भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७०संक्षिप्त गरुड़पुराण[ आचार-

हृदय-तृषारोगका निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं आपसे हृदयरोगका निदान कहूँगा।

हृदयको सामान्यतः सभी रोगोंसे रुग्ण बनानेवाले प्रतीक दोष वात, पित्त, कफ तथा सन्निपातके साथ कृमिदोष भी है। जिसके कारण हृदयमें वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज और कृमिज—ये पाँच प्रकारके रोग माने गये हैं।

वातदोषके कारण वातज हृदयरोगीको अपने हृदयमें तीव्र शूलका अनुभव होता है, सूईके चुभने और फटनेकी-सी पीड़ा होती है। दोषके कुप्रभावसे हृदयमें उठी हुई असह्य वेदनासे व्यथित होकर रोगी रोता रहता है। यह वातज दोष हृदयको विदीर्ण कर देता है। उसके दुष्प्रभावसे शरीरपर शुष्कता छायी रहती है। रोगी दुःख-सुखकी अनुभूतिमें स्तब्ध (अवाक्) बना रहता है। स्वयंमें उसे शून्यताकी अनुभूति होती है। मनमें भ्रमकी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अकस्मात् उसमें दीनता, शोक, भय, शब्द-श्रवणमें असहिष्णुता, कम्पन, मोह, श्वासरोध तथा अल्पनिद्राके लक्षण भी उत्पन्न हो जाते हैं।

पित्तदोषसे हृदयरोगीको तृष्णा, थकान, दाह, स्वेद, अम्ल उद्गार, क्लम (थकान), अम्लपित्तात्मक वमन, धूम्रदर्शन और ज्वर होता है। कफजन्य दोष होनेसे हृदयमें स्तब्धता तथा हृदयके अंदर पत्थरके समान भारीपन हो जाता है। इन दोषोंके अतिरिक्त ऐसे रोगीको खाँसी, अस्थि, पीड़ा, थूक, निद्रा, आलस्य, अरुचि और ज्वरका भी उपद्रव होता है।

हृदयरोगमें जब उपर्युक्त तीनों दोषोंके लक्षण शरीरमें प्रकट हो उठते हैं तो वह सन्निपातज हृदयरोग हो जाता है। कृमिजन्य हृदयरोगमें रोगीके नेत्रोंका वर्ण काला हो जाता है। उसके नेत्रोंके सामने अन्धकार छाया रहता है। उसको हल्लास, शोथ, खुजलाहट तथा मुँहसे कफ आता है। इस रोगमें रोगीका हृदय ऐसी असह्य पीड़ासे व्यथित होता है, जैसे वह आरेसे चीरा जा रहा हो। यह रोग बड़ा भयंकर और शीघ्र प्राणघातक होता है। इसलिये इस रोगकी शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिये।

वात, पित्त, कफ, सन्निपात, रसक्षय तथा बलकी अल्पता और उपसर्ग—इस प्रकार तृषा (तृष्णा या तृषारोग) छः प्रकारका होता है (उनके नाम हैं—वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, बल (रस)-क्षयज तथा उपसर्गज)। इस प्रकारके सब तृषारोगोंका मुख्य कारण तो वात-पित्तसंश्रित दोषमें विद्यमान रहता है। इन दोषोंके द्वारा रोगीके शरीरकी धातु (शक्ति)-का शोषण होनेसे चक्कर, कम्पन, ताप, हृद्दाह, मोह तथा मूर्च्छाका उपद्रव होता है। इस रोगमें जिह्वाके मूलभाग, कण्ठ और तालुमें सञ्चार करनेवाली जलवाही शिराओंको शुष्क बनाकर तृष्णा (प्यास) उत्पन्न होती है।

इस तृषारोगमें मुखशोष, जलसे अतृप्ति, अन्नके प्रति घृणा, स्वरभंग तथा कण्ठ-ओष्ठ, तालुकी कर्कशताके कारण जिह्वा निकालनेमें रोगीको कष्ट होता है। वह असह्य वेदनाके कारण प्रलाप करता है, उसका चित्त स्थिर नहीं रहता तथा मनमें अनेक प्रकारके उद्गार उठते हैं। वायु-प्रकोपके कारण उत्पन्न तृषासे शरीरमें कृशता और दीनता आ जाती है, सिरमें शंखोद्भेद, असह्य पीड़ा और भ्रम उत्पन्न होता है। पित्तदोषके कारण तृषारोगी गन्ध-ज्ञानकी क्षमतासे रहित, श्रवण-शक्तिसे निर्बल, निद्राहीन तथा अन्य शारीरिक क्षमताओंके ह्रासोन्मुख होनेसे बलहीन हो जाता है। उसको शीतलताका अनुभव


१-च०चि०अ० २६, सु०उ० ४३, च०चि०अ० ४३। २-च०चि०अ०२६, सु०उ०अ० ४३।