भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ]अरोचक, वमन आदि रोगोंका निदान२६१

इन तीन रूपोंके अतिरिक्त सन्निपातजन्य और मनःसंतापजन्य भी होता है। इस रोगके पाँच प्रकार हैं। यथा—वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज और मनःसंतापज। वात आदि दोषोंसे होनेवाली अरुचिमें रोगीका मुख क्रमशः वायुमें कसैला, पित्तमें तिक्त, कफमें मीठा या माधुर्ययुक्त, सन्निपातमें विकृतरस तथा शोक-दुःखादिमें दोषानुसार स्वादवाला¹ हो जाता है। इस रोगमें रोगीको किसी द्रव्य-विशेषका आस्वाद नहीं प्राप्त होता है। शोक, क्रोधादिमें मनकी जैसी स्थिति होती है, उसी प्रकार उसकी भोजनादि ग्रहण करनेकी अभिरुचि होती है। जब मन शोकादिके कारण खिन्न रहता है तो भोजनके प्रति अरुचिके कारण उसे अन्नादि ग्रहण करनेकी अनिच्छा हो जाती है। इस रोगमें अग्निदुष्ट ही प्रधान कारण है।

छर्दि² अर्थात् वमनरोग पाँच प्रकारका होता है—वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज तथा अनभिप्रेत (इच्छाके विपरीत)। दुष्ट पदार्थोंके ग्रहण करनेसे पाँचवीं छर्दि होती है। सम्पूर्ण प्रकारके वमनरोगमें उदान वायु प्रकुपित होकर सभी प्रकारके अधिकृत दोषोंको उद्दीप्त करता है, जिसके फलस्वरूप क्रमशः शीघ्रातिशीघ्र रोगीको कष्ट होता है, मुख लवणयुक्त रहता है तथा उससे पानी छूटता है और धीरे-धीरे आहार-व्यवहारके प्रति अरुचि हो जाती है। इस रोगमें रोगीकी नाभि तथा पृष्ठ-प्रदेशमें वेदना होने लगती है। रोगीके पार्श्वभागमें भी पीड़ा होती है, जिसके कारण पेटमें अवस्थित अन्न ऊपरकी ओर पक्वाशयसे निकलने लगता है। अर्थात् रोगीको वमनकी इच्छा होती है। अन्ततोगत्वा रोगीके मुँहसे कषाय और फेनयुक्त थोड़ा-थोड़ा करके वमन होता है।

इस वातजन्य वमनरोगमें अत्यन्त कष्टसाध्य पीड़ाके साथ रोगीको तेज दर्द होनेके कारण चिल्लाना पड़ता है। उसको खाँसी आती है, उसके मुखमें शोथ होता है और उसकी वाणीमें स्वरभंग होने लगता है।

पित्तजन्य वमनरोग होनेपर रोगीको क्षारसे युक्त जलके समान धूम्र, हरित या पीतवर्णवाले पित्तका वमन होता है अथवा रक्तसे युक्त अम्ल, कटु, तिक्त पित्त उसके मुँहसे निकलता है। उसके शरीरमें तृष्णा, मूर्च्छा, संताप तथा अग्निके समान दाहका प्रकोप होता है।

कफजन्य वमनरोगके होनेसे रोगीमें स्निग्ध, घनीभूत पीत तथा मधु (शहद)-के समान मधुर, श्लेष्मा (कफ)-का उदय होता है। यह कफ लवण-रससे भी युक्त हो जाता है। इस कफदोषके कारण उत्पन्न वमनके कष्टसे रोगीको भयवश रोमाञ्च हो जाता है। इस रोगमें रोगीके मुखमें शोथ हो जाता है। उसके मुखमें मिठास भरी रहती है, उसके नेत्रोंमें तन्द्रा छायी रहती है, उसके हृदयमें कष्ट होता है और उसे खाँसी आती है।

सन्निपातिक वमनरोगमें सभी दोषोंके लक्षण दिखायी देते हैं। ऐसी अवस्थामें उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। ऐसे रोगीको देखना, सुनना आदि कुछ अच्छा नहीं लगता है।

वातादिके³ प्रकुपित होनेपर ही उदरभागमें कृमिजन्य और अन्नजन्य वमनरोग भी उत्पन्न होता है। कृमिजन्य छर्दिरोगमें शरीरमें शूल, कम्पन, मिचली तथा हल्लास (हृदयकी धड़कन)-के उपद्रवकी उत्पत्ति विशेष रूपसे ही होती है।

(अध्याय १५३)


१-अ०हृ०नि०अ० ५, च०चि०अ० २६। २-च०चि०अ० २३, सु०उ० तं०अ० ४९। ३-च०चि०अ० २०, अ०हृ०नि०अ० ५।