भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

श्वासरोग-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—अब मैं श्वासरोगका निदान कह रहा हूँ।

कासरोगके परिपक्व हो जानेपर उसीसे शरीरमें श्वासरोगकी उत्पत्ति होती है अथवा प्रारम्भकालमें वात-पित्त तथा कफजन्य दोषोंके प्रकुपित होनेसे यह रोग उत्पन्न होता है। इस रोगका प्रादुर्भाव आमातिसार, वमन, विषपान और पाण्डु-रोग एवं ज्वरसे भी हो जाता है। धूलि-ग्रहण, धूप तथा शीत वायुके सेवन करनेसे भी इस रोगका जन्म हो सकता है। मर्मस्थलमें आघात पहुँचनेसे और बर्फीले जलका प्रयोग करनेसे भी शरीरमें इस रोगका प्रकोप हो जाता है।

यह रोग क्षुद्र, तमक, छिन्न, महान् तथा ऊर्ध्व नामसे पाँच प्रकारका माना गया है। कफके द्वारा सामान्य ढंगसे शरीरमें अवरोधित गतिवाला सर्वव्यापी वायु प्राणवाही, जलवाही, अन्नवाही तथा रक्त-पित्तादिजन्य स्रोतोंको प्रकुपित करता हुआ जब हृदयमें स्थित हो जाता है, तब वह आमाशयमें श्वासरोगको उत्पन्न करता है।

इस रोगका पूर्वरूप इस प्रकार होता है—रोगीके हृदय और पार्श्व (बगल)-भागमें शूल उठता है, प्राणवायु शरीरमें प्रतिलोम-गतिसे प्रवाहित होने लगती है, रोगीके मुखसे पीड़ाके कारण बराबर आह-आहकी ध्वनि निकला करती है, फूटे हुए शङ्खको बजानेसे जैसी ध्वनि प्रकट होती है, वैसी ही ध्वनि रोगीके शरीरकी पीड़ाके कारण होती है।

प्रायः शरीरमें इन लक्षणोंका उद्भव अधिक भोजन करनेसे होता है। अधिक भोजन करनेके दोषसे प्रेरित वायु स्वयं मलसे युक्त क्षुद्र श्वासको प्रेरित करता है अर्थात् अधिक भोजन करनेसे रोगीकी साँस फूलने लगती है और उसे मल-विसर्जन करनेकी इच्छा होती है। ऐसी स्थितिमें कफके अवरोधको पार करके वायु प्रतिलोम-भावसे शिरोभागमें प्रवेश करता है, जिससे वह हृदयमें पहुँचता है और वहाँ आमाशयमें जाकर श्वासरोगको बल देता है।

यह वायु<sup></sup>-प्रकोप उस समय सिर, गला और हृदयभागको अपने अधिकारमें लेकर पार्श्वभागोंमें पीड़ा उत्पन्न करता हुआ खाँसी, घुरघुराहट, मूर्च्छा, अरुचि और पीनस तथा तृषाका उपद्रव शरीरमें प्रकट करता है। प्राणोंको संतप्त करनेवाली साँस अत्यन्त वेगसे चलने लगती है। यद्यपि खाँसीके द्वारा कण्ठमें आये हुए दूषित कफको थूकनेसे तात्कालिक कुछ शान्ति रोगीको प्राप्त हो जाती है और वह कुछ क्षणके लिये सुखका अनुभव कर सकता है।

श्वासके प्रकोपसे रोगीको प्राणघातक कष्ट होता है। श्वासके प्रकोपसे अत्यन्त कष्ट होनेपर रोगी सो जाता है। यदि बैठ जाता है, तब वह अपनेको कुछ स्वस्थ अनुभव करता है। इस प्रकुपित रोगके कारण रोगीको कष्टाधिक्यके कारण आँखें ऊपरकी ओर निकलती हुई प्रतीत होती हैं, मस्तकसे पसीना छूटने लगता है और रोगी अत्यन्त कातर हो उठता है। बार-बार श्वास आनेसे रोगीका मुँह सूख जाता है। वह काँपता है और उष्ण आहार या पेय पदार्थके सेवनकी अभिलाषा करता है। मेघ घिरनेपर, वर्षा होनेपर, शीत गिरनेपर एवं पूर्वी हवा चलनेपर तथा कफकारक आहार-विहार करनेपर श्वासका वेग बढ़ जाता है।


१-अ०हृ० नि०अ० ४, च०चि०अ० १७, सु०उ०अ० ५१, आयु०नि०चि०दर्श पृष्ठ ४१। २-च०चि०अ० २१, अ०हृ० अ०४-७।

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