भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

काण्ड ] हिक्कारोग-निदान २६५


यदि बलवान् मनुष्यके शरीरमें तमक नामक श्वास्रोग होता है तो वह याप्य-साध्य होता है। प्रथम दृष्ट्या तो ज्वर और मूर्च्छासे युक्त होनेपर रोगीके इस तमक श्वासका उपशमन शीतल द्रव्य पदार्थोंसे ही करना चाहिये। ऐसे रोगके उपभेदमें रोगी खाँसी और श्वासके प्रकोपसे ग्रस्त, शरीरसे निर्बल तथा मर्मस्थलकी पीड़ासे अत्यन्त दुःखी रहता है। उसे अधिक पसीना आता है, मूर्च्छा होती है, पीड़ासे वह कराहता रहता है, उसके मूत्राशयमें जलन एवं पेशाब (मूत्र) रुक-रुककर होता है। विभ्रमका प्रकोप होता है। रोगीकी दृष्टि अधोगति रहती है, अधिक कष्ट तथा तापके कारण आँखें अपने स्थानसे निकलती-सी प्रतीत होती हैं, उनमें चिकनापन तथा लालिमा छा जाती है, मुख सूख जाता है। कष्टके कारण रोगी प्रलाप करता है। शरीरका तेज नष्ट होकर चेतना भी नष्ट हो जाती है तथा वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है।

महाश्वासका<sup></sup> रोग-प्रभेद होनेपर रोगी अपने शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक महत्त्वसे रहित हो उठता है। वह दीन व्यक्तिके समान प्रतीत होता है, श्वासमें पीड़ाके कारण आवाज तथा गलेमें घड़घड़ाहट होती है। वह मतवाले साँड़के समान रात-दिन धूलिधूसरित होकर हुँकारके साथ श्वास छोड़ता है तथा ज्ञान-विज्ञानसे रहित हो जाता है। उसके नेत्र और मुखपर भ्रान्तिकी अवस्था आ जाती है। नेत्रोंसे वह किसी वस्तुको सत्यरूपमें जान नहीं पाता। उसकी जिह्वामें खाये गये द्रव्य पदार्थोंके स्वादको बतानेकी शक्ति नहीं रह जाती। उसके नेत्रोंमें झपकी चढ़ी रहती है। मूत्रके साथ रोगीका तेज भी निकलता है। उसकी वाणी मुखसे टूटी-फूटी निकलती है। रोगीका कण्ठ सूख जाता है। उसकी बारम्बार साँस फूलती है। उसके कान, गला और सिरमें अत्यन्त पीड़ा होती है। जिस रोगीकी लम्बी-लम्बी ऊर्ध्व गतिवाली साँस निकलती है, वह अपने श्वासको नीचेकी ओर ले जानेमें समर्थ नहीं हो पाता।

इस महाश्वासके<sup></sup> रोगमें रोगीके मुख और कान कफसे भरे रहते हैं। शरीरका प्रकुपित वायु उसे बहुत ही कष्ट देता है। अब मैं ऊर्ध्व श्वासके भेदकी समीक्षा कर रहा हूँ। इस रोगमें रोगी चारों ओर अपनी दृष्टिको फेंकता हुआ भ्रान्ति प्राप्त करता है। मर्म छेदनेकी-सी वेदना होती है और वाणी रुक जाती है। इन तीनों प्रकारके श्वासोंके लक्षण जबतक प्रकट नहीं होते हैं, तभीतक साध्य होते हैं, परंतु लक्षण प्रकट हो जानेपर असाध्य हो जाते हैं और निश्चित ही मृत्युकारक बन जाते हैं।

(अध्याय १५०)


हिक्कारोग-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं हिक्का (हिचकी)-रोगके निदानको कहूँगा, आप उसे सुनें।

श्वास्रोगके जो-जो निदान-पूर्वरूप, संख्या, प्रकृति और आश्रयस्थान कहे गये हैं, वे ही हिक्कारोगके भी होते हैं। यह हिक्का पाँच प्रकारकी होती है—भक्तोद्भवा (अन्नजा), क्षुद्रा, यमला, महती और गम्भीरा। रूक्ष, तीक्ष्ण, खर तथा असात्म्य अन्न अथवा पेय पदार्थोंके सेवनसे प्रकुपित वायु हिक्कारोगको पैदा करती है। इस हिक्कारोगमें रोगी श्वास लेता हुआ क्षुधानुगामी मन्द-मन्द शब्द


१-च०चि० २१, अ०हृ० नि०अ० ४। २-सु०उ० ५१, अ० हृ०नि०अ० ४।

१३४- अर्श (बवासीर)-निदान

२६६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

करता है। अन्न तथा पेय पदार्थके अयुक्तपूर्वक सेवन करनेसे जो हिक्का (हिचकी) रोगीको आती है, उसे 'अन्नजा हिक्का' कहते हैं। यह हिचकी सात्म्य अन्नपानसे शान्त हो जाती है। अधिक परिश्रम करनेसे शरीरमें प्रकुपित हुआ पवन 'क्षुद्रा हिक्का' को जन्म देता है। वह ग्रीवामूलसे निकलकर मन्द-मन्द गतिसे कण्ठके बाहर आता है। यह रोग अधिक परिश्रम करनेसे बढ़ जाता है, किंतु यथोचित मात्रामें भोजन कर लेनेपर कुछ शान्त हो जाता है।

जो हिचकी<sup></sup> अधिक समयसे एक या दो बार वेगपूर्वक आती है, परिणामतः वह धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। अपने वेगसे जो रोगीके सिर और ग्रीवाभागको प्रकम्पित कर देती है, उसको 'यमला हिक्का'के नामसे स्वीकार करना चाहिये। इसमें रोगी प्रलाप करता है तथा उसको वमन होता है और उसे अतिसार हो जाता है, कमजोरीसे उसके नेत्र बैठ जाते हैं और जम्भाई आती है। ऐसी अवस्थावाली हिक्काको वेगवती परिणाम देनेवाली 'यमला हिक्का' कहते हैं।

जिस हिक्कारोगके वेगसे रोगीकी भौंह और कनपटियोंमें कष्ट होने लगता है, कान तथा नेत्र बंद हो जाते हैं, कानोंसे सुनायी नहीं देता है और आँखोंसे दिखायी नहीं पड़ता है। रोगीके शरीर, वाणी और स्मरणकी शक्तिको शिथिल करती हुई जो हिक्का अन्तमें उसे संज्ञाशून्य कर देती है, तथा अन्य इन्द्रियोंको दुःखित करती हुई वह उसके मर्मस्थलमें पीड़ा पहुँचाती है तथा रोगीको पीठभागसे झुका देती है एवं शरीरको शुष्क कर देती है, उस हिक्काको 'महती हिक्का' कहा जाता है। यह महामूला, महाशब्दा, महावेगा और महाबला होती है।

गम्भीरा नामकी हिक्का पक्वाशय, मलाशय अथवा नाभिभागसे अपने पूर्वस्वभावके अनुसार शरीरमें प्रकट होती है तो उस रोगीको जम्भाई लेनेके लिये विवश कर देती है। उसके हाथ-पैर आदि सभी अङ्ग फैलने लगते हैं। उस हिक्काके कुप्रभावसे रोगीका सम्पूर्ण शरीर शिथिल पड़ जाता है। इसमें गम्भीर शब्द होता है, इसलिये इसका नाम 'गम्भीरा हिक्का' है।

प्रारम्भमें<sup></sup> बतायी गयी भक्तोद्भवा (अन्नजा) तथा क्षुद्रा नामक जो दो हिक्काके प्रकार बताये गये हैं, वे साध्य होती हैं। उन दोनोंको छोड़कर शेष अन्य जो यमलादिक तीन हिक्काएँ हैं, वे असाध्य होती हैं। किंतु चिरकाल (पुरानी) हिचकी, वृद्ध मनुष्यकी हिचकी, अतिस्त्री-सेवीकी हिचकी, व्याधिद्वारा क्षीण देहवालेकी हिचकी, अन्नके अभावसे कृश मनुष्यकी हिचकी—ये सब असाध्य होती हैं। सभी रोग शरीरमें प्राणियोंका विनाश करनेके लिये ही आते हैं। किंतु वे वैसी शीघ्रता नहीं करते हैं, जैसी शीघ्रता इस हिक्काके यमलादिक भेद करते हैं। हिक्का और श्वास—ये दोनों रोग जैसे हैं, वैसे अन्य कोई रोग नहीं हैं। वे दोनों तो मृत्युकाल-स्वरूप प्राणीके शरीरमें ही अपना डेरा डाल लेते हैं।
(अध्याय १५१)

राजयक्ष्मा-निदान

**धन्वन्तरिजीने कहा—**अब मैं हिक्कारोगके पश्चात् यक्ष्मारोग<sup></sup>के निदानको भलीभाँति कह रहा हूँ।

राजयक्ष्मारोगसे पूर्व प्राणीके शरीरमें अनेक रोग रहते हैं और बादमें अनेक रोग हो जाते हैं। इस रोगको राजयक्ष्मा, क्षय, शोष तथा रोगराज भी कहा जाता है। प्राचीनकालमें नक्षत्र और द्विजोके राजा चन्द्रमाको यह रोग हुआ था। एक तो यह रोगोंका राजा है और दूसरे इसका नाम यक्ष्मा है।


१-अ०हृ०नि०अ०५। २-अ०हृ०नि०अ० ४, च०चि०अ० २१। ३-सु०उ०तं०अ० ४१, च०चि०अ० ६, अ०हृ०नि०अ० ५।

काण्ड ]राजयक्ष्मा-निदान२६७

इसलिये इसे 'राजयक्ष्मा' कहा गया है। यह देह और औषधि दोनोंका क्षय कर देता है तथा शरीर और औषधिका विनाश करनेवाले रोगके रूपमें यह उत्पन्न होता है, इसलिये इसका क्षय नाम दिया गया है। यह रसादि धातुओंका शोषण करनेके कारण शोष नामसे भी जाना जाता है। राजाके समान रोगोंका राजा है, जिसके कारण रोगराजके नामसे अभिहित किया गया है।

साहसके कार्य मल-मूत्रादिके वेगका बलात् अवरोध, शुक्रौज, शारीरिक स्निग्धताका विनाश तथा संयमित आहार-व्यवहारका परित्याग—ये चार इस यक्ष्मारोगकी उत्पत्तिके कारण हैं। शरीरमें उन्हीं कारणोंसे कुपित हुआ वायु पित्त एवं कफको व्यर्थमें ही कुपित कर देता है। तदनन्तर वह शरीरके संधिस्थानोंमें प्रवेश करके उनकी शिराओंको पीड़ित करता हुआ रक्त, अन्न, रसवाही आदि सभी स्रोतोंके मुखोंको बंद करता है अथवा उसी प्रकार उन सभीको छोड़कर हृदयभागमें जा पहुँचता है और उसको मध्य, ऊपर, नीचे तथा तिरछे रूपमें व्यथित करता है।

इस रोगके उत्पन्न होनेसे पूर्व रोगीको प्रतिश्याय ज्वर, लार, प्रवाह, मुखमाधुर्य, अग्निमान्द्यता तथा शारीरिक शिथिलताका दोष होता है। अन्न और पेय पदार्थके प्रति अनिच्छा तथा पवित्रतामें अपवित्रताकी प्रतीति रोगीको होती है। प्रायः उसको भोज्य एवं पेय पदार्थोंमें मक्खी, तृण और बाल गिरनेका भान होता है। रोगीका हृदय कफादिसे संश्लिष्ट हो जाता है, उसको वमन होता है। आहार-विहारके प्रति उसकी रुचि नहीं रह जाती है। भोजन करनेपर भी वह अपनेको शक्तिहीन समझता है। उसके हाथ-पैर, जंघा, वक्षःस्थल, मुख, नेत्र तथा कुक्षिभाग सूख जाते हैं। रक्तकी कमीके कारण उसका रंग श्वेत हो जाता है। उसकी भुजाओंमें विशेष प्रकारकी पीड़ा होती है। उसकी जिह्वामें भी ज्वरादिके कारण उत्पन्न हुए छालोंसे कष्ट रहता है। उसको शरीरके प्रति स्वयं घृणा होती है। उसमें स्त्रीसंसर्ग, मद्य और मांसके प्रति प्रेम तथा घृणा दोनों होने लगते हैं। उसके सिरमें चक्कर आता है। इस रोगके होनेपर रोगीके नाखून, केश तथा अस्थि अपेक्षाकृत पहलेसे अधिक बढ़ते हैं। वह स्वप्नमें अपनी पराजय देखता है।

पतंग, कृकल (गिरगिट), साही, बंदर, कुत्ता तथा पक्षियोंसे भयार्त होकर अपनेको पराजित या गिरता हुआ देखता है। स्वप्नमें अपने शरीरके बाल तथा अस्थिभागको भस्म होते हुए देखकर वह भयभीत होता है। वह स्वप्नमें ही वृक्षपर चढ़ता है। उसे स्वप्नमें निर्जन ग्राम और देशका दर्शन होता है। जलरहित भूभागको देखनेके कारण उसे स्वप्नमें भय लगता है। उसको आकाशमें प्रकाशपुञ्ज तथा दावाग्निसे जलते हुए वृक्ष दिखायी पड़ते हैं, जिससे उस रोगीका मन भयसे व्याकुल हो उठता है। ये सब लक्षण रोगप्रभावके कारण ही होते हैं। अतः इसे पूर्वरूप कहते हैं।

इस राजयक्ष्मारोगके* कोष्ठगत होनेपर रोगीको पीनस, श्वास, कास, स्वरभंग, सिरपीड़ा, अरुचि, ऊर्ध्वनिःश्वास, शारीरिक शुष्कता, वधजन्य कष्ट तथा वमन होता है। उसके पार्श्वभाग तथा संधिस्थानमें पीड़ा होती है। उसका शरीर ज्वरसे संतप्त रहता है। इस प्रकार इस राजयक्ष्माके उक्त ग्यारह लक्षण रोगीके शरीरमें पाये जाते हैं। उनके उपद्रवसे रोगीके कण्ठमें ऐसी पीड़ा होती है जैसी श्वासमार्गमें विकृति एवं हृदयवेदना होनेपर होती है। उसे जम्भाई आती है, प्रत्येक अङ्गमें दर्द होता है, मुखसे बार-बार थूक निकलता है, मन्दाग्नि हो


* सु०उ० ४१, अ०हृ० नि०अ० ५।

२६८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

जाती है तथा मुखसे दुर्गन्ध आने लगती है।

इस राजयक्ष्माके रोगमें वायुप्रकोपके कारण रोगीके शिरोभाग तथा दोनों पार्श्वमें शूल उठता है, जिसके कारण असह्य पीड़ा होती है। दर्दसे रोगीका अङ्ग-अङ्ग टूटता रहता है, कण्ठावरोध और स्वरभंग हो जाता है। पित्तदोष होनेसे रोगीको स्कन्ध-प्रदेश, हाथ तथा पैरमें दाह, अतिसार, रक्तसंश्रित वमन, मुखदुर्गन्ध, ज्वर और एक प्रकारका मद रहता है। कफजन्य दोषके कारण रोगीको अरुचि, वमन, खाँसी, आधे शरीरका भारीपन, लारबाहुल्य, पीनस, श्वास, स्वरभेद और अग्निमान्द्यका प्रकोप होता है। इसी अग्निमान्द्यता एवं शरीरमें शोथको उत्पन्न करनेवाले प्रदूषित कफजन्य दोषोंसे रोगीके रक्तवाही आदि स्रोतोंके मुखोंका अवरोध तथा धातुओंके क्षीण हो जानेपर हृदयमें दाह और अन्य उपद्रव होते हैं।

शरीरके अंदर पक्वाशय-भागमें उक्त दोषोंके कारण प्रायः अन्न आम्लिक रससे पकता है, जिसके कारण वह सिद्ध नहीं होता और न तो शारीरिक पुष्टतामें सहयोग करनेकी क्षमता ही अर्जित कर पाता है। रोगीके शरीरका ऐसा आम्लिक रस रक्त और मांसको पुष्ट करनेमें अक्षम होता है। सप्तधातुओंका पोषण न होनेपर रोगी केवल मलके भरोसे जीता है।

रोगीमें इन लक्षणोंके कम होनेपर भी अत्यन्त क्षीणता आ सकती है। इस रोगमें छः प्रकारका क्षय होता है। अतः उन सभी प्रकारोंके क्षय होनेपर रोगीके शरीरमें होनेवाले उपद्रवोंको यथोपचार रोककर यथासम्भव इस रोगको समूल दूर करनेका प्रयास करना चाहिये अन्यथा इस रोगसे प्राणीकी मृत्यु ही निश्चित होती है।

उक्त रोगके दोष पृथक्-पृथक् या समूहवत् शरीरपर प्रकट होते ही रोगीके मेदका क्षय हो जाता है, जिसके कारण उसके स्वरोंमें भेद, क्षीणता, रूक्षता और चञ्चलता आ जाती है। वात-प्रकोप होनेसे रोगीका कण्ठ सफेद रंगका हो जाता है। उसके शरीरकी स्निग्धता तथा उष्णता समाप्त हो जाती है। पित्तदोषके कारण रोगीके तालु और कण्ठमें दाह होता है और निरन्तर वह सूखता जाता है। रोगीका मुँह और कण्ठ कफसे संलिप्त रहता है। उसके गलेसे घुरघुराती हुई ध्वनि निकलती है। उस कालमें रोगी स्वयंमें सभी विरुद्ध आचरणोंसे प्रभावित हो उठता है। अतः वह उसकी ओर उन्मुख हो जाता है, जिससे अन्य सभी लक्षणोंकी उत्पत्ति हो जाती है। इससे रोगी मृत्युको ही प्राप्त होता है। वैसी स्थितिमें रोगीको सब ओर धुएँके समान ही दिखायी देता है और सभी कफजन्य लक्षण उसमें प्रकट हो उठते हैं।

इस क्षयरोगसे बचना बड़ा ही कष्टसाध्य है। यदि सभी लक्षणोंसे युक्त होकर यह प्राणीपर आक्रमण करता है तो रोगीकी जीवनरक्षा असम्भव हो जाती है। अतः अल्प लक्षणोंके दिखायी देते ही इस रोगको शरीरसे दूर करनेहेतु विधिवत् चिकित्सा करनी चाहिये। (अध्याय १५२)


अरोचक, वमन आदि रोगोंका निदान

धन्वन्तरिजीने कहा— हे सुश्रुत ! अब मैं आपको अरोचकरोगके निदानके विषयमें बताऊँगा। जब वात-पित्त तथा कफजन्य दोष जिह्वा और हृदय या मनका आश्रय लेते हैं, तब प्राणीके शरीरमें अरोचकरोग उत्पन्न होता है।

यह रोग वातजन्य, पित्तजन्य तथा कफजन्य—


१-च०चि०अ० १६, अ०हृ०नि०अ० ५। २-च०चि०अ० ८, सु०उ०तं०अ० ५७।

काण्ड ]अरोचक, वमन आदि रोगोंका निदान२६१

इन तीन रूपोंके अतिरिक्त सन्निपातजन्य और मनःसंतापजन्य भी होता है। इस रोगके पाँच प्रकार हैं। यथा—वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज और मनःसंतापज। वात आदि दोषोंसे होनेवाली अरुचिमें रोगीका मुख क्रमशः वायुमें कसैला, पित्तमें तिक्त, कफमें मीठा या माधुर्ययुक्त, सन्निपातमें विकृतरस तथा शोक-दुःखादिमें दोषानुसार स्वादवाला¹ हो जाता है। इस रोगमें रोगीको किसी द्रव्य-विशेषका आस्वाद नहीं प्राप्त होता है। शोक, क्रोधादिमें मनकी जैसी स्थिति होती है, उसी प्रकार उसकी भोजनादि ग्रहण करनेकी अभिरुचि होती है। जब मन शोकादिके कारण खिन्न रहता है तो भोजनके प्रति अरुचिके कारण उसे अन्नादि ग्रहण करनेकी अनिच्छा हो जाती है। इस रोगमें अग्निदुष्ट ही प्रधान कारण है।

छर्दि² अर्थात् वमनरोग पाँच प्रकारका होता है—वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज तथा अनभिप्रेत (इच्छाके विपरीत)। दुष्ट पदार्थोंके ग्रहण करनेसे पाँचवीं छर्दि होती है। सम्पूर्ण प्रकारके वमनरोगमें उदान वायु प्रकुपित होकर सभी प्रकारके अधिकृत दोषोंको उद्दीप्त करता है, जिसके फलस्वरूप क्रमशः शीघ्रातिशीघ्र रोगीको कष्ट होता है, मुख लवणयुक्त रहता है तथा उससे पानी छूटता है और धीरे-धीरे आहार-व्यवहारके प्रति अरुचि हो जाती है। इस रोगमें रोगीकी नाभि तथा पृष्ठ-प्रदेशमें वेदना होने लगती है। रोगीके पार्श्वभागमें भी पीड़ा होती है, जिसके कारण पेटमें अवस्थित अन्न ऊपरकी ओर पक्वाशयसे निकलने लगता है। अर्थात् रोगीको वमनकी इच्छा होती है। अन्ततोगत्वा रोगीके मुँहसे कषाय और फेनयुक्त थोड़ा-थोड़ा करके वमन होता है।

इस वातजन्य वमनरोगमें अत्यन्त कष्टसाध्य पीड़ाके साथ रोगीको तेज दर्द होनेके कारण चिल्लाना पड़ता है। उसको खाँसी आती है, उसके मुखमें शोथ होता है और उसकी वाणीमें स्वरभंग होने लगता है।

पित्तजन्य वमनरोग होनेपर रोगीको क्षारसे युक्त जलके समान धूम्र, हरित या पीतवर्णवाले पित्तका वमन होता है अथवा रक्तसे युक्त अम्ल, कटु, तिक्त पित्त उसके मुँहसे निकलता है। उसके शरीरमें तृष्णा, मूर्च्छा, संताप तथा अग्निके समान दाहका प्रकोप होता है।

कफजन्य वमनरोगके होनेसे रोगीमें स्निग्ध, घनीभूत पीत तथा मधु (शहद)-के समान मधुर, श्लेष्मा (कफ)-का उदय होता है। यह कफ लवण-रससे भी युक्त हो जाता है। इस कफदोषके कारण उत्पन्न वमनके कष्टसे रोगीको भयवश रोमाञ्च हो जाता है। इस रोगमें रोगीके मुखमें शोथ हो जाता है। उसके मुखमें मिठास भरी रहती है, उसके नेत्रोंमें तन्द्रा छायी रहती है, उसके हृदयमें कष्ट होता है और उसे खाँसी आती है।

सन्निपातिक वमनरोगमें सभी दोषोंके लक्षण दिखायी देते हैं। ऐसी अवस्थामें उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। ऐसे रोगीको देखना, सुनना आदि कुछ अच्छा नहीं लगता है।

वातादिके³ प्रकुपित होनेपर ही उदरभागमें कृमिजन्य और अन्नजन्य वमनरोग भी उत्पन्न होता है। कृमिजन्य छर्दिरोगमें शरीरमें शूल, कम्पन, मिचली तथा हल्लास (हृदयकी धड़कन)-के उपद्रवकी उत्पत्ति विशेष रूपसे ही होती है।

(अध्याय १५३)


१-अ०हृ०नि०अ० ५, च०चि०अ० २६। २-च०चि०अ० २३, सु०उ० तं०अ० ४९। ३-च०चि०अ० २०, अ०हृ०नि०अ० ५।

१३५- अतिसार-ग्रहणी-निदान

२७०संक्षिप्त गरुड़पुराण[ आचार-

हृदय-तृषारोगका निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं आपसे हृदयरोगका निदान कहूँगा।

हृदयको सामान्यतः सभी रोगोंसे रुग्ण बनानेवाले प्रतीक दोष वात, पित्त, कफ तथा सन्निपातके साथ कृमिदोष भी है। जिसके कारण हृदयमें वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज और कृमिज—ये पाँच प्रकारके रोग माने गये हैं।

वातदोषके कारण वातज हृदयरोगीको अपने हृदयमें तीव्र शूलका अनुभव होता है, सूईके चुभने और फटनेकी-सी पीड़ा होती है। दोषके कुप्रभावसे हृदयमें उठी हुई असह्य वेदनासे व्यथित होकर रोगी रोता रहता है। यह वातज दोष हृदयको विदीर्ण कर देता है। उसके दुष्प्रभावसे शरीरपर शुष्कता छायी रहती है। रोगी दुःख-सुखकी अनुभूतिमें स्तब्ध (अवाक्) बना रहता है। स्वयंमें उसे शून्यताकी अनुभूति होती है। मनमें भ्रमकी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अकस्मात् उसमें दीनता, शोक, भय, शब्द-श्रवणमें असहिष्णुता, कम्पन, मोह, श्वासरोध तथा अल्पनिद्राके लक्षण भी उत्पन्न हो जाते हैं।

पित्तदोषसे हृदयरोगीको तृष्णा, थकान, दाह, स्वेद, अम्ल उद्गार, क्लम (थकान), अम्लपित्तात्मक वमन, धूम्रदर्शन और ज्वर होता है। कफजन्य दोष होनेसे हृदयमें स्तब्धता तथा हृदयके अंदर पत्थरके समान भारीपन हो जाता है। इन दोषोंके अतिरिक्त ऐसे रोगीको खाँसी, अस्थि, पीड़ा, थूक, निद्रा, आलस्य, अरुचि और ज्वरका भी उपद्रव होता है।

हृदयरोगमें जब उपर्युक्त तीनों दोषोंके लक्षण शरीरमें प्रकट हो उठते हैं तो वह सन्निपातज हृदयरोग हो जाता है। कृमिजन्य हृदयरोगमें रोगीके नेत्रोंका वर्ण काला हो जाता है। उसके नेत्रोंके सामने अन्धकार छाया रहता है। उसको हल्लास, शोथ, खुजलाहट तथा मुँहसे कफ आता है। इस रोगमें रोगीका हृदय ऐसी असह्य पीड़ासे व्यथित होता है, जैसे वह आरेसे चीरा जा रहा हो। यह रोग बड़ा भयंकर और शीघ्र प्राणघातक होता है। इसलिये इस रोगकी शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिये।

वात, पित्त, कफ, सन्निपात, रसक्षय तथा बलकी अल्पता और उपसर्ग—इस प्रकार तृषा (तृष्णा या तृषारोग) छः प्रकारका होता है (उनके नाम हैं—वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, बल (रस)-क्षयज तथा उपसर्गज)। इस प्रकारके सब तृषारोगोंका मुख्य कारण तो वात-पित्तसंश्रित दोषमें विद्यमान रहता है। इन दोषोंके द्वारा रोगीके शरीरकी धातु (शक्ति)-का शोषण होनेसे चक्कर, कम्पन, ताप, हृद्दाह, मोह तथा मूर्च्छाका उपद्रव होता है। इस रोगमें जिह्वाके मूलभाग, कण्ठ और तालुमें सञ्चार करनेवाली जलवाही शिराओंको शुष्क बनाकर तृष्णा (प्यास) उत्पन्न होती है।

इस तृषारोगमें मुखशोष, जलसे अतृप्ति, अन्नके प्रति घृणा, स्वरभंग तथा कण्ठ-ओष्ठ, तालुकी कर्कशताके कारण जिह्वा निकालनेमें रोगीको कष्ट होता है। वह असह्य वेदनाके कारण प्रलाप करता है, उसका चित्त स्थिर नहीं रहता तथा मनमें अनेक प्रकारके उद्गार उठते हैं। वायु-प्रकोपके कारण उत्पन्न तृषासे शरीरमें कृशता और दीनता आ जाती है, सिरमें शंखोद्भेद, असह्य पीड़ा और भ्रम उत्पन्न होता है। पित्तदोषके कारण तृषारोगी गन्ध-ज्ञानकी क्षमतासे रहित, श्रवण-शक्तिसे निर्बल, निद्राहीन तथा अन्य शारीरिक क्षमताओंके ह्रासोन्मुख होनेसे बलहीन हो जाता है। उसको शीतलताका अनुभव


१-च०चि०अ० २६, सु०उ० ४३, च०चि०अ० ४३। २-च०चि०अ०२६, सु०उ०अ० ४३।

कांड ] मदात्यय-निदान २७१

होता है और मुखसे अम्लयुक्त फेन निकला करता है।

पित्तज तृषारोगमें रोगीके मुखमें तिक्तता बनी रहती है और मूर्च्छाका भी प्रकोप होता है। रोगीके नेत्र रक्तवर्णके हो जाते हैं। उसके मुखमें निरन्तर शुष्कता बनी रहती है। शरीरमें दाह रहता है और मुँहसे अत्यन्त धूमायित वायु छूटती है।

कफज तृषारोगमें वायु प्रकुपित हो उठती है। उसके कुप्रभावसे अन्तःस्थ स्रोत कफयुक्त हो जाता है और उसके बाद वह उसमें पंकवत् सूख जाता है। उसका कण्ठभाग काँटोंसे चुभते हुएके समान व्यथित होता है। रोगीमें निद्रा छायी रहती है और उसका मुख सदैव मधुर (मीठा) बना रहता है। ऐसा रोगी पेट फूलने, सिरपीड़ा, जडता, शुष्कता, वमन, अरुचि, आलस्य तथा अग्निमान्द्यके दोषसे युक्त होता है।

जिस तृषारोगमें तीनों दोषोंके मिले हुए लक्षण पाये जाते हैं, वह त्रिदोषसे उत्पन्न होती है। इस रोगमें आँवकी उत्पत्तिके कारण रक्तवाही स्रोतका अवरोध होता है। जिसके कुप्रभावसे वात-पित्तका दोष शरीरमें उत्पन्न हो जाता है। उससे रोगीके शरीरमें उष्णता बढ़ जाती है, जिसके कारण शीतल जल प्राप्त करनेकी अभिलाषिणी तृष्णाका प्रादुर्भाव होता है अर्थात् रोगी इस कालमें प्याससे बेचैन हो उठता है। उसी उष्णताके कारण शरीरमें प्रविष्ट हुआ जल जब ऊपरी कोष्ठमें जाता है, तब उसे पित्तजा नामक तृष्णाकी उत्पत्ति होती है। अत्यधिक जल पीनेसे जो तृष्णा शान्त नहीं होती, अपितु तीव्रगतिसे बढ़ती ही जाती है, वह शरीरके स्निग्ध अंशको जला देनेवाली होती है। उसको स्नेहपाकजा अथवा पित्तजा नामकी तृष्णा कहा गया है।

स्निग्ध, कटु, अम्ल तथा लवणरससंश्लिष्ट भोजन करनेसे कफोद्भव तृष्णाका जन्म होता है। जब तृष्णा शरीरके रसको विनष्ट करनेवाले उपर्युक्त लक्षणसे समन्वित हो जाती है, तब वह क्षयात्मिका तृष्णा कहलाती है। जो शोष-मोह-ज्वर आदि अन्य दीर्घकालतक रहनेवाले रोगोंके कारण शरीरमें तीव्र तृष्णा उत्पन्न होती है, उसे उपसर्गात्मिका तृष्णाके नामसे स्वीकार किया गया है।

(अध्याय १५४)


मदात्यय-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं प्राचीन मुनियोंके द्वारा प्रतिपादित मदाधिक्यके निदानको कहता हूँ।

मद्य, तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, सूक्ष्म, अम्ल, व्यवायी, आशुकारी, लघु, विकाशी तथा विशद होता है। ओज इसके विपरीत होता है अर्थात् ओज मन्द, शीत, मधुर, सान्द्र, स्निग्ध, स्थूल, चिरकारी, गुरु और पिच्छल होता है। तीक्ष्णादि दस गुण मद्यमें होता है और यही गुण विषमें भी होते हैं, जो प्राणियोंके चित्तमें हलचल मचानेवाले तथा प्राणघातक होते हैं। प्रथम मदमें मद्य अपने तीक्ष्णादि दस गुणोंसे ओजके मन्दादि दस गुणोंको संक्षुभित करके चित्तमें विकार उत्पन्न कर देता है। दूसरा मद प्रमादका स्थान है।<sup></sup> इसमें दुष्ट विकल्पोंसे उपहत मनुष्य कर्तव्याकर्तव्यसे अज्ञान होकर मद्यके द्वितीय वेगको अधिक सुखकर मानता है। रजोगुणी या तमोगुणी मनुष्य मध्यम और उत्तमकी संधि अर्थात् द्वितीय और तृतीय मदकी मध्यावस्थामें पहुँचकर अंकुशरहित मदोन्मत्त निरंकुश हाथीकी तरह कुछ भी नहीं करता। यह मद्यावस्था निन्दनीय


१-च०चि० २२, सु०उ०तं० अ० ४८, अ०हृ०जि०अ० ५। २-च०चि०अ० २४, १२, अ०हृ०नि०अ० ६।

१३६- मूत्राघात-निदान

२७२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

मनुष्यों तथा दुःशीलोंकी भूमि अर्थात् एकमात्र मदिरा ही अनेक मुखवाली दुर्गंतिकी आचार्य है। मदकी तीसरी अवस्थामें पहुँचकर मनुष्य निश्चेष्ट होता हुआ मौन होकर सोया रहता है। वह पापात्मा मरनेसे भी अधिक बुरी दशामें पहुँच जाता है। मद्यमें आसक्त मनुष्य धर्म-अधर्म, सुख-दुःख, मान-अपमान, हित-अहित, शोक-मोहकी अनुभूतिसे रहित हो जाता है। वह शोक, मोहादिसे समन्वित रहता है। ऐसा प्राणी उन्माद-भ्रम और मूर्च्छामें सदैव विद्यमान होता है और अन्ततोगत्वा मिर्गीके रोगीके समान भूमिमें गिरकर छटपटाता रहता है। जो व्यक्ति बलवान् हैं, समुचित भोजन करते हैं या यथाशक्ति प्रचुरमात्रामें भोजन करके पचा जाते हैं, उनमें मद नहीं होता है। यह मदात्ययरोग वात-पित्त तथा कफके प्रकुपित होनेके कारण उत्पन्न हुए अन्य सभी दोषोंसे होता है।

इस प्रकार वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक और सन्निपातिक नामसे यह मदात्यय चार प्रकारका होता है। मोह, हृदयवेदना, पुरीषभेद, निरन्तर तृषा, कफ, पित्तज्वर, अरुचि, हृदयमें विबन्धता, अन्धकार, खाँसी, श्वास, निद्रा न आना, पसीना, विष्टम्भता, सूजन, चित्तविभ्रम, स्वप्नदर्शनसे घबड़ाहट, मना करनेपर भी बोलते रहना आदि—ये सब मदात्ययके सामान्य लक्षण हैं।

पित्तदोषके कारण मदात्यय होनेपर प्राणी दाहज्वर, स्वेद, मोह, प्यास, अतिसार और विभ्रमके कारण उपद्रवसे ग्रस्त होता है। श्लेष्मज मदात्ययरोगमें रोगी वमन, हल्लास (धड़कन), निद्रा तथा अग्निमान्द्यके कारण उदरकी गुरुताके दोषसे संत्रस्त रहता है। सन्निपातिक दोषवाले मदात्ययमें पूर्वकथित सभी लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। यह सब जानकर जिस प्राणीकी अभिरुचि सहसा मद्यपानमें हो जाती है तो उसमें ध्वंसक और शोषक—ये वातज व्याधियाँ हो जाती हैं। ये कष्टसाध्य होती हैं और विशेषकर दुर्बल मनुष्यको होती हैं।

ध्वंसकमें कफकी प्रवृत्ति, कण्ठशोष, अतिनिद्रा, शब्दका न सहना होते हैं, विक्षय (शोषक)-रोगमें चित्तविक्षेप, अङ्गमें पीड़ा, हृदय तथा कण्ठमें रोग, सम्मोह, खाँसी, तृष्णा, वमन तथा ज्वर होते हैं। अतः जो व्यक्ति जितेन्द्रिय हो, वह इन सभी बातोंपर विधिवत् पहले विचार करे। तदनन्तर वह मद्यके दोषसे अपनेको दूर कर ले। इसीमें उसका कल्याण है। मद्यसे दूर रहनेवाला शारीरिक तथा उन्माद आदि मानसिक विकारोंसे कभी कष्ट नहीं पाता है।

रजोगुण, तमोगुणकी प्रधानतावाले मोहजन्य दोष तथा असंयमित आहार करनेवाले प्राणीको मद, मूर्च्छा और संन्यास नामक तीन प्रकारके रोग होते हैं। यथा—शरीरमें इनका प्रकोप होनेपर ये तीनों रोग रस, रक्त और चेतनाके ही स्रोतोंके निरोध हो जानेसे होते हैं। इनमें मदसे मूर्च्छा और मूर्च्छासे संन्यास उत्तरोत्तर बलवान् होते हैं।

मदात्ययरोग मद, वात, पित्त, कफ तथा सन्निपातके दोषोंसे तो होता ही है, किंतु रक्त, मद्य और विषके कारण भी यह शरीरमें उत्पन्न हो जाता है। शरीरमें शक्तिकी अनन्तता न होनेके कारण जब शक्ति क्षीण हो जाती है तो प्राणी अपनी शक्तिका आभासमात्र करता है। उसकी चित्तवृत्तियाँ चञ्चल हो उठती हैं। वह छल-कपटके व्यवहारसे घिरा रहता है।

वातज मद्यसे मनुष्यका शरीर रूक्ष-श्याम और अरुण-वर्णका हो जाता है। पित्तज मद्यसे प्राणी क्रोधी हो उठता है। उसके शरीरका वर्ण लाल और पीला हो जाता है। वह कलहमें अभिरुचि लेता है। कफोत्पादक मदात्ययमें रोगी जब सोता है तो उसे स्वप्न दिखायी देते हैं। स्वप्नमें असम्बद्ध,

काण्ड ] मदात्यय-निदान २७३


अनर्गल प्रलाप करता है। उसकी चित्तवृत्तियाँ किसी विशेष ध्यानमें एकाग्र होकर अनुरक्त रहती हैं। सभी दोषोंके कारण उत्पन्न होनेवाले सन्निपातजनित मदमें प्राणीका वर्ण रक्त हो जाता है और उसके शरीरमें स्तम्भन होने लगता है, जिसके कारण उसके अङ्ग-अङ्ग शिथिल हो जाते हैं।

इस मदात्ययरोगमें तो प्राणीके शरीरमें पित्तदोष सर्वप्रथम ही प्रकट हो जाता है। उसकी समस्त शारीरिक चेष्टाएँ विकृत हो जाती हैं। उसे तृष्णा, स्वरभंग तथा अज्ञानकी अवस्था प्राप्त होती है। उसको सद्-ज्ञान नहीं रह जाता है। विषज मदमें शरीरमें कम्पन होता है। वह गहन निद्रामें सोता है और उसको इस मदात्ययरोगमें अत्यधिक थकानकी अनुभूति होती है।

मनुष्यको शरीरके अंदर विद्यमान रक्त, मज्जादिमें उभरे हुए वात-पित्त तथा कफजनित दोषोंके लक्षणोंको देखकर यथापेक्षित वातज, पित्तज, कफज या सन्निपातज मदात्ययका निर्धारण करना चाहिये और उसी रोगके अनुसार चिकित्सा भी करनी चाहिये। यथा—वातज, मदात्यय (मूर्च्छा) होनेपर सामान्यतः रोगी आकाशको लाल-नीला अथवा काला रंग देखता हुआ अपनेको अन्धकारमें पहुँचा हुआ मूर्च्छित मानता है। शीघ्र मूर्च्छा टूटनेपर वह हृदयकी पीड़ा—कम्पन तथा भ्रमसे संतप्त रहता है।

जो व्यक्ति वातिक मदात्ययदोषसे ग्रस्त होता है उसे खाँसी आती है और कान्ति पीली एवं लाल रंगकी हो जाती है। वह अधिकतर मूर्च्छामें ही रहता है। पित्तात्मक दोषकी सामान्यतः परिणतिमें रोगीको आकाश रक्त अथवा पीतवर्णका प्रतीत होता है और अन्तमें उसे अन्धकार-ही-अन्धकार दिखायी देता है। उस समय उसको विशेष प्रकारका ज्ञान प्राप्त होता है। उसके शरीरसे पसीना निकलता है। वह शरीरमें उत्पन्न हुए दाह, तृष्णा तथा तापसे पीड़ित हो उठता है। कफसे संश्लिष्ट होनेपर रोगीको एक छिन्न-भिन्न होती हुई नीली-पीली आभा दिखायी देती है। उसके लाल, पीले और नीले नेत्रोंमें व्याकुलता छायी रहती है। कफज मूर्च्छामें रोगी आकाशको मेघोंसे आच्छन्न देखता हुआ मूर्च्छित हो जाता है। उसे गहन निद्रा आती है, इसलिये उसकी नींद बहुत देरके बाद टूटती है। होशमें आनेपर उसके हृदयमें धड़कन होती है और प्राण सूखते हुए प्रतीत होते हैं। उक्त दोषके कारण उत्पन्न हुए भारीपन और आलस्यके वशीभूत हुए अङ्गोंसे उसको ऐसी अनुभूति होती है, जैसे शरीर राजधर्मसे अनुप्राणित पुरुषों (सिपाहियों)-के द्वारा प्रताड़ित किया गया है। इन सभी दोषोंका प्रभाव जब एक साथ शरीरपर पड़ता है तो सन्निपातकी अवस्था आ जाती है। उस कालके मदात्ययमें प्राणीका सम्पूर्ण शरीर (अपस्मार) मिर्गी के रोगसे ग्रस्त हुएके समान पृथ्वीपर गिर पड़ता है। अपस्मारमें रोगीकी चेष्टा बीभत्स हो जाती है और इसमें नहीं होती है।

वातादिक दोषोंके वेग समाप्त होनेके कारण उत्पन्न मदात्ययकी मूर्च्छा और अन्य उपद्रवोंसे ग्रस्त प्राणियोंके कष्टोंका उपशमन बिना औषधिक उपचारके ही संयमित रहनेसे स्वयमेव हो जाता है। परंतु संन्यासका रोग औषधके बिना शान्त नहीं होता। इस मदात्ययकालमें वाचिक, शारीरिक तथा मानसिक चेष्टाओंके दबावमें निर्बल प्राणी स्वयं प्राणाघात ही करते हैं। जिससे वे मरे हुएके समान काष्ठवत् हो जाते हैं। यदि उनकी चिकित्सा शीघ्र नहीं की जाती है तो वे अविलम्ब ही मर जाते हैं।


१-अ०हृ०नि०अ० ६। २-सु०उ०तं०अ० ४६, अ०हृ०नि०अ० ६ ।

२७४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ग्राहादिक हिंसक जलचरोंसे भरे हुए अथाह जलराशियाले समुद्रके समान इस संन्यास मदात्ययरोगके सागरमें डूब रहे प्राणीकी शीघ्र ही रक्षा करनी चाहिये। उसमें मद, मान, रोष, संतोष आदि विभिन्न प्रवृत्तियाँ होती हैं। उन्हीं प्रवृत्तियोंके द्वारा वह यहाँ-वहाँसे उचित और अनुचितका विचार करके यथापेक्षित कार्यमें सामान्य विधिका प्रयोग करता है, किंतु अयुक्तिपूर्वक मद्यपानसे प्रभावित दशामें ऐसा सम्भव नहीं है। उसे कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है। (अध्याय १५५)

अर्श ( बवासीर )-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं अर्श (बवासीर) नामक रोगके निदानका विषय बताऊँगा।

प्राणियोंके मांसमें जो कीलक सदा उत्पन्न होते हैं, वे कीलक गुदाके द्वारका अवरोध करते हैं, इसलिये उन्हें अर्श कहा जाता है। वात-पित्त तथा कफजन्य दोष शरीरमें स्थित त्वक्, मांस और मेदको दूषित करके अपानवायुके मार्गमें अनेक आकृतियोंवाले मांसांकुरोंको जन्म देता है, उन अंकुरोंको अर्श माना गया है। जो अर्श शरीरके साथ ही उत्पन्न होता है, उसे 'सहज' और जो जन्म लेनेके बाद उत्पन्न होता है, उसे 'जन्मान्तरोत्थान' कहते हैं। इस दृष्टिसे अर्शके दो भेद हुए। प्रकारान्तरसे इसके दो भेद और हैं—एक शुष्क (वादी बवासीर) और दूसरा है स्रावी (खूनी बवासीर)। गुदा नामक स्थानका आश्रय लेकर अवस्थित रहनेवाली शुष्क अग्रभागसे युक्त परस्पर भिन्न नाड़ियोंका स्थान है। गुदाभागका परिमाण साढ़े पाँच अंगुलका होता है। उसीमें नीचेकी ओर साढ़े तीन अंगुलके भागमें ये रोग स्थित रहते हैं। उनमें एक नाड़ी बालोंको जन्म देनेवाली शक्तिका सञ्चार करती है और एक नाड़ी आँतके मध्यभागसे होकर नीचेकी ओर आती है। यही आमाशयसे निकलनेवाले मलको लाकर गुदामार्गसे बाहर करती है। उसी विसर्जन कार्यके कारण उसे विसर्जनी नाड़ीके नामसे अभिहित किया गया है। उस विसर्जनी नाड़ीके बाह्यभाग अर्थात् गुदाके मुख-द्वारके बाह्यभागमें एक अंगुलका जो स्थान है, उसीमें इन मांसांकुरोंका जन्म होता है। उसके बाद डेढ़ अंगुलके परिमाणभागमें गुदौष्ठके परे रोमवती त्वचा है, जिसपर रोम नहीं उत्पन्न होते हैं। वहींपर सहोत्थ अर्शका कारण विद्यमान रहता है, जो बाल्यकालमें उपतप्त अर्थात् सहोत्थ दोषको उत्पन्न करनेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है।

प्राणियोंमें इस अर्शरोगका बीज तो माता-पिताके कुपथ्यसे उत्पन्न होता है। देवताओंके प्रकुपित होनेपर तो यही दूसरे रूपसे सान्निपातिक दोषका भी बीज बन जाता है। प्राणियोंमें इस प्रकारके जो कुल (वंश)-क्रमागत रोग होते हैं, वे सभी असाध्य माने गये हैं। सहजोत्थ अर्श तो विशेषरूपसे देखनेमें दुःसाध्य, अन्तर्मुखी, पाण्डुवर्ण सन्निहित और भयंकर उपद्रव मचानेमें समर्थ होते हैं। शरीरके वात-पित्त तथा सन्निपातदोषके अनुसार इनको वातिक, पैत्तिक, श्लेष्मिक, संसर्गज, त्रिदोषज तथा रक्तज रूपमें नियोजित किया जा सकता है। अर्थात् इन सहजोत्थ अर्श दोषके यही छः प्रकार हैं।

इनमेंसे शुष्क अर्श वात और कफसे होते हैं और आर्द्र अर्श रक्त एवं पित्तसे होते हैं। उसके दोषके प्रकोपका कारण तो पहले ही कहा जा चुका है। इसके अतिरिक्त उदरस्थ अग्निमान्द्य तथा


१-प्रवाहिणी, संवरणी और विसर्जनी।
२-च०चि०अ० १४, सु०नि०अ० २, अ०हृ०नि०अ० ७।

१३७- प्रमेहरोग-निदान

काण्ड ] अर्श ( बवासीर )-निदान २७५

मलाधिक्यकी एकत्रित अवस्थामें अतिशय, अत्यल्प तथा असामयिक जलपान, देश-कालादिके विपरीत कठिन और अल्पाहार ग्रहण करनेके कारण भी यह उत्पन्न होता है। वस्ति, नेत्र, गले और ओष्ठादिके भागोंमें घट्ट—रगड़ (घेठा), अधिक शीतल जलके संस्पर्श तथा बैठकर लगाम आदिसे साधे जानेवाले वाहन (अश्वादि)-की सवारी करनेसे भी इस रोगकी उत्पत्ति होती है। यह रोग हठात् मल-मूत्रादिके वेगको धारण करने और निकालनेसे भी हो सकता है। ज्वरगुल्म, अतिसार, ग्रहणीरोग, शोथ तथा पाण्डुरोगके प्रभाव एवं दौर्बल्यकारक आहारादिके सेवनसे अन्य उपद्रव और विषम चेष्टाओंसे भी इसका जन्म होता है। स्त्रियोंमें अपक्व-गर्भपात, गर्भवृद्धि तथा तज्जन्य पीड़ाके कारण इस उपद्रवकी उत्पत्ति होती है।

इन्हीं सब कारणोंसे अपानवायु मलस्थानके भागमें कुपित हो जाता है। तदनन्तर वह गुदाभागका शुद्ध कार्य करनेवाली वलियोंमें अपना कुप्रभाव छोड़ता हुआ अर्शके उन कीलकोंके रूपोंमें जन्म लेता है।

इस रोगका पूर्व लक्षण अग्निमान्द्य, विष्टम्भ, पैरोंमें पीड़ा, पिण्डुलिका कष्ट, भ्रम, शरीरमें शिथिलता, नेत्र, शोथ, मलभेद तथा मलग्रह है। इस रोगमें शरीरके अग्रभागसे निश्चेष्ट वायु नाभिभागसे नीचेकी ओर संचरण करता हुआ पीड़ितकर रक्तसंश्रित होकर बड़ी कठिनाईसे बाहर निकलता है। इस रोगमें आँतभागसे अव्यक्त गुड़गुड़ शब्द होता है। क्षारसहित उद्गार, अतिशय मूत्र, अल्पविष्ठा (मल), घृणा, धूमायित डकार, सिर-पीठ, वक्षःस्थलमें पीड़ा, आलस्य तथा धातुक्षरणका उपद्रव होता है। इसमें इन्द्रिय-सुखकी चञ्चलता एवं दुःख होनेके कारण रोगीमें क्रोधकी मात्रा बढ़ जाती है। इस रोगके प्रभावसे रोगीमें विष्ठा-त्यागकी आशङ्का बनी रहती है। उसके पेटमें संग्रहणी, शोथ, पाण्डु तथा गुल्म नामक रोगोंका भी उपद्रव होता है।

इतना ही नहीं, अर्शरोगके होनेसे प्राणियोंमें ये रोग भली प्रकारसे बढ़ते ही जाते हैं। उन अर्शकीलकोंसे गुदामार्ग अवरुद्ध होनेके कारण अपानवायु भी क्रुद्ध हो उठता है, जिसके फलस्वरूप वह शरीरकी समस्त इन्द्रियोंमें स्थित अन्य समानादिक भेदवाले वायु-प्रभेदोंको क्षुब्ध एवं विचलित कर देता है। वह वायु मूत्र, मल, पित्त तथा कफ, रस-रक्तादिको संक्षुब्ध करता हुआ जठराग्निको मन्द बना देता है। उससे प्रायः सभी प्रकारके अर्शरोग* उत्पन्न हो जाते हैं।

शरीरमें इन सभी अर्श-भेदोंका प्रकोप होनेपर रोगीके शरीरमें अत्यन्त दुर्बलता, उत्साहहीनता, दैन्य तथा कान्तिहीनता आ जाती है। वह रोगी साररहित वृक्षके समान सारहीन और छायारहित हो जाता है। मर्मस्थलको पीड़ित करनेवाले अत्यन्त कष्टसाध्य उक्त रोगोंका उपद्रव हो जानेसे रोगी एक दिन यक्ष्माके रोगसे भी ग्रस्त हो उठता है। उसके शरीरमें कास, पिपासा, मुखविकृति, श्वास, पीनस, खेद, अङ्ग-भंग, वमन, हिचकी, शोथ, ज्वर, नपुंसकता, बधिरता, स्तब्धता तथा शर्करा एवं पथरीरोग हो जाते हैं। वह क्षीणकाय, स्वरभंग, चिन्तातुर, अरुचि, बारम्बार थूकनेवाला और अनिच्छित स्वभावका हो जाता है। उसके सभी पर्व तथा अस्थिभागमें पीड़ा होती है। उसका हृदय, नाभि, पायु और वंक्षणभाग शूलसे ग्रस्त हो उठता है। उसके गुदामार्गसे चावलके धोवनके समान द्रव निकलता है, जो वर्णमें बगुलेके उदरभागके समान होता है। यह मल कभी-कभी सूखा


* च०चि०अ० ८, १४, अ०हृ०नि०अ० ७ ।

२७६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

हुआ, मोतीके अग्रभागकी कान्तिसे सम्पन्न, पके हुए आमके समान पीत, हरा, लाल, पाण्डु, हल्दिया तथा पिच्छिलवर्णका होता है।

वात-प्रकोपके कारण रोगीके गुदाभागमें जो मांसांकुर निकलते हैं, उनके बीच भागोंसे अपानवायु अधिक मात्रामें निकलता है, वे सूखे हुए होते हैं, उनमें चिमचिमाहट या चुनचुनाहट होती है, उनका वर्ण गाढ़े अंगारके समान लाल होता है। वे पीड़ाके कारण रोगीको स्तब्ध बना देते हैं, उन सभी अंकुरोंमें विषमता होती है और उनका स्वभाव बड़ा ही कठोर होता है। इतना ही नहीं, उनमें विशेष समानता भी प्राप्त होती है। वे वक्र और तीक्ष्ण तथा फटे हुए मुखवाले होते हैं।

वातजन्य अर्शके सभी मांसांकुरोंकी आकृतियाँ बिम्ब, खजूर, बेर तथा कपासके फलोंकी भाँति होती हैं। कुछ अंकुर कदम्ब-पुष्प और कुछ सरसोंके फूलके समान आभावाले होते हैं।

इस रोगके होनेपर रोगीके सिर, पार्श्व, स्कन्ध, जंघा, ऊरु और वंक्षणभागमें अधिक पीड़ा होती है। रोगीको हिचकी, उद्गार, विष्टम्भ, हृदयमें पीड़ा तथा अनिच्छाका प्रकोप होता है। उसको खाँसी आती है, श्वास फूलती है और अग्निमन्दता बढ़ जाती है। उसके कानोंमें ध्वनि गुञ्जरित होता रहता है। उसको सदैव भ्रम बना रहता है।

इस रोगमें गाँठदार प्रवाहिकाके लक्षणोंसे युक्त झागदार, पिच्छिलताविशिष्ट बहुत-सा विष्ठा थोड़ा-थोड़ा शब्दकर निकलता है। मलत्यागके समय अत्यन्त वेदना और शब्द होता है। रोगीकी त्वचा काली पड़ जाती है। उसके मल-मूत्रमें अवरोध बना रहता है। उसके नेत्र और मुखपर भी रोगका प्रभाव छाया रहता है। उसको गुल्म, प्लीहा, उदर अष्ठीला-सम्बन्धित विकारोंके सहित हल्लास (दिलमें धड़कन)-का भी रोग हो जाता है।

जो पित्त-प्रकोपके बाद अर्श-सम्बन्धी अंकुर निकलते हैं, वे नीलवर्णके समान मुखवाले तथा लाल-पीली और काली आभासे युक्त होते हैं। इन मांसांकुरोंके अग्रभागसे पतला रक्तस्राव होता है। इनका आकार लम्बा कोमल और आर्द्र रहता है। इनकी लम्बी आकृतियाँ प्रायः शुकजिह्वा, यकृतखण्ड तथा जोंकके मुखकी तरह होती हैं। इस अर्शरोगमें रोगीके शरीरमें दाह, शुष्कता, ज्वर, स्वेद, तृष्णा, मूर्च्छा, अरुचि एवं मोहका प्रकोप रहता है। उसको उष्ण-द्रवयुक्त, नीलवर्ण, पीत वा रक्तवर्णका मल पड़ता है, जो प्रायः आँव और धातुसे संश्लिष्ट रहता है। रोगी यवके समान कटि-भागवाला हो जाता है। उसके शरीरकी त्वचा और नख आदिकी कान्ति हरित, पीत तथा हल्दीकी-सी वर्णवाली हो जाती है।

कफजनित विकारके कारण उत्पन्न होनेवाले मांसांकुर पुष्ट मूलभागसे युक्त, सघन, मन्द वेदनाजन्य और श्वेत-वर्णके होते हैं। इनमें स्निग्धता, स्तब्धता और भारीपन होता है। ये मांसांकुर चिकने, नीले तथा कोमल होते हैं और इनमें खुजलाहट होती है। इन्हें छूनेसे सुख मालूम पड़ता है।

ये मांसांकुर बाँसके निकले हुए अंकुर, कटहलकी गुठली तथा गौके स्तनोंकी आकृतिमें पाये जाते हैं। इस अर्शसे ग्रस्त प्राणीके ऊरुभागसे ऊपर संधिस्थान, मलद्वार, वस्ति और नाभि-प्रदेशमें ऐसी पीड़ा होती है, जैसे उन स्थानोंको कोई काट-काटकर फेंक रहा हो। रोगी खाँसी, श्वास, हल्लास, शुष्कता, अरुचि, पीनस, मेहकृच्छ्र, सिरपीड़ा, जड़ता, वमन, शीतप्रकोप, क्षारोत्तेजन, नपुंसकता, अग्निमान्द्य तथा अतिसार आदिके विकारोंसे युक्त हो जाता है।

ऐसे रोगीको वसाके समान प्रतीत होनेवाले कफके साथ रक्तमिश्रित मल पड़ता है। किंतु रक्तका स्राव नहीं होता और न कष्ट ही होता है। रोगीके चर्म आदि श्वेत तथा स्निग्ध हो जाते हैं।

जिन लोगोंमें इस रोगका त्रिदोषजन्य प्रकोप होता है, उनमें सभी संसृष्ट लक्षणोंका उपद्रव होता

काण्ड ] अर्श ( बवासीर )-निदान २७७


है। रक्ताधिक्य अर्श होनेसे मांसांकुरके लक्षण पित्तज अर्शके समान ही होते हैं। इसमें रक्तसे भरे हुए वटकी वरोहक सदृश, लाल गुञ्जाफल और मूँगेके समान रक्त होते हैं। उन लाल अंकुरोंपर जब गाढ़े मलका दबाव पड़ता है, तब वे अत्यधिक मात्रामें विकृत गाढ़े रक्तका प्रवाह करते हैं। उस समय रोगीको पीड़ा भी अधिक होती है। अधिक मात्रामें रक्तके गिर जानेसे रोगी मेढ़कके समान पीला पड़ जाता है। उस दुर्बलतामें उत्पन्न हुए अनेक कष्टोंसे पीड़ित रहता है। वह वर्ण, बल, उत्साह और ओज सभीसे रहित हो जाता है। उसकी इन्द्रियाँ कलुषित हो जाती हैं। मूँग, कोदो, जम्बीर (नीबू), ज्वार, करील और चनाका आहार करनेसे उसके गुदाभागमें वायु कुपित हो उठती है और बलपूर्वक वह अधोवर्ती विष्ठादिके स्रोतोंको अवरुद्ध कर उनके मल-मूत्रादिको सुखाकर कष्टप्रद बना देती है। उसके कुप्रभावसे रोगीके कोख, पार्श्व, पीठ और हृदयभागमें भयंकर पीड़ा होती है। पेटमें मलके रहनेसे हृदयमें धड़कन होती है, अधिक पीड़ा रहती है, वस्तिभागमें शूल होता है और गण्डस्थलमें शोथ आ जाता है।

शरीरमें जब वायु ऊर्ध्वगामी हो जाता है तो उसके कारण रोगीको वमन, अरुचि, ज्वर, हृदयरोग, संग्रहणी, मूत्रदोष, बहरापन, सिरपीड़ा, श्वास, चक्कर, खाँसी, पीनस, मनोविकार, तृष्णा, श्वास (कास), पित्त, गुल्म तथा उदरादिके रोग होते हैं, वे सभी वातज रोग हैं। इनका स्वभाव अत्यन्त कठोर और कष्टकारी होता है। वातदोषका यह प्रकोप ही दुर्नामा, मृत्यु तथा उदावर्त अर्थात् वायुगोलाके नामसे स्वीकार किया गया है। इस वातदोषसे पीड़ित कोष्ठ-भागोंमें यह रोग पूर्वोक्त कारणोंके बिना भी उत्पन्न हो जाता है। सहज अर्श, जन्म धारणके पीछे त्रिदोषसे उत्पन्न हुए अर्श और भीतरवाली बलिमें उत्पन्न अर्श असाध्य होता है। परंतु यदि अग्निबल और आयु शेष हो तथा सम्यक् चिकित्सा हो तो असाध्य रोग भी कष्टसाध्य हो जाते हैं।

गुदाभागकी दूसरी बलिमें जो अर्शांकुरोंका समूह होता है, वह द्वन्द्वज अर्शांकुरोंका समूह माना जाता है। इसकी तत्काल वर्ष-भीतर ही चिकित्सा अपेक्षित होती है अन्यथा यह भी कष्टसाध्य हो जाता है। गुदाभागकी बाहरी बलिमें त्रिदोषजन्य जो अर्शांकुर होते हैं, उनको सामान्य औषधिके उपचारसे दूर किया जा सकता है, किंतु अधिक समय बीत जानेपर वे भी कष्टसाध्य हो जाते हैं।

मेदादि स्थानोंमें इसी प्रकारके अर्श होते हैं। ऐसा ही नाभिदोषके कारण उत्पन्न हुए अर्शांकुरोंका स्वभाव माना गया है। जो अर्शांकुर गण्डस्थल (गुदाके भीतर)-में होते हैं, उनका रूप पिच्छिल (फिसलाहटसे युक्त) तथा कोमल होता है। व्यानवायु कफको आभ्यन्तरभागसे निकालकर त्वचाके बाह्य प्रदेशपर अर्शके रूपमें परिवर्तित कर देता है। वह कीलके समान स्थिर तथा खर होता है। उसको विद्वानोंने चर्मकील (या मस्सा)-के नामसे स्वीकार किया है। वातज दोषके कारण उत्पन्न चर्मकील (मस्सा) अत्यन्त कठोर सूईकी नोकके समान तीक्ष्ण वेदनावाला और खुरदुरापनयुक्त होता है। पित्तदोषसे उत्पन्न हुआ कीलक कृष्ण, लाल मुखभागवाला माना गया है और जो कफजनित होता है, उसमें स्निग्धता, ग्रथिता तथा त्वचा वर्णता होती है।

बुद्धिमान् व्यक्तिको अर्शरोग होनेपर यथाशीघ्र उसके उपशमनका प्रयत्नपूर्वक प्रयास करना चाहिये। क्योंकि वे शान्त नहीं होनेपर शीघ्रातिशीघ्र शरीरके गुह्य-प्रदेश तथा उदरभागमें बद्धगुदोदर आदि अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न कर देते हैं। (अध्याय १५६)


१-सु०नि०अ० ५६, अ०हृ०नि०अ० ७। २-च०चि०अ० १५, सु०नि०अ० २, अ०हृ०नि०अ० ७।

१३८- विद्रधि एवं गुल्म-निदान

२७८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

अतिसार-ग्रहणी-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं आपको अतिसार तथा संग्रहणी<sup></sup>-रोगके निदानकी बात बताता हूँ।

वात-पित्त-कफ और सन्निपात दोषके कुपित होनेसे ही इन रोगोंकी उत्पत्ति होती है। भय तथा शोकके कारण भी ये प्राणियोंके शरीरमें उत्पन्न हो सकते हैं। अतः वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, भयज तथा शोकजके रूपमें इनके छः भेद हो जाते हैं।

अतिसाररोग अधिक जल पीनेसे होता है। इसके अतिरिक्त सूखे अंकुरित एवं कच्चे अन्न, तेल पदार्थ, वसा (चर्बी) और तिलकुटको अधिक खानेसे भी यह उत्पन्न हो जाता है। मद्यपान, रूक्षाहार, अधिकतम मात्रामें रस और तेलका सेवन तथा उदरजन्य कृमियोंके प्रकोपसे एवं वेगरोधसे शरीरकी वायु प्रकुपित हो उठती है। तदनन्तर वह अपानवायुके रूपमें शरीरके अधोभागमें जाकर उस दोषका विस्तार कर जठराग्नि-शक्तिको ह्रासोन्मुखी बना देता है। उस अग्निकी मन्दताके कारण शरीरमें गया हुआ अन्न-पिण्ड और पहलेसे स्थित पुरीष (मल) भस्म अथवा सूखनेकी अपेक्षा द्रवतादिके दोषमें बदलकर अतिसाररोगके लक्षणको प्रकट करता है। उस रोगसे प्रभावित होनेवाले रोगीके हृदय, गुह्यभाग तथा आमाशयादिमें पीड़ा होती है, शरीरमें अवसाद होता है एवं पुरीषका निरोध और अपच होता है। शरीर पसीनेसे युक्त हो जाता है और कष्टकी उत्पत्ति होती है। वातदोषके कारण शरीर शिथिल पड़ जाता है, पाचनशक्ति सुचारुरूपसे कार्य नहीं करती है तथा शरीरमें विशेष प्रकारका ज्वर रहता है। उस दोषके कारण उदरमें कुछ गुड़गुड़ाहट भी बनी रहती है। गुह्य भागसे बार-बार सूखा हुआ फेनसे युक्त स्वच्छ ग्रथित, जलाइन्ध और पिच्छिल (कचड़ाहीन) मल कष्टके साथ होता है। इस रोगमें मलद्वार शुष्क एवं विकृत होकर बाहर निकल जाता है, मल निकलनेमें कष्ट होता है। उस कष्टके कारण रोगी लम्बी-लम्बी श्वासें छोड़ता हुआ काँखता रहता है।

पित्त<sup></sup>-दोषसे रोगीको पीत-कृष्ण-हल्दी तथा नवांकुर तृण वर्ण रक्तके सहित अत्यन्त दुर्गन्धपूर्ण दस्त होता है। उसको तृष्णा, मूर्च्छा, स्वेद और दाहका प्रकोप भी होता है। कफजनित अतिसाररोगके होनेपर गुह्यभागमें दाहपाक शूल उठता है और संतापजनित कष्ट होता है। इस रोगमें मल द्रव्युक्त न होकर कठोर, भारी एवं घनीभूत रूपमें गुदाभागसे बाहर निकलता है, वह पिच्छिल (कचड़ाहीन) रहता है। उसीके अनुसार वह बहुत ही कम या अधिक मात्रामें उदरके अंदर विद्यमान मलस्रोतमें पाया जाता है। मल-निस्सारणके समय कष्टके कारण रोगीको रोमाञ्च, हर्ष मिचली और क्लेशकी अनुभूति होती है। शरीरके अंदर भारीपन रहता है और इसीके कारण वस्ति-प्रदेश, गुदाभाग और उदरमें भी भारीपन बना रहता है। ऐसे रोगीको दस्त होनेके उपरान्त भी दस्तकी अनुभूति बनी रहती है। जब वह वात-पित्त तथा कफजन्य सभी दोषपूर्ण लक्षणोंसे युक्त हो जाता है अर्थात् रोगीके शरीरमें सन्निपातजन्य अतिसारका प्रकोप जन्म ग्रहण कर लेता है तो रोगी उस समय उक्त समस्त वातादिक त्रिदोषोंके लक्षणसे समन्वित बन जाता है। भयवश चित्तके विक्षुब्ध होनेपर स्थान-विशेषमें पड़े हुए रोगीके उदरभागका मल द्रवीभूत हो


१-च०चि०अ० १९, अ०हृ०नि०अ० ८, सु०उ०तं, अ० ४०। २-सु०उ०अ० ४, अ०हृ०नि०अ० ८।

काण्ड ] अतिसार-ग्रहणी-निदान २७१

उठता है। तदनन्तर उस द्रवपूर्ण मलको यथाशीघ्र वायु गुह्यमार्गसे बाहर निकाल देता है अर्थात् भयवशात् रोगीमें मलोत्सर्गकी इच्छा बलवती हो उठती है और अन्ततोगत्वा उसे पानीके समान मल होता है। वात तथा पित्तदोषसे होनेवाले अतिसाररोगके एक समान ही लक्षण बताये गये हैं, वैसे ही लक्षण शोकज अतिसारमें भी उत्पन्न होते हैं।

संक्षिप्ततः अतिसाररोगके दो प्रकार हैं। उनमें प्रथम साम है और द्वितीय निराम है। साम अतिसाररोगमें मल आँवके सहित होता है, किंतु निराम अतिसारमें आँव दोषरहित मल निकलता है, उनमें एक सरक्त होता है और दूसरा बिना रक्तका होता है। साम अतिसारमें मल बड़ा दुर्गन्धित होता है और जलमें डालनेसे डूब जाता है। रोगीके पेटमें गुड़गुड़ाहट, विष्टम्भ वेदना और मुखप्रसेक होता है। निरामके लक्षण सामसे विपरीत होते हैं, कफजन्य होनेके कारण पक्व होनेपर भी मल जलमें नहीं डूबता है। जो अतिसारमें सावधानी नहीं करता, उसे ग्रहणीरोग हो जाता है।

अग्निमान्द्यताको बढ़ानेवाले अत्यधिक मात्रामें किये गये दोषपूर्ण आहार-विहारके सेवनसे अतिसाररोगका प्रादुर्भाव होता है। जब रोगीके शरीरसे साम या निराम मल अत्यधिक निकलता है तो उसे अतिसार कहते हैं। मलोत्सर्ग अधिक होनेके कारण इसकी अतिसार संज्ञा है। यह स्वाभाविक आशुकारी है। यही अतिसार जीर्ण होनेपर संग्रहणीरोग बन जाता है। ग्रहणीरोगमें भुक्त अन्नके अजीर्ण होनेपर कभी आमसहित और कभी सान्न मल निकलता है। अन्नके जीर्ण होनेपर कभी पक्व मल निकलता है, कभी कुछ नहीं निकलता और कभी बार-बार बँधा या ढीला दस्त होता है। यह रोग चिरकारी होता है, इसलिये इसे संग्रहणी कहते हैं। संग्रहणी चिरकारी तथा अतिसार आशुकारी होता है।

इस रोगमें एकाएक मलकी प्रवृत्तिका बारम्बार संघात होता है अथवा वह एकाएक रुक-रुककर बाहर निकलता है। ऐसा यह संग्रहणीरोग वात-पित्त तथा कफजन्य दोषसे तो तीन प्रकारका है ही, किंतु सन्निपातिक दोषके कारण भी उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह चार प्रकारका हो जाता है। रोगीके शरीरमें शिथिलता, अग्निमान्द्य, खट्टी डकार, मुखसे लालास्राव, धूमनिर्गमवत् प्रतीति, तमक, ज्वर, मूर्च्छा, अरुचि, तृष्णा, थकान, भ्रम, अपच, वमन, कानमें भनभनाहट और अन्त्रकूजन—ये ग्रहणीके पूर्वरूप हैं। वातज ग्रहणीरोगमें तालुशोष, तिमिररोग, दोनों कानोंमें शब्द, पसली, ऊरु, वंक्षण और ग्रीवामें दर्द, बार-बार विसूचिका, सब कुछ भोजनकी इच्छा, क्षुधा, तृषा, कैंचीसे कतरनेकी पीड़ा, अफरा, कुछ भोजन करनेसे स्वस्थता, फेनसहित मल—ये सब लक्षण उपस्थित होते हैं। रोगी वातज, हृद्रोग, गुल्म, अर्श, प्लीहा और पाण्डुरोगकी शंका करने लगता है। देरमें कष्टके साथ पतला या गाढ़ा थोड़ा कच्चा एवं फेनयुक्त बार-बार मल आता है। गुदामें दर्द और श्वास-खाँसी भी उठने लगती है।

पित्तज संग्रहणीरोगमें रोगी पीला पड़ जाता है। उसे पीला, नीला और पतला दस्त होता है। वह दुर्गन्धित खट्टी डकार, हृदय और कण्ठमें दाह, अरुचि और तृषासे पीड़ित रहता है।

पित्तज ग्रहणीके होनेपर रोगीका मल द्रवरूप हो जाता है और कफजन्य ग्रहणीरोग होनेपर रोगीको अन्न कठिनतासे पचता है। उसको


१-च०चि०अ० १५, अ०हृ०नि०अ० ८।
२-च०चि०अ० १५, १९, सु०उ०तं० अ० ४०।

२८०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

छरछराहटभरा वमन होता है। उसे भोजनमें अरुचि होने लगती है। उसके मुखमें दाह होता है। उसको कफयुक्त खाँसी आती है। उसके हृदयसे उबकाई छूटती है और जुकाम हो जाता है। उसका हृदय पीड़ित और उदर भारी-सा प्रतीत होता है। उसपर आलस्य छा जाता है। उसे मीठी-मीठी डकार और शरीरमें शिथिलता आने लगती है। रोगीको समान या कुछ कम-अधिक मात्रामें कफसे युक्त मल होता है, जो भारी तथा अम्लताके दोषसे संश्लिष्ट रहता है। उस रूपमें प्रायः मैथुन अशक्ति एवं रोगीकी शक्तिका अधिक ह्रास होता है। इस रोगमें बलवान् व्यक्ति भी दुर्बल हो जाता है और उसमें रोगके सभी लक्षण दिखायी देने लगते हैं। | शरीरप्रकरणके अङ्ग-विभाग नामक तीसरे अध्यायमें जो विषम, तीक्ष्ण एवं मन्द नामक तीन पित्ताग्नियाँ कही गयी हैं, वे भी ग्रहणी-दोष ही हैं। केवल समाग्नि उत्तम स्वास्थ्यकी हेतु है। इस रोगमें भी प्राणीको प्यास लगती है, अधिक मल निकलनेके कारण भूख सताती है, हर क्षण शिथिल होते हुए शरीरके कारण उसके मनमें विकृत चिन्ताएँ भी बढ़ जाती हैं। समस्त रोगोंका यही—मल ही कारण है। इसी मलके शरीरमें रहनेपर प्राणीमें वातव्याधि (बाई), अश्मरी (पथरी), कुष्ठ (कोढ़), मेह, जलोदर, भगंदर, बवासीर और ग्रहणीरोग होता है—ये आठों रोग महारोग माने गये हैं, इनका निदान अत्यन्त कठिन है और ये कष्टसाध्य हैं। | (अध्याय १५७)


मूत्राघात-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा— हे सुश्रुत ! अब इसके बाद आप मूत्राघातका निदान सुनें।

वस्ति* (पेड़ू अर्थात् नाभि-प्रदेशसे नीचे और मूत्र-प्रवाहिकाके ऊपरका भाग), वस्तिशिर (मूत्र-प्रवाही नली), मेढ़्र (जननेन्द्रिय अर्थात् लिंग), कटी (कूल्हेके भागके गड्ढे), वृषण और पायु (गुदा) नामक शरीरके ये छः अङ्ग विशेष हैं, जो परस्पर एक-दूसरेसे सम्बद्ध और एक ही जगह ग्रथित हैं। इन सभीका आश्रय गुदाभागमें रहनेवाले अस्थि-विशेषके छिद्रसे सम्बद्ध रहता है। पेड़ू (वस्ति) अधोमुखी है। इसमें चारों ओरसे सूक्ष्म शिराओंके मुखभागसे होकर रिसाव होता रहता है, इससे वस्ति मूत्रसे भरी रहती है। इन्हीं शिराओंसे वात-पित्तादि दोष भी वस्तिमें प्रविष्ट हो जाते हैं, जिससे मूत्राशयमें बीस प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं। मर्माश्रित होनेके कारण ये प्रमेहादि रोग अत्यन्त कष्ट-साध्य हैं, अर्थात् इन रोगोंके होनेसे रोगीको मर्माहत करनेवाली पीड़ा होती है। रोगीके पेड़ू, वंक्षण और लिंगभागमें भी कष्ट होता है। उस कष्टसे गुप्ताङ्गोंके द्वारा होता हुआ मूत्र अल्पमात्रामें बार-बार निकलता है। वातजरोगमें प्राणीको मूत्र कष्टके साथ होता है। पित्तज मूत्राघात होनेपर मूत्र पीला, लाल तथा दाहसे युक्त हो जाता है और उसके मूत्राशयमें रुके रहनेपर अत्यन्त पीड़ा होती है। जब यह रोग कफज होता है तो उसके पेड़ू और लिंगमें भारीपन तथा शोथ आ जाता है। मूत्र पिच्छल और रुक-रुककर होता है। रोगीपर सर्वदोषजन्य मूत्राघात होनेसे सभी लक्षण पाये जाते हैं। जब वायु वस्तिके मुखको आच्छादित कर कफ, मूत्र और वीर्यको शुष्क कर देता है, उस


* सु० नि० अ० ३, मा० नि० पृ० ५०५, सु० उ० त० ५८।

काण्ड ] मूत्राघात-निदान २८१


समय रोगीके शरीरमें अश्मरी (पथरी) नामक रोग उत्पन्न हो जाता है। यह रोग बड़ा भयंकर होता है। जैसे गायका पित्त सूखकर गोरोचन बन जाता है, वैसे ही यह अश्मरी होती है। प्रायः सभी प्रकारकी पथरियाँ कफाश्रित ही होती हैं। इस रोगका पूर्वरक्षण इस प्रकार है—

इस रोगके होनेमें वस्तिभागमें अवरोध होता है अथवा उसके सन्निकट अन्य किसी भागमें भी हो सकता है। जिस भागमें होता है उस भागके चारों ओर अवयवोंमें अत्यधिक पीड़ा होती है। वस्तिभागमें मूत्रका अवरोध तथा उसकी कृच्छ्रता बनी रहती है। रोगीके मूत्रमें अजामूत्रके समान गन्ध, ज्वर और अरुचि होती है। इस रोगका सामान्य लक्षण तो यह है कि रोगीके नाभि-लिंगमणि और वस्तिके शिरोभागमें कष्ट रहता है। अश्मरीद्वारा मार्गावरोधके कारण वहाँ उस समय पर्याप्त भागमें मूत्र फैल जाता है। वह रुक-रुककर बाहर निकलता है। मूत्र निकलनेपर रोगीको सुखानुभूति होती है। उस मूत्रका वर्ण गोमेद या गोमूत्रके समान झलकता रहता है।

मूत्र-निर्गमनमें ऐसा प्रकोप हो जानेपर रक्त, मांस तथा धातु-प्रवाहके मार्गमें कष्ट होता है। वातजरोगसे व्यथित रोगी अपने दाँतोंको किटकिटाता हुआ काँपता है। मूत्रसे भरे हुए नाभिसे नीचे स्थित वस्तिभागको पकड़कर दबाता हुआ वह कराह उठता है। अपानवायुके सहित मल-पिण्ड उसके गुह्यभागसे निकलता है और बूँद-बूँद करके मूत्र टपका करता है। वातज दोषके कारण शरीरमें उत्पन्न हुई अश्मरीरोगका वर्ण श्याम है। उसमें रूक्षता रहती है। देखनेमें वह काँटोंसे बिंधी हुई-सी प्रतीत होती है।

पित्तज दोषके कारण उत्पन्न इस अश्मरीरोगमें वस्तिभाग जलने लगता है। उसमें ऐसा प्रतीत होता है, जैसे अंदर-ही-अंदर कुछ पक रहा हो। इस पित्त-दोषजन्य अश्मरीका स्वरूप भल्लातक (भिलावेके बीज)-के समान होता है। इसका वर्ण लाल, पीला अथवा काला होता है।

कफजन्य अश्मरी होनेसे वस्तिभागमें पीड़ा होती है। उस स्थानमें भारीपन तथा शीतलताका अनुभव होता है। इस रोगमें उत्पन्न हुई अश्मरी आकारमें बड़ी, चिकनी, मधु (शहद) अथवा श्वेतवर्णा होती है। ये तीनों अश्मरी प्रायः बालकोंमें हुआ करती हैं। आश्रय, मृदुता और उपचयकी अल्पताके कारण बालकोंकी अश्मरी ग्रहण करके सुखपूर्वक निकाली जा सकती है।

शुक्रके वेगको रोकनेसे प्राणीके शरीरमें शुक्राश्मरी नामक भयंकर रोगकी उत्पत्ति होती है। जब धातु-प्रवाहिका नाड़ीसे गिरा हुआ अथवा कुपित वीर्य दोनों अण्डकोशोंके बीच रुक जाता है और लिंग-मार्गसे वह बाहर नहीं निकलता, तब वहाँ स्थित विकृत वायु विक्षुब्ध होकर उसको सुखा देता है, उसी दोषसे इस शुक्राश्मरीका जन्म होता है। इस रोगमें भी वस्तिभागमें पीड़ा होती है। रोगीको मूत्र³ निर्गत करनेमें कष्ट होता है। इसका भी वर्ण श्वेत माना गया है। इसके कारण मूत्रावरोध होनेसे तत्सम्बन्धी स्थानोंमें सूजन आ जाती है। अण्डकोष और उपस्थेन्द्रियके बीचमें हाथसे दबाया जाय तो वह विलीन हो जाती है। इस रोगके हो जानेपर रोगीको पीड़ा होती है, उसके दुष्प्रभावसे ज्वर हो जाता है, रोगीको खाँसी आने लगती है। इसी अश्मरीरोगके कारण रोगीके शरीरमें शर्करारोगका विकार भी उत्पन्न हो जाता है। यदि इसकी


१-वा०नि० ९, अ०हृ०नि०अ० ९। २-सु०नि०अ० ३, अ०हृ०नि०अ० ९।

१३९- उदररोग-निदान

२८२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

अनुलोम गति होती है तो यह मूत्रके साथ बाहर निकल जाती है अथवा मूत्रके साथ प्रतिलोम-अवस्थामें अंदर ही रुक जाती है। क्रुद्ध हुआ वायु वस्तिभागके मुखको रोककर आमाशयके जलस्रोतसे नीचे आनेवाले उस मलिन जलको एकत्र कर देता है। इस मूत्रके संचित होनेसे वस्तिभागमें विकारकी उत्पत्ति होती है, रोगीको कष्ट होता है और उस भागमें खुजलाहट होने लगती है।

रोगीके शरीरमें विक्षुब्ध वह वायु वस्तिभागके मुखको विधिवत् ढककर मूत्रावरोध उत्पन्न करता है तथा वस्तिको अपने स्थानसे हटाता हुआ उल्टा या इधर-उधर करके वस्तिमें विकृति उत्पन्नकर गर्भ-जैसा स्थूल (मोटा) बना देता है एवं उस स्थानको पीड़ित करता है। वहाँ उसके कारण जलन होती है। उसमें स्पन्दन होने लगता है और कूल्होंमें भी पीड़ा प्रारम्भ हो जाती है। रोगीका मूत्र बिन्दुवत् टपकता है, वह अपने सही वेगसे नहीं निकलता। वस्तिभागमें पीड़ा बनती रहती है। दबानेपर मूत्र धारा-रूपमें निकलता है। वायुजन्य इस रोगको वातवस्तिके नामसे स्वीकार किया गया है।<sup></sup>

वातवस्तिके दो भेद हैं—पहला वस्तिके मुखको रोकनेवाला दुस्तर कहलाता है और दूसरा दुस्तरतर। वस्तिके मुखको ऊपर करनेवाला अत्यन्त कृच्छ्रसाध्य है, क्योंकि इसमें वायुका विशेष प्रकोप होता है। मलमार्ग तथा वस्तिभागके बीच स्थित वायु अष्ठीलाकृति अर्थात् गोलककडी या अँठुलीके समान घनीभूत शक्तिशाली, मज़बूत ग्रन्थि (गाँठ) उत्पन्न करता है, जिसके कारण इसको वाताष्ठीला नामसे अभिहित किया गया है। इस रोगमें वायु रोगीके अपानवायु तथा मल-मूत्रको अवरुद्ध कर देता है। वस्तिभागमें विद्यमान कुपित वायु कुण्डली मारकर तीव्र पीड़ाको जन्म देता है। वहाँ मूत्रको रोककर वह उसमें अत्यधिक स्तम्भनका दोष उत्पन्न करता है। ऐसी अवस्थामें रोगीको बहुत ही अल्प मात्रामें बार-बार मूत्र होता है तथा ऐसी अवस्थामें रोगी मूत्रको अधिक देरतक रोकनेमें असमर्थ रहता है। ऐसे रोगको वातकुण्डैलिका<sup></sup> कहते हैं। जब रोगी रुके हुए मूत्रको निकालनेमें पीड़ाका अनुभव करता है तो वह निरुद्ध मूत्र-कृच्छ्ररोग है अथवा मूत्रको अधिक कालतक रोकनेके पश्चात् यदि उसका वेग नहीं आता है या रुक-रुककर आता है और कुछ कष्ट होता है तो उसको मूत्रातीत कहा जाता है।

मूत्रके वेगको रोकनेसे प्रतिहत हुआ मूत्र अथवा वायुसे पीछेको घुमाया हुआ मूत्र जब नाभिके नीचे उदरमें भर जाता है, तब वह तीव्र वेदना और आध्मान पैदा करता है और मलका संग्रह करता है। इसे मूत्रजठर कहते हैं। मूत्रके दोषसे अथवा कुपित वायुके द्वारा आक्षिप्त हुआ थोड़ा-सा मूत्र वस्ति, नाल, उपस्थकी मणिमें स्थित होकर थोड़ा-थोड़ा दर्द करता हुआ अथवा बिना दर्दके ही निकलता है, इसे मूत्रोत्सर्ग या मूत्रजठर कहते हैं।

अबाधगतिसे<sup></sup> मूत्रोत्सर्ग होना प्राणीके श्रेष्ठ अण्डकोषोंपर निर्भर होता है। एकाएक रुका हुआ मूत्र निकल जानेपर अन्तःकरण और मुख शुष्क हो जाता है। अधिकाधिक या अल्प मात्रामें प्राणीको प्यास लगती है। वस्तिके आभ्यन्तर भागमें मूत्रावरोधके कारण अश्मरीके सदृश एक ग्रन्थि पड़ जाती है, जिसको मूत्रग्रन्थि कहते हैं। मूत्र-रोग<sup></sup>-ग्रसित रोगीका जब स्त्रीके साथ सहवास होता है तो उस समय वायुके द्वारा ही स्त्रीके गर्भाशयमें शुक्र पहुँच जाता है, किंतु स्थान-विशेषसे निकला हुआ वह


<sup></sup> मा०नि० मूत्राघात प्र० ४।
<sup></sup> मा०नि०मूत्राघात प्र० २, ३, श्लोक ७, ८।
<sup></sup> सु०उ० ८५, अ०हृ०नि०अ० ९।
<sup></sup> सु०उ०तं०अ० ५८।

काण्ड ] प्रमेहरोग-निदान २८३


शुक्र मूत्र-क्षरण होनेसे पहले अथवा बादमें लिंगसे बाहर आता है। इसका स्वरूप भस्ममिश्रित जलके समान होता है। उसको वैद्यकमें मूत्रशुक्रके नामसे जाना जाता है।

जब रूक्षता और दुर्बलताके कारण वातजन्य दोषसे उदावर्त उपद्रव होता है अर्थात् शरीरके अंदर विद्यमान अपानवायु व्यानवायुसे घिर जाता है अर्थात् मलावरोध हो उठता है तो उस कालमें वह मल-मूत्र स्रोतकी संसृष्टिसे संयुक्त हो जाता है। इसमें मूत्र बूँद-बूँद ही होता है और इस टपकनेवाले मूत्र-बिन्दुओंमें एक दुर्गन्ध-सी रहती है। ऐसे रोगको मूत्रविघातके नामसे स्वीकार किया जाता है।

पित्त², व्यायाम, तीक्ष्ण और अम्लाहार तथा आध्मान (पेट फूलने) अथवा अन्य विकृतियोंके द्वारा शरीरके आभ्यन्तरिक भागमें बढ़ा हुआ पित्त-वायु-विकार वस्तिभागमें दाह उत्पन्न कर देता है, जिसके कारण रक्तयुक्त मूत्र निकलता है अथवा उष्ण रक्त ही उसकी मूत्र-प्रवाहिकासे बार-बार कष्टपूर्वक गिरता है। इस प्रकारके कष्टको उत्पन्न करनेके कारण लोगोंने उस रोगको उष्णवातकी संज्ञा दी है।

रूक्षाहार तथा परिश्रम करनेसे श्रान्त रोगीका पित्त और वायु कुपित हो उठता है। वह उसके वस्तिभागमें मूत्रावरोध, पीड़ा, क्षय और जलन उत्पन्न कर देता है। उस लक्षणसे युक्त मूत्राघात-कष्टको मूत्रक्षय कहा गया है।

यदि कुपित वायुके द्वारा पित्त और कफ अथवा इन दोनोंको संक्षुब्ध कर दिया जाता है तो उस समय प्राणीको जलन, कष्टसाध्य मूत्र-निर्गमन होता है। उसके मूत्रका वर्ण पीला, रक्त तथा श्वेत हो जाता है और उसमें गाढ़ापन भी आ जाता है। वस्तिभागमें दाहभरी जलन होती है। जो मूत्र निकलता है, उसका वर्ण सूखे गोरोचन तथा शंख-चूर्णके समान होता है। इस रोगको कृच्छ्रमूत्रसाद कहते हैं। इस प्रकार विस्तारपूर्वक मूत्रमें होनेवाले रोगोंको भी मैंने बता दिया है। (अध्याय १५८)

प्रमेहरोग-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं आपको प्रमेह³-रोगोंका निदान सुनाऊँगा, उसे सुनें।

प्रमेह बीस प्रकारके होते हैं। उनमें दस प्रमेह कफजन्य, छः प्रमेह पित्तजन्य और चार प्रमेह वातजन्य हैं। इन सभीमें मेद, मूत्र और कफकी संसृष्टि होती है।

प्रमेहका सबसे पहला प्रकार हारिद्रमेह है। इस प्रमेहके होनेपर रोगीको कटु, रसमिश्रित मूत्र हल्दीके समान मल-मूत्र होता है। इस प्रमेहका दूसरा प्रकार मंजिष्ठामेह है। मंजिष्ठामेहके होनेपर मंजिष्ठ (मजीठ)-वर्णके जलके सदृश होता है। इसका तीसरा प्रकार है रक्तमेह। इस रक्तमेहके होनेपर रक्तवर्णकी आभावाला कच्चे मांसकी गन्धसे समन्वित उष्ण तथा लवण-तत्त्व-मिश्रित मूत्र होता है। वसामेहमें चर्बी-मिला हुआ मूत्र अथवा केवल चर्बी ही बार-बार निकलती है। वसायुक्त मज्जामेही व्यक्ति वर्ण और गन्धमें समानता रखनेवाले मज्जा-तत्त्वसे संश्लिष्ट मूत्रत्याग करता है।

जब प्राणी मतवाले हाथीके समान असंयमित वेगसे अधिक समयतक मूत्र निकालता है, जिसके साथ एक चिपचिपा पदार्थ भी आता है और यह यदा-कदा बीच-बीचमें रुक भी जाता है तो उस रोगीको हस्तिमेही मानना चाहिये। हस्तिमेह प्रायः वृद्धावस्थामें होता है। जब व्यक्तिको मधुके समान


१-सु०उ० ५७। २-सु०अ० ८५। ३-च०चि० ७, वा० नि० १० ।

१४०- पाण्डु-शोथ-निदान

२८४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

मूत्र होता है अर्थात् उस मूत्रमें शरीरके अंदर विद्यमान मधुर रसका तत्त्व आने लगता है तो उसे मधुमेही कहा जाता है। यह दो प्रकारका माना गया है। एक तो धातुके क्षीण होनेपर वायुके कुपित होनेसे तथा दूसरा पित्तादि दोषसे वायुका मार्ग रुक जानेसे।

इस प्रमेह<sup></sup>से घिरा हुआ रोगी प्रायः अन्य सभी दोषजन्य प्रमेहोंके लक्षणोंसे संयुक्त हो जाता है। ऐसे रोगीमें अन्य दोषोंके लक्षणोंका आगमन कोई कारण नहीं रखता। यह रोग तो अपनी प्रबलताके प्रभावसे उन्हें बिना निमित्तके ही रोगीके शरीरपर प्रकट कर देता है। यह ऐसा प्रमेह है कि क्षणमात्रमें नष्ट हो सकता है और क्षणमात्रमें ही अपने पूर्ण बलके साथ उभर सकता है। अतः रोगीको चाहिये कि वह कष्ट उठाकर भी इस वर्गभेदवाले मधुमेहरोगका निदान कर ले। इसकी सामयिक उपेक्षा कर देनेपर प्राणीके शरीरका सब कुछ मधुमेहताको ही प्राप्त कर लेता है अर्थात् शरीरके समस्त स्रोतोंमें इसका विकार पहुँच जाता है और एक दिन मधुमेहके अतिरिक्त कुछ शेष ही नहीं रह जाता तथा उसकी असामयिक मृत्यु हो जाती है। इसका विस्तार हो जानेपर सभी प्रकारके मेहरोगोंमें रोगी प्रायः मधुके समान ही गाढ़ा मूत्र नलीसे निकालता है। शरीरमें जो मधुरता है, वह मधुरता इन सभी प्रमेहोंमें नष्ट होती है, इसलिये इन सभी प्रमेहोंको मधुमेह ही कहा जाता है। इस प्रमेहरोगमें रोगी अपच, अरुचि, वमन, अनिद्रा, खाँसी और पीनसके उपद्रवसे ग्रस्त हो जाता है।

कफजन्य प्रमेहमें वस्ति तथा मूत्राशय-भागमें पीड़ा, हृष्ट-पुष्ट शरीरका क्षरण और ज्वरके उपद्रव जन्म लेते हैं। पित्तप्रमेह होनेपर रोगीके शरीरमें दाह, तृष्णा, खट्टी डकार, मूर्च्छा, अतिसार एवं मलभेदका विकार होता है। वातज प्रमेहमें उदावर्त, कम्पन, हृदयवेदना, बेचैनी, शूल, अनिद्रा, शुष्कता, श्वास तथा खाँसीके विकार पैदा हो जाते हैं।

शराविका, कच्छपिका, ज्वालिनी, विनता, अलजी, मसूरिका, सर्षपिका, पुत्रिणी, सविदारिका और विद्रधि नामक दस प्रकारकी फुंसियाँ प्रमेह-रोगोंकी उपेक्षा कर देनेपर उत्पन्न होती हैं।

प्रायः कफजन्य<sup></sup> दोषसे संश्लिष्ट होनेके कारण खाया हुआ अन्न प्रमेहरोगके रूपमें परिणत हो जाता है। उसका रस मूत्रके मार्गसे निकल जाता है। मधुर, अम्ल, लवण, स्निग्ध, भारी, चिकना और शीतल पेय, नया चावल, मदिरा, मिर्च-मसाला, मांस, इक्षुरस, गुड़, गोरसके सेवन, एक स्थान और एक आसनपर शयन इस मधुमेहरोगके उत्पादक हैं। इस प्रमेहरोगके होनेसे कफ वस्तिभागमें पहुँचकर उसको दूषित कर देता है। तदनन्तर वह स्वेद, मेदा, वसा और मांससे युक्त शरीरको दूषित करके शिथिल बना देता है।

जब कफ पहले क्षीण हो जाता है तो वायु मूत्रके सहित पित्त, रक्त और धातुको वस्तिभागमें लाकर उसका वहींपर विनाश करता है। साध्य-असाध्य प्रतीत होनेवाले जो मेह हैं, वे सभी इसी वायु-विकारसे ही उत्पन्न होते हैं। जब वायु, पित्त और कफकी मात्रा निर्दुष्ट होकर समान रहती है, तब मेह भी समान-भावसे रहता है।

उक्त प्रमेह-भेदोंका सामान्य लक्षण तो प्रचुर मात्रामें विकृत मूत्रका होना है, किंतु शरीरमें उस विकारके संयुक्त होते ही विशेष परिस्थितिमें भी पड़े हुए मनुष्यके लिये अपेक्षित है कि उस दोषका निवारण कर ले। मूत्रके वर्णादिक लक्षणोंके अनुसार इन प्रमेहरोगोंमें भेदकी कल्पना की जाती है। यह मेहरोग दस प्रकारका है। सामान्यतः मूत्र स्वच्छ,


<sup></sup>-च०चि०अ० ६, अ०हृ०नि०अ० १७। <sup></sup>-वा०नि० १०, अ०हृ०नि०अ० १०।