गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ९२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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महापातकी है। गोहत्यादि जो अन्य पाप होते हैं—वे उपपातक हैं, ऐसा देवताओंका कहना है।
जिसने ब्रह्महत्या की है, उसे वनमें स्वयं पर्णकुटी बनाकर उसीमें उपवास करते हुए बारह वर्षोंतक रहना चाहिये अथवा पर्वतके उस ऊँचे भागसे गिरकर अपने प्राणोंका परित्याग करना चाहिये, जिस भागसे गिरनेपर कहीं बीचमें रुकनेकी सम्भावना न हो और मरण निश्चित हो। इसके अतिरिक्त जलती हुई अग्निमें प्रवेशकर प्राण-परित्याग, अगाध जलमें प्रवेशकर प्राण-परित्याग, ब्राह्मण या गौकी रक्षाके लिये प्राण-परित्याग भी ब्रह्महत्या-दोषके निवारक होते हैं। इतना अवश्य ध्यानमें रखना है कि ब्रह्महत्याके दोष-निवारणके लिये प्राण-परित्यागके जो साधन बताये गये हैं, उनको करनेके पहले यथाशक्ति विद्वान् ब्राह्मणको अन्नदान करना अनिवार्य है।
अश्वमेध-यज्ञके अन्तमें होनेवाले अवभृथ-स्नानसे ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। वेदविद् ब्राह्मणको सर्वस्व दान करनेसे ब्रह्महत्याजनित पापका नाश हो जाता है। सरस्वतीजी, गङ्गा तथा यमुना—इन नदियोंके पवित्र संगमपर तीन रात्रियोंतक उपवास रख करके प्रतिदिन तीनों कालोंमें स्नान करके भी द्विज ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। सेतुबन्ध रामेश्वरम् (कपालमोचन तीर्थ या वाराणसीके पवित्र तीर्थ)-में स्नान करके ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति हो जाती है।
मद्यपी द्विज अग्निवर्णके सदृश (अन्तःकरणको जला देनेवाली) खौलती हुई मदिरा अथवा दूध, घृत या गोमूत्रका पान करके तज्जनित पापसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है। सुवर्णकी चोरी करनेवाला राजाओंके द्वारा दण्डरूपमें मूसलप्रहारसे पापमुक्त हो जाता है अथवा जीर्ण-शीर्ण वस्त्र धारण करके वनमें ब्रह्महत्यानाशक प्रायश्चित्त-व्रतको करनेसे पापमुक्त हो जाता है।
कामसे मोहित ब्राह्मण यदि अपने गुरुकी पत्नीके पास जाता है तो उसे इस गुरुपत्नीगमनरूप पापसे मुक्त होनेके लिये जलती हुई—तपती हुई लौह-निर्मित स्त्रीका सर्वाङ्ग आलिङ्गन करना चाहिये। अथवा ब्रह्महत्याके पापसे मुक्तिके लिये जो व्रत विहित है, उस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। चार या पाँच चान्द्रायणव्रत करनेसे भी गुरुपत्नीगमनजनित पापसे मुक्ति हो सकती है।
जो द्विज पतितजनोंका संसर्ग करता है, उसे विभिन्न संसर्गोंसे होनेवाले पापोंको दूर करनेके लिये उन-उन पापोंके निमित्त कहे गये व्रतोंका पालन करना चाहिये। अथवा वह आलस्यसे रहित होकर एक संवत्सरपर्यन्त तप्तकृच्छ्रव्रतका अनुपालन करे। विधिवत् किया गया सर्वस्वदान सभी पापोंको दूर करनेवाला होता है। अथवा विधिवत् चान्द्रायणव्रत तथा अतिकृच्छ्रव्रत भी सभी पापोंको दूर करनेवाला होता है।
गया आदि पुण्यक्षेत्रोंकी यात्रा करनेसे भी ऐसे पापोंका विनाश हो जाता है। अमावास्या तिथिमें जो महादेव भगवान् शङ्करकी सम्यक्-रूपसे आराधना करके ब्राह्मणोंको भोजन प्रदान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।
जो मनुष्य कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें उपवास रखकर संयतचित्तसे पवित्र नदीमें स्नान करके ॐकारसे युक्त यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल तथा सर्वभूतक्षय—इन नामोंका उच्चारणकर तिलसे संयुक्त सात जलाञ्जलियोंसे तर्पण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
इन व्रतोंके पालन करते समय शान्त रहकर तथा मनका निग्रहकर, ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए भूमिपर सोना चाहिये और उपवास रखकर ब्राह्मणकी पूजा करनी चाहिये। (कार्तिक) शुक्लपक्षकी षष्ठी