भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] अर्श ( बवासीर )-निदान २७५

मलाधिक्यकी एकत्रित अवस्थामें अतिशय, अत्यल्प तथा असामयिक जलपान, देश-कालादिके विपरीत कठिन और अल्पाहार ग्रहण करनेके कारण भी यह उत्पन्न होता है। वस्ति, नेत्र, गले और ओष्ठादिके भागोंमें घट्ट—रगड़ (घेठा), अधिक शीतल जलके संस्पर्श तथा बैठकर लगाम आदिसे साधे जानेवाले वाहन (अश्वादि)-की सवारी करनेसे भी इस रोगकी उत्पत्ति होती है। यह रोग हठात् मल-मूत्रादिके वेगको धारण करने और निकालनेसे भी हो सकता है। ज्वरगुल्म, अतिसार, ग्रहणीरोग, शोथ तथा पाण्डुरोगके प्रभाव एवं दौर्बल्यकारक आहारादिके सेवनसे अन्य उपद्रव और विषम चेष्टाओंसे भी इसका जन्म होता है। स्त्रियोंमें अपक्व-गर्भपात, गर्भवृद्धि तथा तज्जन्य पीड़ाके कारण इस उपद्रवकी उत्पत्ति होती है।

इन्हीं सब कारणोंसे अपानवायु मलस्थानके भागमें कुपित हो जाता है। तदनन्तर वह गुदाभागका शुद्ध कार्य करनेवाली वलियोंमें अपना कुप्रभाव छोड़ता हुआ अर्शके उन कीलकोंके रूपोंमें जन्म लेता है।

इस रोगका पूर्व लक्षण अग्निमान्द्य, विष्टम्भ, पैरोंमें पीड़ा, पिण्डुलिका कष्ट, भ्रम, शरीरमें शिथिलता, नेत्र, शोथ, मलभेद तथा मलग्रह है। इस रोगमें शरीरके अग्रभागसे निश्चेष्ट वायु नाभिभागसे नीचेकी ओर संचरण करता हुआ पीड़ितकर रक्तसंश्रित होकर बड़ी कठिनाईसे बाहर निकलता है। इस रोगमें आँतभागसे अव्यक्त गुड़गुड़ शब्द होता है। क्षारसहित उद्गार, अतिशय मूत्र, अल्पविष्ठा (मल), घृणा, धूमायित डकार, सिर-पीठ, वक्षःस्थलमें पीड़ा, आलस्य तथा धातुक्षरणका उपद्रव होता है। इसमें इन्द्रिय-सुखकी चञ्चलता एवं दुःख होनेके कारण रोगीमें क्रोधकी मात्रा बढ़ जाती है। इस रोगके प्रभावसे रोगीमें विष्ठा-त्यागकी आशङ्का बनी रहती है। उसके पेटमें संग्रहणी, शोथ, पाण्डु तथा गुल्म नामक रोगोंका भी उपद्रव होता है।

इतना ही नहीं, अर्शरोगके होनेसे प्राणियोंमें ये रोग भली प्रकारसे बढ़ते ही जाते हैं। उन अर्शकीलकोंसे गुदामार्ग अवरुद्ध होनेके कारण अपानवायु भी क्रुद्ध हो उठता है, जिसके फलस्वरूप वह शरीरकी समस्त इन्द्रियोंमें स्थित अन्य समानादिक भेदवाले वायु-प्रभेदोंको क्षुब्ध एवं विचलित कर देता है। वह वायु मूत्र, मल, पित्त तथा कफ, रस-रक्तादिको संक्षुब्ध करता हुआ जठराग्निको मन्द बना देता है। उससे प्रायः सभी प्रकारके अर्शरोग* उत्पन्न हो जाते हैं।

शरीरमें इन सभी अर्श-भेदोंका प्रकोप होनेपर रोगीके शरीरमें अत्यन्त दुर्बलता, उत्साहहीनता, दैन्य तथा कान्तिहीनता आ जाती है। वह रोगी साररहित वृक्षके समान सारहीन और छायारहित हो जाता है। मर्मस्थलको पीड़ित करनेवाले अत्यन्त कष्टसाध्य उक्त रोगोंका उपद्रव हो जानेसे रोगी एक दिन यक्ष्माके रोगसे भी ग्रस्त हो उठता है। उसके शरीरमें कास, पिपासा, मुखविकृति, श्वास, पीनस, खेद, अङ्ग-भंग, वमन, हिचकी, शोथ, ज्वर, नपुंसकता, बधिरता, स्तब्धता तथा शर्करा एवं पथरीरोग हो जाते हैं। वह क्षीणकाय, स्वरभंग, चिन्तातुर, अरुचि, बारम्बार थूकनेवाला और अनिच्छित स्वभावका हो जाता है। उसके सभी पर्व तथा अस्थिभागमें पीड़ा होती है। उसका हृदय, नाभि, पायु और वंक्षणभाग शूलसे ग्रस्त हो उठता है। उसके गुदामार्गसे चावलके धोवनके समान द्रव निकलता है, जो वर्णमें बगुलेके उदरभागके समान होता है। यह मल कभी-कभी सूखा


* च०चि०अ० ८, १४, अ०हृ०नि०अ० ७ ।