संकेत किया और तत्काल धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर बाणवर्षा करने लगे ॥ २७-२८ ॥ काशिराजने धनुषसे वैसे ही बाण बरसाना आरम्भ किया, जैसे बादल जल बरसाते हैं। [उस बाणवर्षासे] सूर्य आच्छादित हो गया और दैत्य किंकर्तव्यविमूढ हो गये। उन बाणोंसे दैत्यवृन्द विनष्ट होने लगा। कुछ दैत्य मर गये, कुछ खण्ड-खण्ड हो गये और कुछ दैत्योंके चरण छिन्न-भिन्न हो गये ॥ २९-३० ॥ कुछ दैत्योंके पेट फट गये, कुछकी भुजाएँ कट गयीं, कुछकी आँखें फूट गयीं और कुछ दैत्योंकी जंघाएँ विदीर्ण हो गयीं। सेनाके साथ मन्त्रिगण काशिराजका अनुगमन कर रहे थे। उन सभीने मिलकर खड्ग, परशु आदि आयुधोंसे उन शत्रुसैनिकोंका संहार कर डाला ॥ ३१-३२ ॥ युद्धभूमिमें उनके प्रहारोंसे कुछ दैत्य मर गये और कुछ भूतलपर गिर पड़े। इधर वे दैत्य भी [राजाके पक्षके] सैनिकोंका महान् शस्त्रोंके द्वारा संहार करने लगे। सेनाके चक्र्रमणके कारण उठी हुई धूलसे भीषण अन्धकार छा गया, जिसके कारण वे सैनिक बिना पहचानके, अपने और पराये पक्षके योद्धाओंको शस्त्रोंसे मारने लगे तथा एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे मल्लयुद्ध करने लगे ॥ ३३-३४१/२ ॥ [उस समय] अश्वारोही अश्वारोहियोंसे, गजारोही गजारोहियोंसे, पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंसे तथा रथारोही रथारोहियोंसे [भाँति-भाँतिके] शस्त्रों, बाणों आदिके द्वारा युद्ध कर रहे थे। इस रीतिसे सैनिकवीरोंका वह भीषण संग्राम हो रहा था ॥ ३५-३६ ॥ [राजासे पराभूत हुई] दैत्यसेना तितर-बितर हो गयी और भागने लगी। तब विजयी काशिराजने उच्च स्वरसे सिंहके समान गर्जना की। तदुपरान्त युद्धोत्सुक हाथीके समान उत्साहपूर्वक वे विभिन्न सैन्य-समूहोंमें जा-जाकर, प्रमुख-प्रमुख योद्धाओंको मारते रहे, तथा उस महाभीषण सेनाको तितर-बितर करते हुए उन्होंने दैत्यसेनाके एक लाख वीरोंका संहार कर डाला ॥ ३७-३८१/२ ॥ इस प्रकारसे [सेनाका] विनाश करनेमें लगे उन नरेशको देखकर शत्रुसैनिकोंने [यत्नपूर्वक] रोका और 'यही काशिराज हैं' ऐसा निश्चय करके उन्हें सबने घेर लिया तथा राजाकी प्रबल बाणवर्षाको [किसी प्रकार] सहन करते हुए उनको शत्रुओंने बलपूर्वक बन्दी बना लिया ॥ ३९-४० ॥ मन्त्रिपुत्रोंके साथ राजाके बन्दी बना लिये जानेपर राजसैनिक उच्च स्वरसे 'राजा पकड़ लिये गये हैं' ऐसा कहते हुए चीत्कार करने लगे ॥ ४१ ॥ तदुपरान्त दैत्योंने कुछ राजसैनिकोंको पकड़ लिया, कुछ भाग निकले, कुछ मर गये, कुछ घायल हो गये और कुछ सैनिक दैत्योंके शरणापन्न हो गये। जैसे घनघोर जंगलमें बलशाली भेड़िये हृष्ट-पुष्ट बैलको पकड़ लेते हैं, वैसे ही नरान्तकके दूत मन्त्रिपुत्रोंके साथ राजाको [पकड़कर उन्हें] नरान्तकके समीप ले गये ॥ ४२-४३ ॥ अवरुद्ध न होनेयोग्य दैत्यसैनिकोंके द्वारा वह पूरा नगर जला दिया गया, तदुपरान्त नरान्तकने अपने शूर- वीर योद्धाओंसे कहा— हे वीरो ! जिस कार्यके लिये हम लोग आये थे, वह सम्पन्न हो चुका है। इस समय वह मुनिपुत्र विनायक मेरे लिये नगण्य ही है। जब राजा ही जीत लिया गया तो सेना भी पराजित है, किलेपर अधिकार हो जानेपर नगरको भी विजित ही मानना चाहिये। काशिराजके पराजित हो जानेसे निश्चय ही बालक विनायक भी पराजित हो चुका है ॥ ४४-४६ ॥ यह राजा विवश होकर अभी बालकको ले आयेगा—ऐसा कहकर [विजयसूचक] बाजे बजवाता हुआ नरान्तक अपनी राजधानीकी ओर चल पड़ा ॥ ४७ ॥ उस समय यशोगान करनेवाले बन्दीजन नरान्तकका स्तवन कर रहे थे, काशिराजको उसने अपने आगे कर रखा था और वह यशोगायक बन्दीजनोंको [वांछित] वस्तुएँ तथा ब्राह्मणोंको [दान] देता हुआ जा रहा था ॥ ४८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'राजनिग्रह' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५७ ॥