भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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२७४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ग्राहादिक हिंसक जलचरोंसे भरे हुए अथाह जलराशियाले समुद्रके समान इस संन्यास मदात्ययरोगके सागरमें डूब रहे प्राणीकी शीघ्र ही रक्षा करनी चाहिये। उसमें मद, मान, रोष, संतोष आदि विभिन्न प्रवृत्तियाँ होती हैं। उन्हीं प्रवृत्तियोंके द्वारा वह यहाँ-वहाँसे उचित और अनुचितका विचार करके यथापेक्षित कार्यमें सामान्य विधिका प्रयोग करता है, किंतु अयुक्तिपूर्वक मद्यपानसे प्रभावित दशामें ऐसा सम्भव नहीं है। उसे कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है। (अध्याय १५५)

अर्श ( बवासीर )-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं अर्श (बवासीर) नामक रोगके निदानका विषय बताऊँगा।

प्राणियोंके मांसमें जो कीलक सदा उत्पन्न होते हैं, वे कीलक गुदाके द्वारका अवरोध करते हैं, इसलिये उन्हें अर्श कहा जाता है। वात-पित्त तथा कफजन्य दोष शरीरमें स्थित त्वक्, मांस और मेदको दूषित करके अपानवायुके मार्गमें अनेक आकृतियोंवाले मांसांकुरोंको जन्म देता है, उन अंकुरोंको अर्श माना गया है। जो अर्श शरीरके साथ ही उत्पन्न होता है, उसे 'सहज' और जो जन्म लेनेके बाद उत्पन्न होता है, उसे 'जन्मान्तरोत्थान' कहते हैं। इस दृष्टिसे अर्शके दो भेद हुए। प्रकारान्तरसे इसके दो भेद और हैं—एक शुष्क (वादी बवासीर) और दूसरा है स्रावी (खूनी बवासीर)। गुदा नामक स्थानका आश्रय लेकर अवस्थित रहनेवाली शुष्क अग्रभागसे युक्त परस्पर भिन्न नाड़ियोंका स्थान है। गुदाभागका परिमाण साढ़े पाँच अंगुलका होता है। उसीमें नीचेकी ओर साढ़े तीन अंगुलके भागमें ये रोग स्थित रहते हैं। उनमें एक नाड़ी बालोंको जन्म देनेवाली शक्तिका सञ्चार करती है और एक नाड़ी आँतके मध्यभागसे होकर नीचेकी ओर आती है। यही आमाशयसे निकलनेवाले मलको लाकर गुदामार्गसे बाहर करती है। उसी विसर्जन कार्यके कारण उसे विसर्जनी नाड़ीके नामसे अभिहित किया गया है। उस विसर्जनी नाड़ीके बाह्यभाग अर्थात् गुदाके मुख-द्वारके बाह्यभागमें एक अंगुलका जो स्थान है, उसीमें इन मांसांकुरोंका जन्म होता है। उसके बाद डेढ़ अंगुलके परिमाणभागमें गुदौष्ठके परे रोमवती त्वचा है, जिसपर रोम नहीं उत्पन्न होते हैं। वहींपर सहोत्थ अर्शका कारण विद्यमान रहता है, जो बाल्यकालमें उपतप्त अर्थात् सहोत्थ दोषको उत्पन्न करनेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है।

प्राणियोंमें इस अर्शरोगका बीज तो माता-पिताके कुपथ्यसे उत्पन्न होता है। देवताओंके प्रकुपित होनेपर तो यही दूसरे रूपसे सान्निपातिक दोषका भी बीज बन जाता है। प्राणियोंमें इस प्रकारके जो कुल (वंश)-क्रमागत रोग होते हैं, वे सभी असाध्य माने गये हैं। सहजोत्थ अर्श तो विशेषरूपसे देखनेमें दुःसाध्य, अन्तर्मुखी, पाण्डुवर्ण सन्निहित और भयंकर उपद्रव मचानेमें समर्थ होते हैं। शरीरके वात-पित्त तथा सन्निपातदोषके अनुसार इनको वातिक, पैत्तिक, श्लेष्मिक, संसर्गज, त्रिदोषज तथा रक्तज रूपमें नियोजित किया जा सकता है। अर्थात् इन सहजोत्थ अर्श दोषके यही छः प्रकार हैं।

इनमेंसे शुष्क अर्श वात और कफसे होते हैं और आर्द्र अर्श रक्त एवं पित्तसे होते हैं। उसके दोषके प्रकोपका कारण तो पहले ही कहा जा चुका है। इसके अतिरिक्त उदरस्थ अग्निमान्द्य तथा


१-प्रवाहिणी, संवरणी और विसर्जनी।
२-च०चि०अ० १४, सु०नि०अ० २, अ०हृ०नि०अ० ७।

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