गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] हिक्कारोग-निदान २६५
यदि बलवान् मनुष्यके शरीरमें तमक नामक श्वास्रोग होता है तो वह याप्य-साध्य होता है। प्रथम दृष्ट्या तो ज्वर और मूर्च्छासे युक्त होनेपर रोगीके इस तमक श्वासका उपशमन शीतल द्रव्य पदार्थोंसे ही करना चाहिये। ऐसे रोगके उपभेदमें रोगी खाँसी और श्वासके प्रकोपसे ग्रस्त, शरीरसे निर्बल तथा मर्मस्थलकी पीड़ासे अत्यन्त दुःखी रहता है। उसे अधिक पसीना आता है, मूर्च्छा होती है, पीड़ासे वह कराहता रहता है, उसके मूत्राशयमें जलन एवं पेशाब (मूत्र) रुक-रुककर होता है। विभ्रमका प्रकोप होता है। रोगीकी दृष्टि अधोगति रहती है, अधिक कष्ट तथा तापके कारण आँखें अपने स्थानसे निकलती-सी प्रतीत होती हैं, उनमें चिकनापन तथा लालिमा छा जाती है, मुख सूख जाता है। कष्टके कारण रोगी प्रलाप करता है। शरीरका तेज नष्ट होकर चेतना भी नष्ट हो जाती है तथा वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है।
महाश्वासका<sup>१</sup> रोग-प्रभेद होनेपर रोगी अपने शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक महत्त्वसे रहित हो उठता है। वह दीन व्यक्तिके समान प्रतीत होता है, श्वासमें पीड़ाके कारण आवाज तथा गलेमें घड़घड़ाहट होती है। वह मतवाले साँड़के समान रात-दिन धूलिधूसरित होकर हुँकारके साथ श्वास छोड़ता है तथा ज्ञान-विज्ञानसे रहित हो जाता है। उसके नेत्र और मुखपर भ्रान्तिकी अवस्था आ जाती है। नेत्रोंसे वह किसी वस्तुको सत्यरूपमें जान नहीं पाता। उसकी जिह्वामें खाये गये द्रव्य पदार्थोंके स्वादको बतानेकी शक्ति नहीं रह जाती। उसके नेत्रोंमें झपकी चढ़ी रहती है। मूत्रके साथ रोगीका तेज भी निकलता है। उसकी वाणी मुखसे टूटी-फूटी निकलती है। रोगीका कण्ठ सूख जाता है। उसकी बारम्बार साँस फूलती है। उसके कान, गला और सिरमें अत्यन्त पीड़ा होती है। जिस रोगीकी लम्बी-लम्बी ऊर्ध्व गतिवाली साँस निकलती है, वह अपने श्वासको नीचेकी ओर ले जानेमें समर्थ नहीं हो पाता।
इस महाश्वासके<sup>२</sup> रोगमें रोगीके मुख और कान कफसे भरे रहते हैं। शरीरका प्रकुपित वायु उसे बहुत ही कष्ट देता है। अब मैं ऊर्ध्व श्वासके भेदकी समीक्षा कर रहा हूँ। इस रोगमें रोगी चारों ओर अपनी दृष्टिको फेंकता हुआ भ्रान्ति प्राप्त करता है। मर्म छेदनेकी-सी वेदना होती है और वाणी रुक जाती है। इन तीनों प्रकारके श्वासोंके लक्षण जबतक प्रकट नहीं होते हैं, तभीतक साध्य होते हैं, परंतु लक्षण प्रकट हो जानेपर असाध्य हो जाते हैं और निश्चित ही मृत्युकारक बन जाते हैं।
(अध्याय १५०)
हिक्कारोग-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं हिक्का (हिचकी)-रोगके निदानको कहूँगा, आप उसे सुनें।
श्वास्रोगके जो-जो निदान-पूर्वरूप, संख्या, प्रकृति और आश्रयस्थान कहे गये हैं, वे ही हिक्कारोगके भी होते हैं। यह हिक्का पाँच प्रकारकी होती है—भक्तोद्भवा (अन्नजा), क्षुद्रा, यमला, महती और गम्भीरा। रूक्ष, तीक्ष्ण, खर तथा असात्म्य अन्न अथवा पेय पदार्थोंके सेवनसे प्रकुपित वायु हिक्कारोगको पैदा करती है। इस हिक्कारोगमें रोगी श्वास लेता हुआ क्षुधानुगामी मन्द-मन्द शब्द
१-च०चि० २१, अ०हृ० नि०अ० ४। २-सु०उ० ५१, अ० हृ०नि०अ० ४।