गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दूसरे दोषमें संसृष्ट हो जानेपर सब प्रकारसे शमन औषधि ही हितकारी होती है। इस रोगसे रक्षा करनेमें शिरावेध परीक्षणविधि ही दिखायी देता है। वस्तुतः ऐसे दोषोंमें होनेवाले उपद्रव विकारको लक्ष्य करके ही शरीरपर प्रभावी होते हैं। अतः रोगीके शरीरमें दृष्टिगत उपद्रवोंसे अन्य विकार न उत्पन्न हों, उसके पूर्व ही उनका शमन तथा परीक्षण करा लेना चाहिये। (अध्याय १४८)
कास (खाँसी)-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—कास (खाँसी)-रोग यथाशीघ्र प्राणीपर अपना कुप्रभाव दिखाता है, इसलिये उसी रोगको अब कहा जायगा।
खाँसी वातज, पित्तज, कफज, क्षतज तथा धातु-क्षयज होनेसे पाँच प्रकारकी मानी गयी है। यदि इन पाँचोंके विनाशकी उपेक्षा कर दी जाती है तो ये क्षयको उत्पन्न कर देती हैं, यह उत्तरोत्तर बलवान् हो जाती हैं। इसका भावी रूप इस प्रकार होता है—
कासरोग होनेपर कण्ठमें खुजलाहट और अरुचि होती है। कान, मुख तथा कण्ठमें शुष्कता आ जाती है। शरीरमें वायु प्रायः अधोगामी होता है। इस रोगमें ऊर्ध्वगामी होकर वक्षःस्थलमें जा पहुँचता है, वहाँ अभिघात करते हुए वायु कण्ठमें रोगकी सृष्टि करता हुआ मस्तिष्क तथा रक्तवाही आदि शरीरके तेरहों स्रोतोंमें जाता है। तदनन्तर सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें प्रविष्ट होकर आक्षेप एवं उनको कष्ट पहुँचाता है।
इसका प्रकोप होते ही नेत्रोंमें उत्क्षेप करता हुआ और पीठ तथा हृदय एवं पार्श्वोंमें पीड़ा उत्पन्न करता हुआ मुखसे निकलता है। बोलनेमें<sup>१</sup> भी रोगीको कष्ट होता है, फूटे हुए काँसेकी ध्वनिके समान मुखसे वाणी निकलती है, हृदयके पार्श्वभाग तथा शिरोभागमें पीड़ा उठती है, मोह और क्षोभ होता है एवं स्वरभंग हो जाता है। यह रोगीको अत्यन्त तेज पीड़ाके साथ सूखी खाँसी खाँसनेके लिये विवश कर देता है। रोगीको रोमाञ्च हो जाता है। खाँसनेपर बड़ी ही कठिनतासे अंदरसे सूखा हुआ कफ बाहर निकलता है, जिससे खाँसी कुछ कम हो जाती है।
पित्तजन्य<sup>२</sup> कास होनेसे नेत्र पीले पड़ जाते हैं, मुखमें तीतापन रहता है, ज्वर और भ्रम होता है, रोगी पित्त तथा रक्तसंस्रित वमन करता है, उसे प्यास लगती है, कण्ठसे निकलनेवाली ध्वनि टूटी रहती है, उसको सब ओर धुआँ-ही-धुआँ दिखायी देता है और धूमायित एवं खट्टी डकार आती है तथा उसमें एक प्रकारका मद छाया रहता है। जब रोगीको खाँसीका वेग आता है तो उसी खाँसीके बीच आँखोंके सामने चमकता हुआ छोटा-छोटा प्रकाशपुञ्ज दिखायी देता है।
कफजन्य कासरोग होनेपर वक्षःस्थलमें सामान्य वेदना होती है, सिरमें भारीपन तथा हृदयमें जकड़न आ जाती है। कण्ठमें किसी द्रव्य पदार्थके लेपका अनुभव होता है। एक प्रकारका मद-जैसा शरीरपर छाया रहता है तथा पीनस, वमन, अरुचि, रोमाञ्च और घने स्निग्ध कफकी प्रवृत्ति होती है।
युद्धादि अत्यन्त साहसिक विभिन्न कर्मोंको करनेवाले लोगोंद्वारा जब शक्तिसे अधिक कर्म किया जाता है तो उससे वक्षःस्थलमें क्षत हो जाता है। पित्तसे अनुगमित होकर वायु बलवान् हो जाता
<sup>१</sup>अ०हृ०नि०अ० ३।२१, सु०उ० ५२। <sup>२</sup>अ०हृ० नि०अ० ३, २४-२५; सु०उ० ५२।