भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

वह भोगोंका उपभोग करते हुए गायक और वेश्या आदिको धन देता है।

नन्दनिधिसे युक्त व्यक्ति राजस और तामस गुणोंवाला होता है। वही कुलका आधार बनता है। वह स्तुति करनेपर प्रसन्न होता है तथा बहुत-सी स्त्रियोंका पति होता है। पूर्वकालके मित्रोंमें उसकी प्रीति शिथिल होती है और वह अन्य नये मित्रोंके साथ प्रेम करने लगता है।

नीलनिधिके चिह्नसे सुशोभित मानव सात्त्विक तेजसे संयुक्त होता है। वह वस्त्र-धान्यादिका संग्रह तथा तडागादिका निर्माण करता है। उसके द्वारा (जनहितमें) आम्रादिके उद्यान भी लगवाये जाते हैं। उसकी सम्पत्ति तीन पीढ़ी तक रहती है।

शङ्खनिधि एक ही पुरुष (पीढ़ी)-के लिये होती है। इससे समन्वित मनुष्य धनादिका स्वयं तो उपभोग करता है, किंतु उसके परिजन कुत्सित अन्नका भोजन तथा अच्छे न लगनेवाले मैले-कुचैले वस्त्रोंसे जीवनयापन करते हैं। वह स्वयंके भरण-पोषणमें सदैव तत्पर रहता है। यदि वह किसीको कुछ वस्तु देता भी है तो वह व्यर्थकी वस्तु होती है (जिसका कोई उपयोग नहीं होता)।

मिश्र (मिली-जुली)-निधिके चिह्नसे युक्त होनेपर मनुष्यके स्वभावमें मिश्रित फल दिखलायी देते हैं।

भगवान् विष्णुने भी निधियोंके ऐसे ही स्वरूपका वर्णन शिव आदि देवोंसे किया था (उसको मैंने आप सभीको सुना दिया)। अब हरिने भुवनकोशादिका जैसा वर्णन किया था, वैसा ही मैं कह रहा हूँ। (अध्याय ५३)


भुवनकोशवर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका निरूपण

श्रीहरिने कहा— राजा प्रियव्रतके आग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्, द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, भव्य, शबल, पुत्र और ज्योतिष्मान् नामके दस पुत्र हुए थे।

इन पुत्रोंमेंसे मेधा, अग्निबाहु तथा पुत्र नामक तीन पुत्र योगपरायण (योगी), जातिस्मर (इन्हें पूर्वजन्मका वृत्तान्त विस्मृत नहीं हुआ था) तथा महासौभाग्यशाली थे। इन लोगोंने राज्यके प्रति अपनी कोई अभिरुचि प्रकट नहीं की, अतः राजाने सप्तद्वीपा पृथिवीको अपने अन्य सात पुत्रोंमें विभक्त कर दिया।

पचास करोड़ योजनमें विस्तृत सम्पूर्ण पृथिवी नदीकी जलराशिमें तैरती हुई नौकाके समान चारों ओर अवस्थित अथाह जलके ऊपर स्थित है।

हे शिव! जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक तथा पुष्कर नामक ये सात द्वीप हैं, जो सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। उन सात समुद्रोंके नाम लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और जलके सागररूपमें प्रसिद्ध हैं। हे वृषभध्वज! ये सभी द्वीप तथा समुद्र उक्त क्रममें एक-दूसरेसे द्विगुण परिमाणमें अवस्थित हैं।

जम्बूद्वीपमें मेरु नामक पर्वत है, जो एक लाख योजनके परिमाणमें फैला हुआ है। इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। इसका अधोभाग पृथिवीमें सोलह हजार योजन धँसा हुआ है और शिखरदेश बत्तीस हजार योजन विस्तृत है। इसका अधोभाग जो पृथिवीके ऊपर सन्निहित है, वह भी सोलह हजार योजनके विस्तारमें कर्णिकाके रूपमें अवस्थित है। इसके दक्षिणमें हिमालय, हेमकूट तथा निषध, उत्तरमें नील, श्वेत और शृंगी नामक वर्षपर्वत हैं।

हे रुद्र! प्लक्ष आदि द्वीपोंके निवासी मरणादिसे मुक्त हैं। उनमें युग या अवस्थाके आधारपर कोई विषमता नहीं है।

जम्बूद्वीपके राजा आग्नीध्रके नौ पुत्र उत्पन्न हुए। उन सभीका नाम क्रमशः—नाभि, किम्पुरुष,