भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] प्रायश्चित्त-निरूपण ९१


प्राप्ति होती है। धान्य-दानसे शाश्वत (अविनाशी) सुख तथा वेदके (वेदाध्यापन) दानसे ब्रह्मका सांनिध्य लाभ होता है। वेदविद् ब्राह्मणको ज्ञानोपदेश करनेसे स्वर्गलोककी प्राप्ति तथा गायको घास देनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। ईंधन (अग्निको प्रज्वलित करने)-के लिये काष्ठ आदिका दान करनेपर व्यक्ति प्रदीप्त अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है। रोगियोंके रोगशान्तिके लिये औषधि, तेल आदि पदार्थ एवं भोजन देनेवाला मनुष्य रोगरहित होकर सुखी और दीर्घायु हो जाता है।

छत्र और जूतेका दान करनेवाला मनुष्य प्रचण्ड धूपके कारण तीक्ष्ण तापवाले तथा तलवारके समान तीक्ष्ण धारवाली नुकीली पत्तियोंसे परिव्याप्त असिपत्रवन नामके नारकीय मार्गोंको पार कर जाता है। जो मनुष्य परलोकमें अक्षय सुखकी अभिलाषा रखता है, उसे अपने लिये संसार या घरमें जो वस्तु अभीष्टतम है तथा प्रिय है, उस वस्तुका दान गुणवान् ब्राह्मणको करना चाहिये।<sup></sup> उत्तरायण<sup></sup>, दक्षिणायन<sup></sup>, महाविषुवत्काल<sup></sup>, सूर्य तथा चन्द्रग्रहणमें एवं कर्क, मेष-मकरादिकी संक्रान्तियोंके आनेपर ब्राह्मणोंको दिया गया दान परलोकमें अक्षय सुख देनेवाला होता है। इस प्रकारके दानका महत्त्व प्रयागादि तीर्थोंमें बहुत है, गया-क्षेत्रके तीर्थोंमें किया गया दान विशेष महत्त्व रखता है।<sup></sup>

दान-धर्मसे बढ़कर श्रेष्ठ धर्म इस संसारमें प्राणियोंके लिये कोई दूसरा नहीं है। दान स्वर्ग, आयु तथा ऐश्वर्यको प्राप्त करनेकी इच्छासे और अपने पापोंकी उपशान्तिके लिये भी किया जाता है। गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा देवोंको दिये जानेवाले दानसे जो मनुष्य मोहवश दूसरोंको रोकता है, वह पापी तिर्यक् (पक्षीकी)-योनिको प्राप्त करता है। जो व्यक्ति दुर्भिक्षकालमें और मरणासन्न ब्राह्मणको अन्नादिका दान नहीं करता है, वह ब्रह्महत्या करनेवालेके समान तथा अति निन्दित है। (अध्याय ५१)


प्रायश्चित्त-निरूपण

ब्रह्माजीने कहा— हे ब्राह्मणो! अब इसके बाद मैं प्रायश्चित्त-विधिको भली प्रकार कह रहा हूँ—

ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला ब्रह्महन्ता, मदिरा-पान करनेमें निरत मद्यपी, चोरी करनेवाला स्तेयी तथा गुरुकी पत्नीके साथ गमन करनेवाला गुरुतल्पगामी (गुरुपत्नीगामी)—ये चार महापातकी हैं। इन सभीका संसर्ग (साथ) करनेवाला पाँचवाँ


१- वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्वसालोक्यमश्वदः । अनडुद्दः श्रियं पुष्टां गोदो ब्रह्मस्य विष्टपम् ॥
यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः । धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्म शाश्वतम् ॥
वेदवित्सु ददज्ज्ञानं स्वर्गलोके महीयते । गवां घासप्रदानेन सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
इन्धनानां प्रदानेन दीप्ताग्निर्जायते नरः । औषधं स्नेहमाहारं रोगिरोगप्रशान्तये ॥
ददानो रोगरहितः सुखी दीर्घायुरेव च । असिपत्रवनं मार्गं क्षुरधारासमन्वितम् ॥
तीक्ष्णातपं च तरतिच्छत्रोपानत्प्रदो नरः । यद्यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे ॥
तत्तद्गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता । अयने विषुवे चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ॥
संक्रान्त्यादिषु कालेषु दत्तं भवति चाक्षयम् । (५१ । २४–३०)
२- मकर राशिसे मिथुन राशितक सूर्यके रहनेके कालको उत्तरायण कहते हैं। यह माघ माससे आषाढ़ मासतकका काल है।
३- कर्क राशिसे धनु राशितक सूर्यके रहनेके कालको दक्षिणायन कहते हैं। यह श्रावण माससे पौष मासतकका काल है।
४- जिस कालमें दिन-रात दोनों बराबर होते हैं, वह विषुवकाल कहा जाता है। यह काल तुला और मेषकी सूर्य-संक्रान्तिका होता है।
५- प्रयागादिषु तीर्थेषु गयायां च विशेषतः ॥ (५१ । ३१)