भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] नवनिधियोंके लक्षणोंसे युक्त पुरुषके ऐश्वर्य एवं स्वभावका वर्णन ९३

तिथिमें उपवास रखकर सप्तमी तिथिको सूर्यदेवकी पूजा करनेसे भी सभी प्रकारके पापोंसे मुक्ति हो जाती है।

शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिमें निराहार रहकर जो द्वादशी तिथिमें जनार्दन भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह समस्त महापापोंसे मुक्त हो जाता है।

सूर्य-चन्द्र-ग्रहण आदि समयोंमें मन्त्रका जप, तपस्या, तीर्थसेवन, देवार्चन तथा ब्राह्मण-पूजन—ये सभी कृत्य भी महापातकोंको नष्ट करनेवाले होते हैं। समस्त पापोंसे युक्त मनुष्य भी पुण्य-तीर्थोंमें जाकर नियमपूर्वक अपने प्राणोंका परित्यागकर समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।

पतिव्रता नारी पतिके देहावसानके बाद पतिका वियोग असह्य होनेके कारण पति-धर्मके अनुसार पतिके शरीरके साथ शास्त्रीय विधिका पालन करते हुए अग्निमें प्रवेश करती है तो ब्रह्महत्या, कृतघ्नता आदि बड़े-बड़े पातकोंसे दूषित भी अपने पतिका उद्धार कर देती है।

जो स्त्री पतिव्रता है, अपने पतिकी सेवा-शुश्रूषामें दत्तचित्त रहती है, उसको इस लोक तथा परलोकमें कोई पाप नहीं लगता। वह वैसे ही निर्दोष रहती है, जैसे दशरथपुत्र श्रीरामकी पत्नी जगद्विख्यात भगवती सीतादेवी लङ्कामें रहकर भी निर्दोष रहीं तथा (अपने पातिव्रतके प्रभावसे) उन्होंने राक्षसराज रावणपर विजय प्राप्त की।

हे यतव्रत! संयतचित्त होकर विविध शास्त्रीय व्रतका अनुष्ठान करनेवाले! भगवान् विष्णुने मुझसे बहुत पहले ही यह बताया था कि गयामें स्थित फल्गु (नदी) आदि तीर्थोंमें यथाविधि श्रद्धाके साथ स्नान करनेवाला व्यक्ति सभी प्रकारके पातकोंसे मुक्त हो जाता है और समस्त सदाचरणका फल भी प्राप्त करता है। (अध्याय ५२)

नवनिधियोंके लक्षणोंसे युक्त पुरुषके ऐश्वर्य एवं स्वभावका वर्णन

सूतजीने कहा—भगवान् विष्णुसे अष्टनिधियोंके विषयमें सुनकर ब्रह्माजीने उनका वर्णन इस प्रकार किया था कि 'पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द (नन्द), नील और शङ्ख नामकी अष्टनिधियाँ हैं। नवीं निधि मिश्र कहलाती है। अब मैं उनके स्वरूपका वर्णन करता हूँ।

पद्मनिधिके लक्षणोंसे सम्पन्न मनुष्य सात्त्विक और दाक्षिण्य गुणसे सम्पन्न होता है। वह सुवर्ण-चाँदी आदि मूल्यवान् धातुओंका संग्रह करके यतियों, देवताओं और याज्ञिकोंको दान करता है। महापद्म-चिह्नसे लक्षित व्यक्ति भी अपने संग्रहीत धन आदिका दान धार्मिक जनोंको करता रहता है। पद्म तथा महापद्मनिधिसम्पन्न पुरुष सात्त्विक स्वभाववाले कहे गये हैं।

मकरनिधिके चिह्नसे चिह्नित मनुष्य खड्ग, बाण एवं कुन्त (भाला) आदि अस्त्रोंका संग्रह करनेवाला होता है। वह नित्य श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दान देता है और राजाओंके साथ उसकी सदैव मित्रता बनी रहती है। द्रव्यादिका आहरण करनेके लिये वह शत्रुओंका विनाश करता है और युद्धके लिये सदा तत्पर रहता है। कच्छपनिधि-लक्षित व्यक्ति तामस गुणवाले होते हैं। कच्छप-चिह्नसे युक्त व्यक्ति किसीपर विश्वास नहीं करता है। वह न अपनी सम्पत्तिका स्वयं उपभोग करता है और न तो उसमेंसे वह किसीको कुछ देता ही है। वह एकान्तमें जाकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्तिको पृथिवीमें गाड़कर छिपा देता है। उसकी सम्पत्ति एक पीढ़ीतक रहती है।

मुकुन्दनिधिके चिह्नसे अंकित पुरुष रजोगुण-सम्पन्न होता है। वह राज्य-संग्रहमें लगा रहता है,