गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कास (खाँसी)-निदान
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है। तदनन्तर उसके कारण रोगीको खाँसी आने लगती है, जिसके द्वारा मुखसे रक्तसंश्रित कफ अधिक निकलता है। प्रायः यह कफ पीला, पिंगल, शुष्क, ग्रथित (लोथड़ेकी भाँति) और अत्यन्त दूषित होता है।
इस रोगमें रोगी रुग्ण-कण्ठसे कफरूपी मलको बाहर निकालता है, वायुदोषके कारण हृदय फटा-सा प्रतीत होता है और शरीरमें सुइयोंके चुभने-जैसे कष्टकी अनुभूति होती है तथा कष्टकारी शूलके आघातसे मर्मस्थलमें पीड़ा होती है, रोगीके पर्व-पर्वमें दर्द होता है और ज्वर भी रहता है। उसकी साँस फूलती है। प्यास बढ़ जाती है। उसकी वाणीमें स्वर-भंग होने लगता है तथा शरीरमें कम्पन रहता है।
रोगी<sup>१</sup> इस रोगमें कबूतरके समान कहरने लगता है। उसके पार्श्वभागमें शूल उठने लगता है। कफादि विकारोंके कारण उसको वमन होता है। उसकी शक्ति क्षीण होने लगती है और शरीरका वर्ण कान्तिहीन हो जाता है।
राजयक्ष्मारोग होनेसे रोगीका शरीर क्षीण होने लगता है। उसके पेशाबमें रक्त आता है। साँस फूलनेसे पीठ और कमरमें पीड़ा होती है। जिनको शास्त्रमें आयु कहा गया है, वे आयुरूपी धातुएँ शरीरमें प्रकुपित होकर दौड़ने लगती हैं। यक्ष्मासे पीड़ित रोगी घरको खाँसी और खखारसे भर देता है। वह खखार (पीब)-के समान दुर्गन्धयुक्त तथा हरे और लाल रंगका होता है। ऐसे रोगीको सोनेमें विशेष कष्ट होता है अर्थात् सुप्तावस्थामें भी रोगीको कष्ट होता रहता है। यह रोग रोगीके हृदयको गिरते हुएके समान कष्ट देता है। अचानक रोगीमें उष्ण और शीतल भोजन एवं पेय-पदार्थ ग्रहण करनेकी इच्छा होने लगती है। वह बहुत खाता है। उसका बल क्षीण होने लगता है। मुखपर स्निग्धता बनी रहती है। उसके नेत्र भी शोभा-सम्पन्न रहते हैं, किंतु रोगके बलवान् होनेके बाद सभी विनाशकारी राजयक्ष्माके लक्षण रोगीके शरीरमें जन्म लेते हैं।
क्षयजन्य<sup>२</sup> कासका रूप ऐसा ही है। इस रोगसे क्षीण हुए शरीरवाले रोगियोंकी मृत्यु निश्चित ही हो जाती है अथवा रोगियोंके बलवान् होनेपर यह रोग याप्य—साध्य रहता है। क्षतजन्य कासरोग भी उसी प्रकारका होता है। कास जब रोगीपर अपना प्रथम कुप्रभाव दिखाना प्रारम्भ करे, उसी कालमें इसकी चिकित्सा अपेक्षित है।
रोगीमें<sup>३</sup> उपचारका सामर्थ्य होनेपर यह रोग साध्य भी है। अतः रोगीको यथासामर्थ्य इस रोगका उपशमन अवश्य करना चाहिये, किंतु उपचार प्रारम्भ करनेके पूर्व उसके वात आदि सभी प्रकारोंपर विचार करके ही पृथक्-पृथक् रूपसे प्रयोज्य औषधि तथा पथ्यापथ्य आहार ग्रहण करना हितकर होता है। वृद्ध प्राणीके शरीरमें जो मिश्रित भावसे वातजादि कासरोग होते हैं, वह याप्य है। उनकी उपेक्षा करनेसे खाँसी, श्वास, क्षय, वमन तथा स्वरभंगादिक प्रतिश्यायका प्रकोप होता है। इसकी उपेक्षा करनेसे कासरोग असाध्य हो जाता है। इसलिये शीघ्र ही इसका उपचार कर लेना चाहिये।
(अध्याय १४९)
१-अ०हृ०नि०अ० ३, सु०उ० ५२। २-अ०हृ०नि०अ० ३, ३६-३७, सु०उ० ५२। ३-अ०हृ०नि०अ० ३, च०चि०अ० १८, सु०उ० ५२।