भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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काण्ड ] भारतवर्षका वर्णन ९५

हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्मय, कुरु, भद्राश्व और केतुमाल था। राजाने उन सभी पुत्रोंको उनके नामसे ही अभिहित (प्रसिद्ध) एक-एक भूखण्ड प्रदान किया। हे हर ! राजा नाभि और उनकी पत्नी मेरुदेवीसे ऋषभ नामक पुत्र हुए थे, उनसे भरत नामके पुत्र हुए, जो शालग्रामतीर्थमें स्थित रहकर विभिन्न व्रतोंके पालनमें ही निरत रहते थे। उन भरतसे सुमति नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र तैजस हुआ।

तैजसके इन्द्रद्युम्न, इन्द्रद्युम्नसे परमेष्ठी, परमेष्ठीके प्रतीहार तथा प्रतीहारसे प्रतिहर्ता नामक पुत्र कहे गये हैं।

प्रतिहर्ताके पुत्र प्रस्तार, प्रस्तारके पुत्र विभु, विभुके पुत्र नक्त और नक्तके पुत्र गय नामके राजा हुए।

गयका पुत्र नर हुआ। नरसे विराट्, विराट्से महातेजस्वी धीमान्, धीमान्से भौवन नामके पुत्रकी उत्पत्ति हुई। भौवनके त्वष्टा, त्वष्टाके विरजा, विरजाके रज, रजके शतजित् तथा शतजित्के विष्वग्ज्योति नामक पुत्र हुआ था। (अध्याय ५४)

भारतवर्षका वर्णन

श्रीहरिने कहा— हे वृषभध्वज ! जम्बूद्वीपके मध्यभागमें इलावृत नामक वर्ष है। उसके पूर्वमें अद्भुत भद्राश्ववर्ष तथा उसके पूर्व-दक्षिण (अग्निकोण)-में हिरण्वान् नामक वर्ष है।

मेरुके दक्षिणभागमें किम्पुरुषवर्ष कहा गया है। उसके दक्षिणभागमें भारतवर्ष कहा गया है। मेरुके दक्षिण-पश्चिममें हरिवर्ष, पश्चिममें केतुमालवर्ष, पश्चिमोत्तरमें रम्यक् और उत्तरमें कुरुवर्ष स्थित हैं, जिनके भू-भाग कल्पवृक्षोंसे आच्छादित हैं।

हे रुद्र ! भारतवर्षको छोड़कर अन्य सभी वर्षोंमें सिद्धि स्वभावसे ही प्राप्त हो जाती है। यहाँ इन्द्रद्वीप, कशेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, कटाह, सिंहल और वारुण नामक आठ वर्ष हैं। नवाँ वर्ष भारतवर्ष है, जो चतुर्दिक समुद्रसे घिरा हुआ है।

इस (भारतवर्ष)-के पूर्वमें किरात तथा पश्चिममें यवन देश स्थित हैं। हे रुद्र ! दक्षिणमें आन्ध्र, उत्तरमें तुरुष्का आदि देश हैं। इस भारतवर्षमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रवर्णके लोग रहते हैं।

यहाँ महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात कुलपर्वत हैं। इस वर्षमें वेद, स्मृति, नर्मदा, वरदा, सुरसा, शिवा, तापी, पयोष्णी, सरयू, कावेरी, गोमती, गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, महानदी, केतुमाला, ताम्रपर्णी, चन्द्रभागा, सरस्वती, ऋषिकुल्या, कावेरी, मत्तगङ्गा, पयस्विनी, विदर्भा, शतद्रू नामक मङ्गल प्रदान करनेवाली तथा पापविनाशिनी नदियाँ हैं, जिनके जलका पान मध्यदेशादिके निवासीजन करते हैं।

पाञ्चाल, कुरु, मत्स्य, यौधेय, पटच्चर, कुन्त तथा शूरसेन देशके निवासी मध्यदेशीय हैं। पाद्म, सूत, मागध, चेदि, काशेय तथा विदेह पूर्वमें स्थित हैं। कोशल, कलिंग, वंग, पुण्ड्र, अंग और विदर्भ-मूलकजनोंके देश और विन्ध्यपर्वतके अन्तर्गत विद्यमान देश पूर्व तथा दक्षिणके तटवर्ती भूभागमें स्थित हैं। पुलिन्द, अश्मक, जीमूत, नय राष्ट्रमें निवास करनेवाले, कर्णाटक, कम्बोज तथा घण—ये दक्षिणापथ भूभागके निवासी हैं। अम्बष्ठ, द्रविड़, लाट, कम्बोज, स्त्रीमुख, शक और आनर्तवासी दक्षिण-पश्चिमके निवासी हैं।

स्त्रीराज्य, सैन्धव, म्लेच्छ, नास्तिक, यवन, मथुरा तथा निषधके रहनेवाले लोगोंके देश पश्चिमी

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