श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०६० ] * भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध * ४१५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
स्वरूप हैं। हे सर्वदेवेश्वर ! आप ही चेतनाचेतनात्मक | प्रभाव है, जो कि हमलोग आपके चरणकमलका दर्शन स्थावर-जंगम-जगद्रूप हैं। जन्म-जन्मान्तरकी पुण्यराशिके | कर पा रहे हैं। विनायककी मायाने हमें मोहित कर लिया कारण ही आप दृष्टिगोचर हुए हैं ॥ ३१-३३१/२ ॥ | था और उसीके प्रभावसे हम मुक्त भी हो सके ॥ ३९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- जब काशिराज ऐसा कह रहे थे, | जब सभी लोग लौट गये तो काशिराज वहाँसे तभी विनायकने उनको पुनः मोहित कर दिया। तब वे | अपनी धर्मपत्नी महारानी अम्बाके निकट गये और हर्षसे नरेश [पुनः वात्सल्यविवश हो गये और युद्धसे सकुशल | गद्गद वाणीसे कहने लगे- ॥ ४०१/२ ॥ लौटे,] वेदना आदिसे शून्य उन विनायकका अभिनन्दन | राजा बोले- दैत्यने हमे बन्दी बना लिया था, करने लगे। तभी राजाके दर्शनार्थ हर्षोल्लाससे भरे | [जिसके कारण] हम बड़े संकटमें पड़ गये थे, परंतु इन नगरवासी भी [वहाँ] आ पहुँचे ॥ ३४-३५ ॥ | विनायकने अपनी मायासे हमें मुक्त कराया और अपने नगरवासियोंने राजाको पुनः-पुनः प्रणाम करके | नगरमें पहुँचा दिया ॥ ४११/२ ॥ [उपहारके रूपमें] वस्त्र और आभूषण अर्पित किये तथा | ब्रह्माजी बोले- विविध प्रकारके वाद्योंके घोषसे, राजाने भी वस्त्र आदि विविध उपहार उनको दिलवाये॥ ३६॥ | भाँति-भाँतिकी पताकाओंसे, नानाविध महोत्सवोंसे और उन सभी नागरिकोंको विदा करके राजा अपनी | विनायकदेवकी सामर्थ्यके कारण [नरान्तकके चंगुलसे माताके समीप उपस्थित हुए [और उनसे बोले-] हे | छूटकर राजधानी] लौटे हुए सभी [स्त्री-पुरुषादि] मातः ! आपके अनुग्रहसे ही आपके चरणयुगलका दर्शन | लोगोंसे वह नगर शोभायमान हो रहा था ॥ ४२-४३ ॥ कर पा रहा हूँ। मुझे तो दैत्यराजने बन्दी बना लिया था, | कुमार, कुमारियाँ, विवाहित स्त्रियाँ, उनके पति, पर देवदेव विनायकने बचा लिया। तब हर्षित जननीने | पिता, माताएँ, पुत्रगण और भाई - ये सभी परस्पर दीर्घकालके उपरान्त आये हुए [अपने पुत्र] उन नरेशको | मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और एक-दूसरेको हृदयसे हृदयसे लगा लिया ॥ ३७-३८ ॥ | लगाने लगे। उन्होंने [इस अवसरपर] अनेकविध दान- तदुपरान्त दोनों अमात्यों (मन्त्रिपुत्रों)-ने उन | पुण्य किये। वे सभी [उल्लासपूर्वक] खान-पान, दर्शन- राजमाताको प्रणाम करके कहा- आपके ही पुण्योंका | भाषणादि करने लगे ॥ ४४-४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'राजमोक्षण' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥ -------------------❖-------------------
साठवाँ अध्याय भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध
ब्रह्माजी बोले- तदुपरान्त (कालपुरुषके द्वारा | दर्शन भी किया ॥ ३ ॥ पकड़े जानेपर) विनायकके [पराक्रमपूर्ण] क्रिया-कलाप | इससे यह बात निश्चित हो जाती है कि यह मुझे देखकर नरान्तक बुद्धिसे सोचने लगा कि मैंने [आज] | भोग और मोक्ष दोनों दे सकता है। [इसलिये विनायकसे इसका अद्भुत तेज देख लिया है ॥ १ ॥ | विरोध करना भी कल्याणकारी है,] अतएव मैं इसका वध जब काशिराज पकड़े गये तो इसने कालपुरुषको | करूँगा, अथवा [यदि मैं इसे न मार सका तो] यह मुझे उत्पन्न किया और उसने सब प्रकारसे मेरी समस्त | मार डालेगा। [दोनों ही दशाओंमें मेरा लाभ है] ऐसा सेनाका भक्षण कर डाला ॥ २ ॥ | निश्चय करके वह विनायकसे कहने लगा - ॥ ४१/२ ॥ [बादमें] मन्त्रिपुत्रोंके साथ काशिराज इसके उदरमें | दैत्य बोला- तुमने इन्द्रजालका चमत्कार अनेक प्रविष्ट हुए और बिना दैहिक क्षति हुए सकुशल बाहर | प्रकारसे मुझे दिखाया है, किंतु मैं नरान्तक उससे नहीं लाये गये। राजाने [इसके उदरदेशमें समग्र] विश्वका | डरता; क्योंकि मैं स्वयं ही मायावी हूँ। जिसके निःश्वासमात्रसे