श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 411, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०५७ ] * काशिराजकी पराजय और नरान्तकका उन्हें बन्दी बना लेना * ४०९
[बायाँ स्तम्भ] प्रणाम किया और उनका स्मरण करते हुए अश्वपर आरूढ हुए ॥ ५-६ ॥ उनके भेरीरवको सुनकर सभी सैनिक [युद्धके लिये] तैयार हो गये और अत्यन्त उत्साहमें भरकर शीघ्रतापूर्वक पैदल तथा अश्व, गज, रथादिमें आरूढ़ हो चल पड़े। वे योद्धागण त्रिलोकीको निगलनेकी सामर्थ्यवाले थे। [इन सभी सैनिक वीरोंके साथ] वे नरेश नगरके पूर्वभागमें विद्यमान एक वेदीमें स्थित हो गये ॥ ७-८॥ राजाने मन्त्रियों तथा सभी सैनिकोंको धन-वस्त्रादिसे सन्तुष्ट किया और कहा कि आपलोग पराक्रम दिखलाइये, आज उसका अवसर आया है ॥ ९ ॥ यद्यपि विनायककी अनुकम्पासे हमें कहीं भी भय नहीं है, तथापि दैत्य बड़ा ही बलवान् है, इसने अपने पराक्रमसे सारी पृथ्वीको जीत लिया है ॥ १० ॥ विजयमें कोई नियम नहीं होता (कि इसकी ही विजय होगी) और मनुष्य प्रारब्धके अधीन होते हैं। मैं यह बात इसीलिये कह रहा हूँ, कि अपनी सेना शत्रुसेनाके लाखवें भागके भी बराबर नहीं है ॥ ११ ॥ कहाँ सागर और कहाँ घड़ाभर पानी, कहाँ सूर्य और कहाँ जुगुन्यू! सामनीतिका आश्रय लेनेवाले हम लोग तो राजलक्ष्मीके साथ उन (विनायक)-के द्वारा ही सुरक्षित रहे हैं। उन विनायकने कितने ही दैत्योंका वध किया था, जिसका अपराध अब बादमें हम लोगोंके सिरपर आया है। आज वह (नरान्तक) सामनीतिको त्यागकर युद्ध करने आया है, अतः जिससे हित हो, वैसा विचार करना चाहिये ॥ १२-१३ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-तब वहाँ स्थित महामन्त्रीने भयविह्वल राजासे कहा—'हे राजन्! बुद्धिशील चार लोगोंके साथ आप दैत्यराज नरान्तककी शरणमें चले जाइये; क्योंकि अपना काम बनानेके लिये नीचोंका आश्रय लेना भी कल्याणकारी है। हे राजेन्द्र ! आपको मैं बृहस्पतिका मत बता रहा हूँ, उसे सुनिये और सुनकर वैसा ही कीजिये, तो अवश्य ही कल्याण होगा' ॥ १४-१६ ॥ बृहस्पति कहते हैं— [आपत्तिग्रस्त पुरुषको चाहिये कि] वह कन्यादान, सहभोजन, वस्त्रादिका उपहार,
[दायाँ स्तम्भ] मधुर बातें, प्रणिपात, प्रीतिभाव, सहयात्रा, यशोगान, शत्रुके विश्वासपात्र जनोंका समर्थन आदि मुख्य उपायोंसे शत्रुओंका संहार कर दे ॥ १७ ॥ महामात्य बोला—[राजन् !] यदि वह [बदलेमें] विनायकको माँग ले तो उसे विनायकको भी सौंपकर राज्यकी रक्षा कर लेनी चाहिये। मुझे तो यही उचित जान पड़ता है, जिसमें आपका हित हो, उसीका निश्चय कीजिये ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले—तब सभी लोग राजासे बोले— 'हे नृप! वैरशान्तिके लिये महामात्यने सर्वथा उचित बात कही है, वही ठीक है, वही समर्थनीय है' ॥ १९ ॥ वे लोग इस प्रकार विचार ही कर रहे थे कि तभी उन अत्यन्त बलशाली सभी दैत्योंने टिड्डियोंके समान सेनाओंके द्वारा नगरको घेर लिया ॥ २० ॥ जब नगरवासी लोग [छिपनेके लिये] नगरके बीचमें गये तो उन पापियोंने उस नगरको ही जलाना आरम्भ किया। दसों दिशाओंमें प्रचण्ड अग्नि धधक उठी। धुएँके कारण सूर्यमण्डल आच्छादित हो गया, जिससे कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो संसारमें अति भयानक प्रलय ही आ गया हो ॥ २१-२२ ॥ जो लोग आगसे घबराकर बाहर निकल रहे थे, उनको शत्रु पकड़ लेते थे। [वे पापी नगरमें रहनेवाली] कुमारियों और युवतियोंको कुत्सित चेष्टाओंके द्वारा शीलभ्रष्ट कर रहे थे। [इस घृणित व्यवहारसे] अत्यधिक लज्जित कुछ स्त्रियाँ तत्काल प्राण त्याग दे रही थीं। कुछने नगरद्वारसे गिरकर आत्महत्या कर ली ॥ २३-२४ ॥ कुछ अन्य महिलाओंने विषभक्षण, शस्त्रघात तथा फाँसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। [दैत्यराजके] अनुचरोंने [बहुत-सी] सुन्दर स्त्रियोंको पकड़कर उन्हें अपने स्वामीके समीप पहुँचा दिया ॥ २५ ॥ नरान्तकने उन स्त्रियोंके साथ दुराचार करके उन्हें अपनी राजधानी भिजवा दिया। इस प्रकारकी विनाशलीलाको देखकर राजाने अपने मन्त्रियोंसे कहा- ॥ २६ ॥ यदि हम लोगोंके देखते-देखते स्त्रियोंको ये दुरात्मा