भारतकोश
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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२५९- सत्कर्मकी महिमा तथा कर्मविपाकका फल

५७८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

दुर्मृत्यु होनेपर सद्गतिलाभके लिये नारायणबलिका विधान

तार्क्ष्यने कहा— भगवन्! किन्हीं ब्राह्मणोंकी अपमृत्यु होती है, उनका पारलौकिक मार्ग कैसा है? उन्हें वहाँ कैसा स्थान प्राप्त होता है? उनकी कौन-सी गति होती है? उनके लिये क्या उचित है और क्या विधान है? हे मधुसूदन! मैं उन सभी बातोंको सुनना चाहता हूँ। कृपया आप उनका वर्णन करें।

श्रीकृष्णने कहा— हे गरुड! जो ब्राह्मण विकृत मृत्युके कारण प्रेत हो गये हैं, उनके मार्ग, पारलौकिक गति, स्थान और प्रेतकर्म-विधानको मैं कह रहा हूँ। यह परम गोपनीय है, इसे तुम सुनो। जो ब्राह्मण खाई, नदी, नाला लाँघते हुए और सर्प आदिके काटनेसे मर जाते हैं, जिनकी मृत्यु गला दबाने तथा जलमें डुबानेसे होती है, जो दुर्बल ब्राह्मण हाथीकी सूँड़के प्रहारसे, विषपानसे, क्षीण होकर, अग्निदाह, साँड़-प्रहार तथा विषूचिका (हैजा) रोगसे मरते हैं, जिनके द्वारा आत्महत्या कर ली जाती है, जो गिरकर, फाँसी लगाकर और जलमें डूबकर मर जाते हैं, उनकी स्थितिको तुम सुनो।

जो ब्राह्मण म्लेच्छादि जातियोंद्वारा मारे जाते हैं, वे घोर नरक प्राप्त करते हैं। जो कुत्ता, सियारादिके स्पर्श, दाह-संस्काररहित, कीटाणुओंसे परिव्याप्त, वर्णाश्रम-धर्मसे दूर और महारोगोंसे पीड़ित होकर मरते हैं, दोषसिद्ध, व्यङ्ग्यपूर्ण बात, पापियोंके द्वारा प्रदत्त अन्नका सेवन करते हैं, चाण्डाल, जल, सर्प, ब्राह्मण, विद्युत्-निपात, अग्नि, दन्तधारी पशु तथा वृक्षादि पतनके कारण जिनकी अपमृत्यु होती है, जो रजस्वला, प्रसवा, शूद्रा और धोबिनके सहवाससे दोषयुक्त हो गये हैं, वे सभी उस पापसे नरक-भोग करके प्रेतयोनि प्राप्त करते हैं। परिजनोंको उनका दाह-संस्कार, अशौच-निवृत्ति एवं जलक्रियाका कर्म नहीं करना चाहिये। हे तार्क्ष्य! ऐसे पापियोंका नारायणबलिके बिना मृत्युका आद्य कर्म, और्ध्वदैहिक कर्म भी नहीं करना चाहिये।

हे पक्षिराज! सभी प्राणियोंका कल्याण करनेके लिये पाप और भयको दूर करनेवाली उस नारायणबलिके विधानको सुनो। छः मासकी अवधिमें ब्राह्मण, तीन मासमें क्षत्रिय, डेढ़ मासमें वैश्य तथा शूद्रकी तत्काल दाह (पुत्तलिका-दाह)-क्रिया करनी चाहिये। गङ्गा, यमुना, नैमिष, पुष्कर, जलपूर्ण तालाब, स्वच्छ जलयुक्त गम्भीर जलाशय, बावली, कूप, गोशाला, घर या मन्दिरमें भगवान् विष्णुके सामने ब्राह्मण इस नारायणबलिको सम्पन्न करायें। पौराणिक और वैदिक मन्त्रोंसे प्रेतका तर्पण किया जाय। इसके बाद यजमान सभी औषधियोंसे युक्त जल तथा अक्षत लेकर विष्णुका भी तर्पण पुरुषसूक्त अथवा अन्य वैष्णवमन्त्रोंसे करके दक्षिणाभिमुख होकर प्रेतका विष्णुरूपमें इस मन्त्रसे ध्यान करे—

अनादिनिधनो देवः शङ्खचक्रगदाधरः ॥
अव्ययः पुण्डरीकाक्षः प्रेतमोक्षप्रदो भवेत् ।
(४०। १७-१८)

अनादि, अनन्त, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले अव्ययदेव पुण्डरीकाक्ष भगवान् प्रेतको मोक्ष प्रदान करें।

तर्पण समाप्त हो जानेके पश्चात् रागमुक्त, ईर्ष्या-द्वेष-रहित, जितेन्द्रिय, पवित्र, धर्मपरायण, दानधर्ममें संलग्न, शान्तचित्त, एकाग्रचित्त होकर भगवान् विष्णुको प्रणाम करके तथा वाणीपर संयम रखते हुए अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ यजमान शुद्ध हो। उसके बाद भक्तिपूर्वक वहाँ एकादश श्राद्ध करे। समाहित होकर जल, धान, यव, साठी धान, गेहूँ, कंगनी (टाँगुन), शुभ हविष्यान्न, मुद्रा, छत्र, पगड़ी,

प्रेतकल्प ] दुर्मृत्यु होनेपर सद्गतिलाभके लिये नारायणबलिका विधान ५७९

वस्त्र, सभी प्रकारके धान्य, दूध तथा मधुका दान ब्राह्मणको दे। वस्त्र और पादुकासे युक्त आठ प्रकारके पददान बिना पंक्तिभेद किये (समानरूपसे) सभी ब्राह्मणोंको इस अवसरपर देना चाहिये।

पृथ्वीपर पिण्डदान हो जानेके पश्चात् शङ्खपात्र तथा ताम्रपात्रमें पृथक्-पृथक् गन्ध-अक्षत-पुष्पयुक्त तर्पण करे। ध्यान-धारणासे एकाग्र मन हो, घुटनोंके बल पृथ्वीपर टिक करके, वेद-शास्त्रोंके अनुसार सभी ब्राह्मणोंको दान देना चाहिये। एकोद्दिष्ट श्राद्धमें ऋचाओंसे पृथक्-पृथक् अर्घ्य देना चाहिये। उस समय 'आपोदेवीर्मधुमती०' इत्यादि मन्त्रसे पहले पिण्डपर अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। उसके बाद 'उपयाम गृहीतोऽसि०' इस मन्त्रसे दूसरे, 'येनापावक चक्षुषा०' मन्त्रसे तीसरे, 'ये देवासः०' मन्त्रसे चौथे, 'समुद्रं गच्छ०' मन्त्रसे पाँचवें, 'अग्निर्ज्योति०' मन्त्रसे छठे, 'हिरण्यगर्भ०' मन्त्रसे सातवें, 'यमाय०' मन्त्रसे आठवें, 'यज्जाग्र०' मन्त्रसे नवें, 'या फलिनी०' मन्त्रसे दसवें तथा 'भद्रं कर्णेभिः०' मन्त्रसे ग्यारहवें पिण्डपर अर्घ्य प्रदान करके उनका विसर्जन करे।

एकादशदैवत्य श्राद्ध करके दूसरे दिन श्राद्ध आरम्भ करे। उस दिन चारों वेदके ज्ञाता, विद्याशील और सद्गुण-सम्पन्न, वर्णाश्रम-धर्मपालक, शीलवान्, श्रेष्ठ, अविकल अङ्गोंवाले प्रशस्त और कभी त्याज्य न होनेयोग्य उत्तम पाँच ब्राह्मणोंका आवाहन करे। तदनन्तर सुवर्णसे विष्णु, ताम्रसे रुद्र, चाँदीसे ब्रह्मा, लोहेसे यम, सीसा अथवा कुशसे प्रेतकी प्रतिमा बनवा करके 'शन्नोदेवी०' इस मन्त्रसे विष्णुदेवको पश्चिम दिशामें, 'अग्न आयाहि०' मन्त्रसे रुद्रको उत्तर दिशामें, 'अग्निमीळे' मन्त्रसे ब्रह्माको पूर्व दिशामें, 'इषेत्वोर्जेत्वा०' मन्त्रसे यमको दक्षिण दिशामें तथा मध्यमें मण्डल बनाकर कुशमय नर स्थापित करना चाहिये।

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यम और प्रेत-इन पाँचोंके लिये पञ्चरत्नयुक्त कुम्भ अलग-अलग रखे। इन सभी देवताओंके लिये पृथक्-पृथक् रूपसे वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा मुद्रा प्रदान करे एवं पृथक्-पृथक् तत्तन्मन्त्रोंसे उनका जप करे। उसके बाद यथाविधि देवोंके निमित्त पाँच श्राद्ध करने चाहिये। तत्पश्चात् शङ्ख अथवा ताम्रपात्र या इनके अभावमें मिट्टीके पात्रमें सर्वौषधिसमन्वित तिलोदक लेकर पृथक्-पृथक् पीठपर प्रदान करे। हे खगेश्वर! आसन, पादुका, छत्र, अँगूठी, कमण्डलु, पात्र, भोजन-पदार्थ और वस्त्र-ये आठ पद माने गये हैं, इनके साथ ही स्वर्ण तथा दक्षिणासे युक्त एक तिलपूर्ण ताम्रपात्र विधिपूर्वक मुख्य ब्राह्मणको दान देना चाहिये। ऋग्वेद-पारंगत ब्राह्मणको हरी-भरी फसलसे युक्त भूमि, यजुर्वेद-निष्णात ब्राह्मणको दूध देनेवाली गाय, शिवके उद्देश्यसे सामवेदका गान करनेवाले ब्राह्मणको स्वर्ण, यमके उद्देश्यसे तिल, लौह और दक्षिणा देनी चाहिये।

सर्वौषधिसे समन्वित कुशद्वारा निर्मित पुरुषाकृति पुत्तलकका निर्माण करके कृष्णाजिनको बिछाकर उसे स्थापित करे और पलाशका विभाग करके तीन सौ साठ वृन्तोंसे पुत्तलककी हड्डियोंका निर्माण करे। यथा-शिरोभागमें चालीस वृन्त, ग्रीवामें दस, वक्षःस्थलमें बीस, उदरमें बीस, दोनों भुजाओंमें सौ, कटिप्रदेशमें बीस, दोनों ऊरुओंमें सौ, दोनों जंघाओंमें तीस, शिश्न-स्थानमें चार, दोनों अण्डकोशोंमें छः और पैरकी अंगुलियोंमें दस वृन्तोंसे उस कल्पित प्रेत-पुरुषकी अस्थियोंका निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात् उसके शिरोभागपर नारियल, तालुप्रदेशमें लौकी, मुखमें पञ्चरत्न, जिह्वाभागमें केला, आँतोंके स्थानपर कमलनाल, प्राणभागमें बालू, वसाके स्थानपर मेदक नामक अर्क, मूत्रके स्थानपर गोमूत्र, धातुओंके स्थानमें गन्धक, हरिताल

२६०- यममार्गमें स्थित वैतरणी नदीका वर्णन, पाप-कर्मोंसे घोर वैतरणीमें निवास, वैतरणीसे पार होनेके लिये वैतरणी-धेनुदान, भगवान् विष्णु, गङ्गा तथा ब्राह्मणकी महिमा

५८०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

एवं मनःशिला तथा वीर्यस्थानमें पारद, पुरीष (मल)-के स्थानमें पीतल, सम्पूर्ण शरीरमें मनःशिल, संधिभागोंमें तिलकी पीठी, मांसभागमें यवका आटा, मधु और मोम, केशराशिके स्थानमें बरगदकी बरोह, त्वचाभागमें मृगचर्म, दोनों कर्णप्रदेशमें तालपत्र, दोनों स्तनोंके स्थानमें गुंजाफल, नासिकाभागमें कमलपत्र, नाभिप्रदेशमें कमलपुष्प, दोनों अण्डकोशके स्थानमें बैंगन, लिंगभागमें सुन्दर गाजर एवं नाभिमें घी भरे। कौपीनके स्थानपर त्रपु, दोनों स्तनोंमें मुक्ताफल, सिरमें कुंकुमका लेप, कर्पूर, अगुरु, धूप तथा सुगन्धित पुष्प-मालाओंका अलंकरण, परिधानके स्थानपर पट्टसूत्र और हृदयभागमें रजत-पत्र रखे। उसकी दोनों भुजाओंमें ऋद्धि तथा वृद्धि इन दोनों सिद्धियोंको संकल्पित करके यजमान दोनों नेत्रोंमें एक-एक कौड़ी भरे। तदनन्तर नेत्रोंके कोणभागमें सिन्दूर भरकर उसको ताम्बूलादि विभिन्न उपहारोंसे सुशोभित करे।

इस प्रकार नाना वस्तुओंसे निर्मित और अलंकृत उस प्रेतको सर्वौषधि प्रदान करके जैसा कहा गया है, उसीके अनुसार उसकी पूजा करनी चाहिये। जो प्रेत अग्निहोत्र करनेवाला हो, उसको यथाविधि यज्ञपात्र भी देना आवश्यक है। उसके बाद ‘शिरोमे श्री०' तथा ‘पुनन्तु वरुण०'—इन मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा शालग्राम शिलाको धोकर यजमान उसीसे प्रेतका पवित्रीकरण करे। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये एक दूध देनेवाली सुशील गौका दान किया जाय। तिल, लौह, स्वर्ण, रूई, नमक, सप्तधान्य, पृथ्वी और गौ एक-से-एक बढ़कर पुण्यदायक होते हैं। अतः गोदान करनेके बाद यजमान तिलपात्र-दान और पद-दान एवं महादान दे। उसके बाद सभी अलंकारोंसे विभूषित वैतरणी धेनुका दान करे।

प्रेतकी मुक्तिके लिये इस अवसरपर आत्मवान्‌को भगवान् विष्णुके निमित्त श्राद्ध करना चाहिये। तत्पश्चात् हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करके प्रेतमोक्षका कार्य करे। अतएव ‘ॐ विष्णुरिति०'—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित उस प्रकल्पित प्रेत-पुतलेकी मृत्यु मानकर उसका दाह-संस्कार करे। तदनन्तर तीन दिन सूतक माने। दशाह कर्म करनेवाला यजमान इस बीच प्रेतमुक्तिके लिये पिण्डदान और सभी वार्षिक क्रियाओंको सम्पन्न करता है तो प्रेत अपनी मुक्तिका अधिकार प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय ४०)


वृषोत्सर्गकी संक्षिप्त विधि

**श्रीविष्णुने कहा—**हे खगेश्वर ! कार्तिक आदि महीनोंकी पूर्णमासी तिथिको पड़नेवाले शुभ दिनपर विधिपूर्वक वृषोत्सर्ग करना चाहिये। नान्दीमुख श्राद्ध करके वत्सतरीके साथ वृषका विवाह और वृषके खुरके पास श्राद्ध करनेके पश्चात् उन दोनोंका उत्सर्ग करे।

वापी और कूपके निर्माणोत्सर्गके समय गोशालामें विधिवत् संस्कारके अनन्तर अग्निकी स्थापना करनी चाहिये।* विवाह-विधिके समान ब्रह्मा-वरण करना चाहिये। यज्ञीय पात्रोंकी क्रमिक स्थापना, पायस-खीरका पाक, उपयमन कुशादिका क्रमशः स्थापन करे। यज्ञीय पात्रोंका सिंचन करनेके बाद होम करना चाहिये। प्रथम दो आहुति आघार और उसके बाद दो आज्य-भाग संज्ञक आहुतियाँ हैं। अतः ‘प्रथमेऽहरिति०' मन्त्रसे यजमानको छः आहुतियाँ देनी चाहिये।

आघार और आज्य-भाग संज्ञक चार आहुतियोंके अनन्तर अङ्गदेवता, अग्नि, रुद्र, शर्व, पशुपति, उग्र, शिव, भव, महादेव, ईशान और यमको आहुति दे। तत्पश्चात् ‘पूषागा०' इस मन्त्रसे एक पिष्टक होम, चरु तथा पायस दोनोंसे स्विष्टकृत् होम करे। तदनन्तर प्रथम व्याहृति होम, प्रायश्चित्त होम,


* काम्य और नैमित्तिक दो प्रकारका वृषोत्सर्ग होता है। काम्यमें गणेशपूजन, नान्दीश्राद्ध आदि करके ही वृषोत्सर्ग किया जाता है। मरणाशौचके ग्यारहवें दिन किया जानेवाला वृषोत्सर्ग नैमित्तिक वृषोत्सर्ग है। इसमें नान्दीश्राद्ध नहीं किया जाता।

प्रेतकल्प ]भूमि तथा गोचर्म भूमि आदि दानोंका माहात्म्य५८१

प्रजापति होम, संस्रव (अवशिष्ट जल) प्राशन करे। इसके बाद प्रणीताका परिमोक्षण करे। पवित्र-प्रतिपत्ति (परित्याग) करके ब्राह्मणको दक्षिणा दे। षडङ्ग रुद्रसूक्तका पाठ करनेसे प्रेतको मोक्षकी प्राप्ति होती है।

एक रंगके वृष और एक वत्सतरीको स्नान कराकर सभी अलंकारोंसे विभूषित करके उन दोनोंको प्रतिष्ठापित करनेसे प्रेतको मोक्ष प्राप्त होता है। इस कर्मके बाद वृषभकी पूँछसे गिरे हुए जलके द्वारा मन्त्रपूर्वक तर्पण-कार्य करना चाहिये। उसके बाद ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त करके दक्षिणासे संतुष्ट करे।

तदनन्तर यथाविधि एकोद्दिष्ट श्राद्ध करनेका विधान है। उसे करके प्रेतके उद्धार-हेतु ब्राह्मणको जल और अन्नका दान दिया जाता है। उसके बाद द्वादशाह श्राद्ध और मासिक श्राद्ध पृथक्-पृथक् करने चाहिये।

इस विधिका सम्यक् पालन करनेवाला प्रेतको उस योनिसे मुक्त कर देता है। (अध्याय ४१)


भूमि तथा गोचर्म भूमि आदि दानोंका माहात्म्य और ब्रह्मस्वहरणका दोष

श्रीविष्णुने कहा— हे गरुड! जिस प्रकार एक वत्स हजार गायोंके बीच स्थित अपनी माताको प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार पूर्वजन्ममें किया गया कर्म अपने कर्ताका अनुगमन करता है—

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्।
तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥
(४२।१)

भूमिदान करनेवाले प्राणीका अभिनन्दन सूर्य-चन्द्र, वरुण, अग्नि, ब्रह्मा, विष्णु और भगवान् त्रिशूलधारी शिव करते हैं। इस संसारमें भूमिके समान दान नहीं है। भूमिके समान दूसरी निधि नहीं है। सत्यके समान धर्म नहीं है और असत्यके समान पातक नहीं है—

नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति भूमिसमो निधिः।
नास्ति सत्यसमो धर्मो नानृतात्पातकं परम् ॥
(४२।३)

अग्निका प्रथम पुत्र सुवर्ण है, पृथ्वी वैष्णवी कहलाती है तथा गाय सूर्यकी पुत्री है। अतः जो व्यक्ति स्वर्ण, गौ एवं पृथ्वीका दान देता है, उसने मानो त्रैलोक्यका दान कर दिया। गौ, पृथ्वी और विद्या इन तीनोंको अतिदान<sup></sup> कहा गया है। जप-पूजन तथा होम करके दिये गये ये तीनों दान नरकसे उद्धार करते हैं। बहुत-से पाप तथा क्रूर कर्म करके भी मनुष्य गोचर्म<sup></sup>भूमिका दान करनेसे शुद्ध हो जाता है। इस दानमें दी हुई वस्तुको लोभवश हरण करनेवालेको हरण करनेसे रोकना चाहिये। जो उसका परिरक्षण नहीं करता है, वह घोर नरकमें जाता है।

प्राण भले ही कण्ठमें आ जायें तो भी निषिद्ध कर्म नहीं करना चाहिये, कर्तव्य कर्म ही करना चाहिये ऐसा धर्माचार्योंने कहा है। किसीकी आजीविकाको नष्ट करनेपर हजार गौओंके वधके समान पाप लगता है तथा किसी जीविकारहितको आजीविका प्रदान करनेपर लक्ष धेनुके दानका फल प्राप्त होता है। गो-हत्यारे आदिसे एक गायको छुड़ा लेना श्रेष्ठ है, उसकी तुलनामें सौ गो-दान करना श्रेष्ठ नहीं है। सौ गो-दान करना गो-हत्यारेसे एक गायको बचा लेनेकी समता नहीं कर सकता।<sup></sup> जो व्यक्ति स्वयं दान देकर स्वयं ही उसमें बाधक बन जाता है, वह प्रलयकालतक नरकका भोग करता है।

जीविकारहित निर्धन ब्राह्मणकी रक्षा करनेपर जैसा पुण्य मनुष्यको प्राप्त होता है, वैसा पुण्य विधिवत् दक्षिणासहित अश्वमेध-यज्ञ करनेपर भी सम्भव नहीं है। दुर्बल, त्रस्त ब्राह्मणकी रक्षा करनेमें जो पुण्य है,


१-त्रीण्याहुरतिदानानि गावः पृथ्वी सरस्वती। नरकादुद्धरन्त्येते जपपूजनहोमतः॥ (४२।५)
२-गवां शतं सैकवृषं यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितम्। तत्क्षेत्रं दशगुणितं गोचर्मपरिकीर्तितम्॥ (पराशरस्मृति १२।४३)
अर्थात् जितने स्थानपर एक हजार गौएँ और दस बैल स्वतन्त्ररूपसे घूम-फिर सकते हैं, उतना भूमिभाग गोचर्म कहलाता है।
३-वरमेकाप्यपहता न तु दत्तं गवां शतम्। एकां हृत्वा शतं दत्त्वा न तेन समता भवेत्॥ (४२।१०)

५८२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

वह वेदाध्ययन और प्रचुर दक्षिणासे युक्त यज्ञ करनेपर नहीं है। बलात् अपहरण किये गये ब्राह्मणोंके धनसे पाले-पोसे तथा समृद्ध बनाये गये वाहन और सैन्य शक्तियाँ युद्धकालमें वैसे ही नष्ट हो जाती हैं जैसे बालूके द्वारा बनाये गये पुल विनष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति स्वयं अथवा दूसरेके द्वारा दी हुई भूमिका अपहरण करता है, वह साठ हजार वर्षतक विष्ठामें कृमि होकर जन्म लेता है। प्रेमसे जो ब्राह्मणका धन खाता है, वह अपने कुलकी सात पीढ़ीको भस्म कर देता है। उसी ब्रह्मस्वका उपयोग यदि चोरी करके किया जाय तो जबतक चन्द्रमा और तारागणोंकी स्थिति रहती है, तबतक उसकी कुल-परम्परा भस्म हो जाती है। पुरुष कदाचित् लोहे और पत्थरके चूर्णको खाकर पचा सके, किंतु तीनों लोकमें कौन ऐसा व्यक्ति है जो ब्राह्मणके धनको पचानेमें समर्थ हो सकेगा ?

देव-द्रव्यका विनाश करनेसे, ब्राह्मणके धनका हरण करनेसे और उसकी मर्यादाका उल्लंघन करनेसे प्राणियोंके कुल निर्मूल हो जाते हैं। यदि ब्राह्मण विद्यासे विवर्जित है तो आचार्यत्वादिके लिये वरण करनेके सन्दर्भमें उसका परित्याग करना ब्राह्मणातिक्रमण नहीं है। जलती हुई आगको छोड़कर राखमें हवन नहीं किया जाता है।

संक्रान्तिकालमें जो दान और हव्य-कव्य दिये जाते हैं, वह सब सात कल्पोंतक बार-बार सूर्य दानदाताको प्रदान करता है। प्रतिग्रह, अध्यापन और यज्ञ करवानेके कार्योंमें विद्वान् प्रतिग्रहको ही अपना अभीष्टतम कहते हैं। प्रतिग्रहसे जप-होम और कर्म शुद्ध होते हैं, याजन-कर्मको वेद पवित्र नहीं करते। निरन्तर जप एवं होम करनेवाला तथा इसके द्वारा बनाये गये भोजनको न करनेवाला ब्राह्मण रत्नोंसे परिव्याप्त पृथ्वीका प्रतिग्रह करके भी प्रतिग्रहके दोषसे निर्लिप्त रहता है।* (अध्याय ४२)


शुद्धि-विधान

श्रीविष्णुने कहा— जो जल, अग्नि तथा अन्य किसी बन्धनके भयसे धर्मपथसे विचलित हो गये हैं और जो संन्यास-धर्मका परित्याग करके पतित हो चुके हैं, वे गौ और वृषभका दान देकर दो चान्द्रायणव्रतसे शुद्धि प्राप्त करते हैं। बारह वर्षसे कम और चार वर्षसे अधिक आयुके बालकके पापका प्रायश्चित्त माता-पिता अथवा अन्य बान्धवको करना चाहिये। चार वर्षसे कम आयुवाले बालकका न कोई अपराध है और न कोई पाप। उसके लिये न तो राजदण्ड है और न कोई प्रायश्चित्तका विधान ही है।

यदि रजोदर्शन होनेपर स्त्री रोगग्रस्त हो जाय तो वह चौथे दिन वस्त्रादिका परित्याग करके स्नानसे शुद्ध हो सकती है। आतुरकालमें जननाशौचप्रयुक्त स्नान होनेपर कोई जो रुग्ण न हो ऐसा व्यक्ति दस बार स्नान करके प्रत्येक स्नानके बाद यदि उस आतुर व्यक्तिका स्पर्श करता जाय तो वह आतुर शुद्ध हो जाता है। (अध्याय ४३)


दुर्मृत्यु तथा अकालमृत्युपर किये जानेवाले श्राद्धादि कर्म और सर्पदंशसे मृत्युपर विहित क्रिया-विधान

श्रीविष्णुने कहा— हे तार्क्ष्य! जिनकी मृत्यु स्वेच्छासे आत्महत्याके द्वारा होती है, जो सींग और दाँतवाले पशु, सरकनेवाले जीव, चाण्डालादि निम्न जातीय पुरुष, आत्मघात—विषादि अहितकर पेय पदार्थ, आघात-प्रतिघात, जल-अग्निपात और वायु तथा निराहारादिके द्वारा जिनकी मृत्यु होती है,


* सदा जापी सदा होमी परपाकविवर्जितः। रत्नपूर्णामपि महीं प्रतिगृह्णन्न लिप्यते ॥ (४२। २२)

२६१- दुःखी गर्भस्थ जीवका विविध प्रकारका चिन्तन करना, यमयातनाग्रस्त जीवका सदा सुकृत करनेका उपदेश देना

प्रेतकल्प ] दुर्मृत्यु तथा अकालमृत्युपर किये जानेवाले श्राद्धादि कर्म ५८३

उन्हें पापकर्म करनेवाला कहा गया है।* जो पाखण्डी, वर्णाश्रमधर्मसे रहित, महापातकी तथा व्यभिचारिणी स्त्रियाँ और आरूढपतित (संन्यासाश्रममें जाकर पतित होनेवाले) हैं, उनका दाहसंस्कार, नव श्राद्ध एवं सपिण्डन नहीं करना चाहिये। श्राद्ध सोलह बताये गये हैं, उनको भी ऐसे पापियोंके लिये न करे। यदि अग्निहोत्र करनेवाला ब्राह्मण ऐसा पापकर्म करता है तो घरवाले मरनेपर उसकी जो जीविकावृत्ति है, उसको जलमें फेंक दें और उसके घरकी अग्निको चौराहेपर ले जाकर डाल दें तथा उसके पात्रोंको अग्निमें जला दें।

हे काश्यप! पूर्वोक्त पापियोंकी मृत्युका एक वर्ष पूर्ण हो जाय तो दयावान् परिजनोंको शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिको गन्ध-अक्षत-पुष्पादिसे विष्णु और यमकी पूजा करके कुशोंके ऊपर मधुयुक्त और घृतमिश्रित दस पिण्ड देना चाहिये।

मौन होकर तिलके सहित विष्णु और यमका ध्यान करते हुए दक्षिणाभिमुख होकर पूर्वोक्त दस पिण्ड प्रदान करे। उन पिण्डोंको उठाकर और एकमें मिलाकर तीर्थके जलमें डालते हुए मृतकके नाम और गोत्रका उच्चारण करना चाहिये।

इसके बाद पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे विष्णु और यमकी पुनः पूजा करे। उस दिन उपवास रहकर कुल, विद्या, तप और शीलसे सम्पन्न यथासामर्थ्य नौ अथवा पाँच साधु ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उसके दूसरे दिन मध्याह्न कालमें पूर्वदिनके समान पुनः विष्णु एवं यमकी पूजा करके उत्तराभिमुख उन ब्राह्मणोंको आसनपर बैठाये। उसके बाद यज्ञोपवीती कर्ता आवाहन, अर्घ्य तथा दानादिमें विष्णु और यमसे समन्वित प्रेतके नामका कीर्तन करे तथा प्रेत, यम और विष्णुका स्मरण करते हुए श्राद्ध सम्पन्न करे। उस अवसरपर पिण्डदानके लिये अन्य देवोंका भी आवाहन करना चाहिये। उसके बाद उन्हें क्रमशः दस अथवा पाँच पृथक्-पृथक् पिण्ड दे। यथा— पहला पिण्ड विष्णुदेव, दूसरा पिण्ड ब्रह्मा, तीसरा पिण्ड शिव, चौथा पिण्ड भृत्यसहित शिव और पाँचवाँ पिण्ड प्रेतके लिये देय है। प्रेतके नाम एवं गोत्रका स्मरण तथा विष्णु शब्दका उच्चारण करना चाहिये। पिण्डदान होनेके बाद सिर झुकाकर नमस्कार करते हुए पाँचवें पिण्डको कुशोंपर स्थापित करे। तदनन्तर यथाशक्ति गौ-भूमि और पिण्डदानादिके द्वारा उस प्रेतका स्मरण करते हुए कुश तथा तिलसे युक्त उन ब्राह्मणोंके कुशयुक्त हाथोंमें तिल-दान दे।

इसके बाद ब्राह्मणोंको अन्न, ताम्बूल और दक्षिणा देकर श्रेष्ठतम ब्राह्मणकी स्वर्णदानसे पूजा करे। यह दान नाम-गोत्रका स्मरण करते हुए 'विष्णु प्रसन्न हों', ऐसा कहकर देना चाहिये।

तदनन्तर ब्राह्मणोंका अनुगमन करके यजमान दक्षिणाभिमुख होकर प्रेतके नाम-गोत्रका कीर्तन करते हुए 'प्रीतोऽस्तु' ऐसा कहकर भूमिपर जल गिरा दे। तत्पश्चात् मित्र एवं बन्धु-बान्धवोंके साथ श्राद्धके अवशिष्ट भोजनको संयत वाक् होकर ग्रहण करे।

तदनन्तर प्रतिवर्ष सांवत्सर श्राद्ध एकोद्दिष्ट विधानसे करना चाहिये। इस प्रकारकी क्रिया करनेसे पापीजन स्वर्ग चले जायँगे। इसके बाद वे सपिण्डीकरण आदिकी क्रियाओंको करनेपर उसे प्राप्त करते हैं।

यदि प्रमादवश किसी मनुष्यकी जल आदिमें डूबकर अपमृत्यु हो जाती है तो उसके पुत्र या सगे-सम्बन्धीको यथाविधि सभी और्ध्वदैहिक कर्म करने आवश्यक हैं। प्रमादवश अथवा इच्छापूर्वक भी प्राणीको सर्पके सामने कदापि नहीं जाना चाहिये। (ऐसी स्थितिमें सर्प-दंशसे मृत्यु होनेपर) प्रतिमास दोनों पक्षोंकी पञ्चमी तिथिको नागदेवताकी पूजा करे। भूमिपर शालिचूर्णसे नागदेवकी आकृति बनावे। श्वेत पुष्प, सुगंध, धूप,


* स्वेच्छया तार्क्ष्य मरणं शृङ्गिदंष्ट्रिसरीसृपैः। चाण्डालाद्यात्मघातैश्च विषाद्यैस्ताडनैस्तथा ॥
जलाग्निपातवातैश्च निराहारादिभिस्तथा। येषामेव भवेन्मृत्युः प्रोक्तास्ते पापकर्मिणः॥ (४४। १-२)

५८४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

दीप और सफेद अक्षतसे उसकी पूजा करके कच्चा पीसा हुआ अन्न तथा दूध अर्पित करे। उसके बाद उठकर द्रव्य और वस्त्र छोड़ते हुए 'नागराज प्रसन्न हों'—ऐसा कहे।

उस दिन श्राद्ध सम्पन्न करनेके पश्चात् मधुर अन्नका भोजन करे। यथाशक्ति वह उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणको सुवर्णकी बनी हुई नाग-प्रतिमाका दान दे। तदनन्तर उसे गौका दान देकर पुनः 'नागराज प्रीयताम्'—हे नागराज! आप अब मेरे ऊपर प्रसन्न हों—ऐसा कहे। इसके बाद सामर्थ्यानुसार पूर्ववत् उन कर्मोंको भी निर्देशानुसार करे।

जो मनुष्य अपनी वैदिक शाखाकी विधिके द्वारा ऐसे कर्मको यथावत् करता है, वह उन अपमृत्यु-प्राप्त प्राणियोंको प्रेतत्वसे विमुक्त करके स्वर्गलोकको ले जाता है।

(अध्याय ४४)


पार्वण आदि श्राद्धोंके अधिकारी; एकसे अधिककी मृत्युपर पिण्डदान आदिकी व्यवस्था; मृत्युतिथि-मासके अज्ञात होनेपर तथा प्रवासकालमें मृत्यु होनेपर श्राद्ध आदिकी व्यवस्था; नित्य एवं दैव तथा वृद्धि आदि श्राद्धोंकी कर्तव्यताका प्रतिपादन

श्रीविष्णुने कहा— हे खगेश्वर! अब मैं प्रतिवर्ष होनेवाले पार्वण श्राद्धका वर्णन तुमसे कर रहा हूँ। मृत व्यक्तिके औरस और क्षेत्रज पुत्रको प्रतिवर्ष पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। औरस एवं क्षेत्रज पुत्रोंके अतिरिक्त अन्यको एकोद्दिष्ट-विधिसे श्राद्ध करना चाहिये, पार्वण श्राद्ध नहीं।

अग्निहोत्र न करनेवाले मृत ब्राह्मणके क्षेत्रज तथा औरस दोनों पुत्र यदि अग्निहोत्री नहीं हैं तो उन्हें एकोद्दिष्ट श्राद्ध नहीं करना चाहिये। प्रतिवर्ष पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। यदि पुत्र अथवा पितामेंसे कोई एक साग्निक हो तो प्रतिवर्ष क्षेत्रज और औरसको पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। किंतु कुछ लोगोंका कहना है कि पुत्र अग्निहोत्री हों या न हों, पितृगण भी अग्निहोत्री रहे हों या न रहे हों, फिर भी एकोद्दिष्ट श्राद्ध पुत्रोंको अपने पिताकी मृत्यु-तिथिपर करना चाहिये। जिसकी मृत्यु दर्शकाल अथवा प्रेतपक्षमें होती है, उसके सभी पुत्र प्रतिवर्ष पार्वण श्राद्ध करें।

एकोद्दिष्ट श्राद्ध पुत्रहीन पुरुष और स्त्रीका भी हो सकता है। एकोद्दिष्ट यज्ञकर्ममें समूल कुशका प्रयोग करना चाहिये। बाहरसे कटे हुए अथवा एक बार काटे गये कुश ही श्राद्धमें वृद्धिकारक होते हैं। यदि किये जानेवाले पार्वण श्राद्धके बीच अशौच हो जाता है तो यजमान उस अशौचके समाप्त होनेके बाद श्राद्ध करे। एकोद्दिष्ट श्राद्धका काल आ जानेपर यदि किसी प्रकारका विघ्न आ जाता है तो दूसरे मास उसी तिथिपर वही एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया जा सकता है। शूद्र तथा उसकी पत्नी और उसके पुत्रका श्राद्ध मौन अर्थात् मन्त्रोच्चार-रहित होना चाहिये। इसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य—इन तीनों द्विजातियोंकी कन्या और यज्ञोपवीत-संस्कारसे हीन ब्राह्मणका भी श्राद्ध तूष्णीं (मौन) होकर ही करना धर्म-विहित है। एक ही समयमें एक ही घरके बहुत-से लोगोंकी अथवा दो व्यक्तियोंकी मृत्यु हो गयी हो तो उनके श्राद्धका पाक एक साथ और श्राद्ध पृथक्-पृथक्

प्रेतकल्प ] पार्वण आदि श्राद्धोंके अधिकारी ५८५

करना चाहिये। साथमें मरनेपर विधि इस प्रकार है—पहले पूर्वमृतको, तदनन्तर द्वितीय और तृतीयको क्रमशः पिण्डदान करना चाहिये।

जो आलस्यरहित होकर इस विधानके अनुसार अपने माता-पिताका प्रत्येक वर्ष श्राद्ध करता है, वह उनका उद्धार करके स्वयं भी परम गतिको प्राप्त करता है। यदि किसी प्राणीकी मृत्यु और प्रस्थान-कालका दिन स्मरण नहीं है, किंतु वह मास ज्ञात है तो उसी मासकी अमावास्या-तिथिमें उस मृतककी मृत्यु-तिथि माननी चाहिये। यदि किसीकी मृत्युका मास ज्ञात नहीं है, किंतु दिनकी जानकारी है तो मार्गशीर्ष (अगहन) अथवा माघमासमें उसी दिन उसका श्राद्ध किया जा सकता है। जब अपने सम्बन्धीकी मृत्युका दिन एवं मास दोनों अज्ञात हों तो श्राद्ध-कर्मके लिये यात्राके दिन और मास ग्रहण करने चाहिये। जब मृतकके प्रस्थानका भी दिन और मास न ज्ञात हो तो जिस दिन एवं मासमें मृत्युकी बात सुनी गयी हो, उसे ही श्राद्धके लिये उपयुक्त मान ले। बिना प्रवासके भी मृत्यु होनेपर दिन तथा मास दोनों विस्मृत हो गया हो तो पूर्ववत् मृत-तिथिका निर्णय करना चाहिये।

यदि कोई गृहस्थ प्रवासमें है और उसके प्रवासके ही दिनोंमें उसके घरमें किसीकी मृत्यु हुई हो तथा मृत्युके बाद अशौचके दिन बीत चुके हों और अशौचके अनन्तर जो एकादशाह-द्वादशाह आदि श्राद्ध विहित हैं वे चल रहे हों, इसी बीच प्रवासमें रहनेवाला वह गृहस्थ घर आ जाता हो और आनेके बाद ही मृत्युकी जानकारी उसे मिलती हो तो केवल वह गृहस्थ ही अशौचसे ग्रस्त होगा और तत्काल यथाशास्त्र अपनी अशौचकी निवृत्तिके लिये अपेक्षित विधि अपनायेगा। उसके द्रव्यादिपर अशौच नहीं होगा। उसके घर आनेमात्रसे उसकी अशुचिताका प्रभाव श्राद्धके उपयोगमें आनेवाली वस्तुओंपर नहीं पड़ेगा। इसके अतिरिक्त यह भी ज्ञातव्य है कि यदि श्राद्धका मुख्य अधिकारी सुदूर देशमें है और उसके घर आकर यथाधिकार श्राद्ध करनेकी सम्भावना नहीं बनती है, ऐसी स्थितिमें अन्य अधिकारी पुत्रादिद्वारा यदि श्राद्धकर्म प्रारम्भ कर दिया गया है तो उसे भी श्राद्धप्रक्रिया पूर्ण करनी चाहिये। दाता और भोक्ता दोनोंको जननाशौच अथवा मरणाशौच ज्ञात न हो तो उन दोनोंमें किसीको भी दोष नहीं लगता। जननाशौच और मरणाशौचका ज्ञान भोक्ताको हो जाय और दाताको न हो तो उस समय भोक्ताको ही पाप लगता है, उसमें वह दाता दोषी नहीं होगा।

जिस मृत व्यक्तिकी तिथि ज्ञात नहीं है, उसकी मृत-तिथिका निर्धारण पूर्वोक्त प्रकारसे करके जो श्राद्धादि करता है, वह मृत व्यक्तिको तार देता है।

नित्य-श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंकी सभी पितरोंके साथ भक्तिपूर्वक अर्घ्य, पाद्य तथा गन्धादिके द्वारा पूजा करके पितरोंके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको यथाविधि भोजन कराना चाहिये। आवाहन, स्वधाकार, पिण्डदान, अग्नौकरण, ब्रह्मचर्यादि नियम और विश्वेदेवकृत्य—ये कर्म नित्य-श्राद्धमें त्याज्य हैं। इस श्राद्धमें ब्राह्मणोंको भोजन करानेके बाद उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा देकर प्रणाम निवेदन करते हुए बिदा करे।

विश्वेदेव आदिके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको नित्य-श्राद्धकी भाँति जो भोजन कराया जाता है, वह ‘देवश्राद्ध’ कहा जाता है।

यदि अग्रिम दिन कोई शुभ कार्य—विवाह अथवा यज्ञोपवीत आदि करने हैं तो उसके पूर्व-दिन मातृश्राद्ध और पितृश्राद्ध एवं मातामहश्राद्ध (श्राद्धत्रय) करने चाहिये। इन तीनों श्राद्धोंके लिये अपेक्षित विश्वेदेव-कार्य एक ही बार करना चाहिये। अर्थात् तीनों श्राद्धोंके लिये तीन बार विश्वेदेव कार्य नहीं करने चाहिये। पहले मातृपितामही तथा प्रपितामहीके लिये, तदनन्तर पितृपितामह और

२६२- भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश, मनुष्ययोनि-प्राप्तिकी दुर्लभताका वर्णन, मनुष्य-शरीर प्राप्तकर आत्मकल्याणके लिये सचेष्ट रहना, संसारकी दुःखरूपता तथा अनित्यता और ईश्वरकी नित्यताका वर्णन, कालके द्वारा सभीके विनाशका प्रतिपादन, सत्संग और विवेकज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति, तत्त्वज्ञानरूपी मोक्षप्राप्तिके उपाय, गरुडपुराणकी वक्तृ-श्रोतृपरम्परा तथा गरुडपुराणका माहात्म्य

५८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

प्रपितामहके लिये, तत्पश्चात् मातामहादिके लिये क्रमशः आसनादिके दानकी क्रिया सम्पन्न करनी चाहिये। यदि मातृश्राद्धमें ब्राह्मणोंका अभाव हो तो श्रेष्ठ परिवारमें उत्पन्न हुई पति-पुत्रसे सम्पन्न सौभाग्यवती आठ साध्वी स्त्रियोंको ही निमन्त्रित किया जा सकता है।

इष्ट और आपूर्त-कृत्योंमें आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। उत्पात आदिकी शान्तिके लिये नित्य-श्राद्धके समान नैमित्तिक श्राद्ध करनेका विधान है।

हे तार्क्ष्य ! जैसा मैंने कहा है, उसी प्रकारसे नित्यश्राद्ध, दैवश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध, काम्यश्राद्ध तथा नैमित्तिक श्राद्ध—इन पाँचों श्राद्धोंको करता हुआ मनुष्य अपने समस्त अभीष्टोंको प्राप्त करता है। इस तरह मैंने सब बता दिया, अब तुम मुझसे और क्या पूछ रहे हो ? (अध्याय ४५)


सत्कर्मकी महिमा तथा कर्मविपाकका फल

तार्क्ष्यने कहा— हे सुरश्रेष्ठ! मनुष्योंको स्वर्ग और नाना प्रकारके भोग तथा सुख एवं रूप, बल-बुद्धि एवं पराक्रम पुण्यके प्रभावसे प्राप्त होते हैं। पूर्वोक्त प्रकारके लौकिक एवं पारलौकिक भोग पुण्यवान् व्यक्तियोंको उनके पुण्यसे ही प्राप्त होते हैं, अन्यथा नहीं—ये वेदवाक्य सर्वथा सत्य हैं।

जिस प्रकार धर्मकी ही विजय होती है, अधर्मकी नहीं। सत्यकी ही विजय होती है, असत्यकी नहीं। क्षमाकी ही विजय होती है, क्रोधकी नहीं। विष्णु ही विजय प्राप्त करते हैं असुर नहीं—

धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम्।
क्षमा जयति न क्रोधो विष्णुर्जयति नासुरः॥
(४६।३)

—उसी प्रकार मैंने सत्य-रूपसे यह जाना है कि सुकृतसे ही कल्याण होता है। जिसका पुण्य जितना उत्कृष्टतम है, वह मनुष्य भी उतना ही श्रेष्ठतम है। जिस प्रकार पापी जन्म लेते हैं, जिस कर्मफलके अनुसार जीव जिस भोगका भागी होता है, वह जिन-जिन योनियोंको जिस रूपमें प्राप्त करता है, जैसा उसका रूप होता है वह सब मैं सुनना चाहता हूँ। हे देव! संक्षेपमें आप मेरी इस इच्छित बातको बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा— हे कश्यपपुत्र गरुड! शुभाशुभ फलोंके भोगके अनन्तर जिन लक्षणोंसे युक्त होकर मनुष्य इस लोकमें उत्पन्न होते हैं, उनको तुम मुझसे सुनो।

हे पक्षिश्रेष्ठ! इस लोकमें आत्मज्ञानियोंका शासक गुरु है। दुरात्माओंका शासक राजा है और गुप्तरूपसे पाप करनेवाले प्राणियोंका शासक सूर्य-पुत्र यम है—

गुरुरात्मवतां शास्ता राजा शास्ता दुरात्मनाम्।
इह प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः॥
(४६।८)

अपने पापोंका प्रायश्चित्त न किये जानेपर उन्हें अनेक प्रकारके नरक प्राप्त होते हैं। वहाँकी यातनाओंसे विमुक्त होकर प्राणी मर्त्यलोकमें जन्म लेते हैं। मानवयोनिमें जन्म लेकर वे अपने पूर्व-पापोंके जिन चिह्नोंसे युक्त रहते हैं, मैं उन लक्षणोंको तुम्हें बताऊँगा।

सभी पापी यमराजके घर पहुँचकर नाना प्रकारके कष्ट सहन करते हैं। जब उन यातनाओंसे उन्हें मुक्ति प्राप्त होती है तो उनके पापोंका भावी शरीरपर चिह्नाङ्कन होता है। उन्हीं चिह्नोंसे संयुक्त होकर वे पुनः इस पृथ्वीलोकमें जन्म ग्रहण करते हैं। यथा—असत्यवादी हकलाकर बोलनेवाला, गायके विषयमें झूठ बोलनेवाला गूँगा, ब्रह्महन्ता कोढ़ी, मद्यपी काले रंगके दाँतोंवाला, स्वर्णचोर कुत्सित एवं विकृत नखोंवाला और गुरुपत्नीगामी चर्मरोगी होता है तथा पापियोंसे सम्बन्ध रखनेवाला निम्नयोनिमें जन्म लेता है और दान न देनेवाला

प्रेतकल्प ] सत्कर्मकी महिमा तथा कर्मविपाकका फल ५८७

दरिद्र, अयाज्यका यज्ञ करनेवाला ब्राह्मण ग्रामसूकर, बहुतोंका यज्ञ करानेवाला गधा और अमन्त्रक भोजन करनेवाला कौआ होता है।

बिना परीक्षण किये हुए भोजनको ग्रहण करनेवाले निर्जन वनमें व्याघ्र होते हैं। अन्य प्राणियोंको बहुत तर्जना देनेवाले पापी बिलार, कक्षको जलानेवाला जुगूनू, पात्रको विद्या न देनेवाला बैल, ब्राह्मणको बासी अन्न देनेवाला कुत्ता, दूसरेसे ईर्ष्या और पुस्तककी चोरी करनेवाला जात्यन्ध और जन्मान्ध होता है।

फलोंकी चोरी करनेसे मनुष्यके संतानकी मृत्यु हो जाती है, इसमें संदेह नहीं है। वह मरनेके बाद बंदरकी योनिमें जाता है। तदनन्तर उसीके समान मुख प्राप्त कर पुनः मानवयोनिमें उत्पन्न होता है और गण्डमालाके रोगसे ग्रस्त रहता है। जो बिना दिये स्वयं खा लेता है, वह संतानहीन होता है। वस्त्रकी चोरी करनेवाला गोह, विष देनेवाला वायुभक्षी सर्प, संन्यास-मार्गका परित्याग करके पुनः अपने पूर्व आश्रममें प्रविष्ट हो जानेवाला मरुस्थलका पिशाच होता है। जलापहर्ता पापीको चातक, धान्यके अपहरणकर्ताको मूषक और युवावस्थाको न प्राप्त हुई कन्याका संसर्ग करनेवालेको सर्पकी योनि प्राप्त होती है।

गुरुपत्नीगामी निश्चित ही गिरगिट होता है। जो व्यक्ति जलप्रपातके स्थानको तोड़कर नष्ट करता है, वह मत्स्य होता है। न बेचने योग्य वस्तुको जो खरीदता है, वह बगुला तथा गिद्ध होता है। अयोनिग व्यक्ति भेड़िया और खरीदी जा रही वस्तुमें छल करनेवाला उलूककी योनि प्राप्त करता है। जो मृतकके एकादशाहमें भोजन करनेवाला होता है तथा प्रतिज्ञा करके ब्राह्मणोंको धन नहीं देता, वह सियार होता है। रानीके साथ सम्भोग करके मनुष्य दंष्ट्री होता है। चोरी करनेवाला ग्रामसूकर, फलविक्रेता श्यामलता होता है। वृषलीके साथ गमन करनेवाला वृष होता है। जो पुरुष पैरोंसे अग्निका स्पर्श करता है वह बिलौटा, दूसरेका मांस भक्षण करनेवाला रोगी, रजस्वला स्त्रीसे गमन करनेवाला नपुंसक, सुगन्धित वस्तुओंकी चोरी करनेवाला दुर्गन्धदायक प्राणी होता है। दूसरेका थोड़ा या बहुत जिस-किसी भी प्रकारसे जो कुछ भी मनुष्य अपहरण करता है, वह उस पापसे निश्चित ही तिर्यक् योनिमें जाता है।

हे खगेन्द्र! ऐसे तो पहलेवाले चिह्न हैं ही, किंतु इनके अतिरिक्त भी अन्य बहुत-से चिह्न हैं, जो अपने-अपने कर्मानुसार प्राणियोंके शरीरमें व्याप्त रहते हैं। ऐसा पापी क्रमशः नाना प्रकारके नरकोंका भोग करके अवशिष्ट कर्मफलके अनुसार इन पूर्वकथित योनियोंमें जन्म लेता है। हे काश्यप! उसके बाद मृत्यु होनेपर जबतक शुभ और अशुभ कर्म समाप्त नहीं हो जाते हैं, तबतक सभी योनियोंमें सैकड़ों बार उसका जन्म होता है; इसमें संदेह नहीं है। जब स्त्री तथा पुरुषके संयोगसे गर्भमें शुक्र और शोणित जाता है तो उसीमें पञ्चभूतोंसे समन्वित होकर यह पाञ्चभौतिक शरीर जन्म लेता है। तदनन्तर उसमें इन्द्रियाँ, मन, प्राण, ज्ञान, आयु, सुख, धैर्य, धारणा, प्रेरणा, दुःख, मिथ्याहंकार, यत्न, आकृति, वर्ण, राग-द्वेष और उत्पत्ति-विनाश—ये सब उस अनादि आत्माको सादि मानकर पाञ्चभौतिक शरीरके साथ उत्पन्न होते हैं। उसी समयसे वह पाञ्चभौतिक शरीर पूर्वकर्मोंसे आबद्ध होकर गर्भमें बढ़ने लगता है।

हे तार्क्ष्य! मैंने जैसा तुमसे पहले कहा है, वैसा ही जीवका लक्षण है। चार प्रकारके प्राणिसमूहमें इसी प्रकारके परिवर्तनका चक्र घूमता रहता है। उसीमें शरीरधारियोंका उद्भव और विनाश होता है। यथाविहित अपने धर्मका पालन करनेसे प्राणियोंको ऊर्ध्वगति तथा अधर्मकी ओर बढ़नेसे अधोगति प्राप्त होती है। अतः सभी वर्णोंकी सद्गति

५८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

अपने धर्मपर चलनेसे ही होती है। हे वैनतेय! देव और मानवयोनिमें जो दान तथा भोगादिकी क्रियाएँ दिखायी देती हैं, वे सब कर्मजन्य फल हैं। घोर अकर्मसे और काम-क्रोधके द्वारा अर्जित जो अशुभ पापाचार हैं, उनसे नरक प्राप्त होता है तथा वहाँसे जीवका उद्धार नहीं होता है। (अध्याय ४६)


यममार्गमें स्थित वैतरणी नदीका वर्णन, पापकर्मोंसे घोर वैतरणीमें निवास, वैतरणीसे पार होनेके लिये वैतरणी-धेनुदान, भगवान् विष्णु, गङ्गा तथा ब्राह्मणकी महिमा

गरुडने कहा—हे देवदेवेश! महाप्रभो! अब आप परम कृपा करके दान, दानके माहात्म्य और वैतरणीके प्रमाणका वर्णन करें।

श्रीकृष्णने कहा—हे तार्क्ष्य ! यमलोकके मार्गमें जो वैतरणी नामकी महानदी है, वह अगाध, दुस्तर और देखनेमात्रसे पापियोंको महाभयभीत करनेवाली है। वह पीब और रक्तरूपी जलसे परिपूर्ण है। मांसके कीचड़से परिव्याप्त एवं तटपर आये हुए पापियोंको देखकर उन्हें नाना प्रकारसे भयाक्रान्त करनेवाले स्वरूपको धारण कर लेती है। पात्रके मध्यमें घीकी भाँति वैतरणीका जल तुरंत खौलने लगता है। उसका जल कीटाणुओं एवं वज्रके समान सूँडवाले जीवोंसे व्याप्त है। सूँस, घड़ियाल, वज्रदन्त तथा अन्यान्य हिंसक एवं मांसभक्षक जलचरोंसे वह महानदी भरी हुई है। प्रलयके अन्तमें जैसे बारहों सूर्य उदित होकर विनाशलीला करते हैं, वैसे ही वे वहाँपर भी सदैव तपते रहते हैं, जिससे उस महातापमें वे पापी चिल्लाते हुए करुण विलाप करते हैं। उनके मुखसे बार-बार हा भ्रात, हा तात यही शब्द निकलता है। वे जीव उस महाभयंकर धूपमें इधर-उधर भागते हैं, उस दुर्गन्धपूर्ण जलमें डुबकी लगाते हैं और अपनी आत्मग्लानिसे व्यथित होते हैं। वह महानदी चारों प्रकारके प्राणियोंसे भरी हुई दिखायी देती है। पृथ्वीपर जिन लोगोंने गोदान किया है, उस दानके प्रभावसे वे उसे पार कर जाते हैं अन्यथा जिनके द्वारा यह दान नहीं हुआ है, वे उसीमें डूबते रहते हैं।

जो मूढ़ मेरी, आचार्य, गुरु, माता-पिता एवं अन्य वृद्धजनोंकी अवमानना करते हैं, मरनेके बाद उनका वास उसी महानदीमें होता है। जो मूढ़ अपनी विवाहिता पतिव्रता, सुशीला और धर्मपरायणा पत्नीका परित्याग करते हैं, उनका सदैवके लिये उसी महाघिनौनी नदीके जलमें वास होता है। विश्वासमें आये हुए स्वामी, मित्र, तपस्वी, स्त्री, बालक एवं वृद्धका वध करके जो पापी उस महानदीमें गिरते हैं, वे उसके बीचमें जाकर करुण विलाप करते हुए अत्यन्त कष्ट भोगते हैं। शान्त तथा भूखे ब्राह्मणको विघ्न पहुँचानेके लिये जो उसके पास जाता है, वहाँ प्रलयपर्यन्त कृमि उसका भक्षण करते हैं। जो ब्राह्मणको प्रतिज्ञा करके प्रतिज्ञात वस्तु नहीं देता है अथवा बुलाकर जो 'नहीं है'—ऐसा कहता है, उसका वहाँ वैतरणीमें वास होता है। आग लगानेवाला, विष देनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, मद्य पीनेवाला, यज्ञका विध्वंस करनेवाला, राजपत्नीके साथ गमन करनेवाला, चुगलखोरी करनेवाला, कथामें विघ्न करनेवाला, स्वयं दी हुई वस्तुका अपहरण करनेवाला, खेत (मेड़) और सेतुको तोड़नेवाला, दूसरेकी पत्नीको प्रधर्षित करनेवाला, रस-विक्रेता तथा वृषलीपति ब्राह्मण, प्यासी गायोंकी बावलीको तोड़नेवाला, कन्याके साथ व्यभिचार करनेवाला, दान देकर पश्चात्ताप करनेवाला, कपिलाका दूध पीनेवाला

प्रेतकल्प ] यममार्गमें स्थित वैतरणी नदीका वर्णन ५८९


शूद्र तथा मांसभोजी ब्राह्मण—ये निरन्तर उस वैतरणी नदीमें वास करते हैं। कृपण, नास्तिक और क्षुद्र प्राणी उसमें निवास करते हैं। निरन्तर असहनशील तथा क्रोध करनेवाला, अपनी बातको ही प्रमाण माननेवाला, दूसरेकी बातको खण्डित करनेवाला नित्य वैतरणीमें निवास करता है। अहंकारी, पापी तथा अपनी झूठी प्रशंसा करनेवाला, कृतघ्न, गर्भपात करनेवाला वैतरणीमें निवास करता है। कदाचित् भाग्ययोगसे यदि उस नदीको पार करनेकी इच्छा उत्पन्न हो जाय तो तारनेका उपाय सुनो।

मकर और कर्ककी संक्रान्तिका पुण्यकाल, व्यतीपात योग, दिनोदय, सूर्य, चन्द्रग्रहण, संक्रान्ति, अमावास्या अथवा अन्य पुण्यकालके आनेपर श्रेष्ठतम दान दिया जाता है। मनमें दान देनेकी श्रद्धा जब कभी उत्पन्न हो जाय, वही दानका काल है; क्योंकि सम्पत्ति अस्थिर है।

शरीर अनित्य है और धन भी सदा रहनेवाला नहीं है। मृत्यु सदा समीप है, इसलिये धर्म-संग्रह करना चाहिये—

अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः॥
नित्यं संनिहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः।
(४७। २४-२५)

काली अथवा लाल रंगकी शुभ लक्षणोंवाली वैतरणी गायको सोनेकी सींग, चाँदीके खुर, कांस्यपात्रकी दोहनीसे युक्त दो काले रंगके वस्त्रोंसे आच्छादित करके ससधान्य-समन्वित करके ब्राह्मणको निवेदित करे। कपाससे बने हुए द्रोणाचलके शिखरपर ताम्रपात्रमें लौहदण्ड लेकर बैठी हुई स्वर्णनिर्मित यमकी प्रतिमा स्थापित करे। सुदृढ़ बन्धनोंसे बाँधकर इक्षुदण्डोंकी एक नौका तैयार करे। उसीसे सूर्यसे उत्पन्न गौको सम्बद्ध कर दे। इसके बाद छत्र, पादुका, अंगूठी और वस्त्रादिसे पूज्य श्रेष्ठ ब्राह्मणको संतुष्ट करके जल तथा कुशके सहित इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए वह वैतरणी गौ उसे दानमें समर्पित करे—

यमद्वारे महाघोरे श्रुत्वा वैतरणीं नदीम्।
तर्तुकामो ददाम्येनां तुभ्यं वैतरणीं नमः॥
गावो मे अग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पार्श्वतः।
गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
विष्णुरूप द्विजश्रेष्ठ मामुद्धर महीसुर।
सदक्षिणा मया दत्ता तुभ्यं वैतरणी नमः॥
(४७। ३०-३२)

‘हे द्विजश्रेष्ठ! महाभयंकर वैतरणी नदीको सुनकर मैं उसको पार करनेकी अभिलाषासे आपको यह वैतरणी दान दे रहा हूँ। हे विप्रदेव! गौएँ मेरे आगे रहें, गौएँ मेरे बगलमें रहें, गौएँ मेरे हृदयमें रहें और मैं उन गायोंके बीचमें रहूँ। हे विष्णुरूप! द्विजवरेण्य! भूदेव! मेरा उद्धार करो। मैं दक्षिणासहित यह वैतरणी गौ आपको दे रहा हूँ। आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें।

इसके बाद सबके स्वामी धर्मराजकी प्रतिमा और वैतरणी नामवाली उस गौकी प्रदक्षिणा करके ब्राह्मणको दान दे। उस समय वह ब्राह्मणको आगे कर उस वैतरणी गौकी पूँछ हाथमें लेकर यह कहे—

धेनुके त्वं प्रतीक्षस्व यमद्वारे महाभये॥
उत्तारणाय देवेशि वैतरण्यै नमोऽस्तु ते।
(४७। ३४-३५)

‘हे गौ! उस महानदीसे मुझे पार उतारनेके लिये आप महाभयकारी यमराजके द्वारपर मेरी प्रतीक्षा करें। हे वैतरणी! देवेश्वरि! आपको मेरा नमस्कार है।’

ऐसा कहकर उस गौको ब्राह्मणके हाथमें देकर उनके पीछे-पीछे उनके घरतक पहुँचाने जाय। हे वैनतेय! ऐसा करनेपर वह नदी दाताके लिये सरलतासे पार करनेके योग्य बन जाती है। जो व्यक्ति इस पृथ्वीपर गौका दान देता है, वह अपने समस्त अभीष्टको सिद्ध कर लेता है।

सुकर्मके प्रभावसे प्राणीको ऐहिक और पारलौकिक सुखकी प्राप्ति होती है। स्वस्थ जीवनमें गोदान देनेसे हजार गुना एवं रोगग्रस्त जीवनमें सौ गुना लाभ निश्चित है। मरे हुए प्राणीके कल्याणार्थ

५९० संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-

जितना दान दिया जाता है, उतना ही उसका पुण्य है। अतः मनुष्यको अपने हाथसे ही दान देना चाहिये। मृत्यु होनेके बाद कौन किसके लिये दान देगा ? दान-धर्मसे रहित कृपणतापूर्वक जीवन जीनेसे क्या लाभ ? इस नश्वर शरीरसे स्थिर कर्म करना चाहिये। प्राण अतिथिकी तरह अवश्य छोड़कर चले जायेंगे।

हे पक्षिराज ! इस प्रकार प्राणिवर्गके समस्त दुःखका वर्णन मैंने तुमसे कर दिया है। इसके साथ यह भी बता दिया है कि प्रेतके मोक्ष एवं लोकमङ्गलके लिये उसके और्ध्वदैहिक कर्मको करना चाहिये।

सूतजीने कहा—हे विप्रगण ! परम तेजस्वी भगवान् विष्णुके द्वारा दिये गये ऐसे प्रेत-चरितसे सम्बन्धित उपदेशको सुनकर गरुडको अत्यन्त संतुष्टि प्राप्त हुई।

हे ऋषियो ! जीव-जन्तुओंके जन्मादिका यही सब विधान है। यही जन्म, मरण, प्रेतत्व तथा और्ध्वदैहिक कृत्यका नियम है। मैंने सब प्रकारसे उनके मोक्ष आदि कारणका वर्णन कर दिया है।

'जिनके हृदयमें नीलकमलके समान श्यामवर्णवाले भगवान् जनार्दन विराजमान हैं, उन्हींको लाभ और विजय प्राप्त होती है। ऐसे प्राणियोंकी पराजय कैसे हो सकती है? धर्मकी जीत होती है, अधर्मकी नहीं। सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं। क्षमाकी विजय होती है, क्रोधकी नहीं। विष्णु ही जीतते हैं, असुर नहीं। विष्णु ही माता हैं, विष्णु ही पिता हैं और विष्णु ही अपने स्वजन बान्धव हैं; जिनकी बुद्धि इस प्रकार स्थिर हो जाती है, उनकी दुर्गति नहीं होती है। भगवान् विष्णु मङ्गलस्वरूप हैं, गरुडध्वज मङ्गल हैं, भगवान् पुण्डरीकाक्ष मङ्गल हैं एवं हरि मङ्गलके ही आयतन हैं। हरि ही गङ्गा और ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण तथा गङ्गा उन विष्णुके मूर्तरूप हैं। अतः गङ्गा, हरि एवं ब्राह्मण ही इस त्रिलोकके सार हैं'—

मया प्रोक्तं वै ते मुक्त्यै निदानं चैव सर्वशः।
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥
धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम्।
क्षमा जयति न क्रोधो विष्णुर्जयति नासुराः॥
विष्णुर्माता पिता विष्णुर्विष्णुः स्वजनबान्धवाः।
येषामेव स्थिरा बुद्धिर्न तेषां दुर्गतिर्भवेत्॥
मङ्गलं भगवान् विष्णुर्मङ्गलं गरुडध्वजः।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलायतनं हरिः॥
हरिर्भागीरथी विप्रा विप्रा भागीरथी हरिः।
भागीरथी हरिर्विप्राः सारमेतज्जगत्त्रये॥
(४७। ४५-४९)

इस प्रकार सूतजी महाराजके मुखसे निकली हुई, सभी शास्त्रोंके मूल तत्त्वोंसे सुशोभित भगवान् विष्णुकी वाणी-रूपी अमृतका पान करके समस्त ऋषियोंको बहुत संतुष्टि प्राप्त हुई। वे सभी परस्पर उन सर्वार्थद्रष्टा सूतजीकी प्रशंसा करने लगे। शौनक आदि मुनि भी अत्यन्त प्रसन्न हो गये। 'प्राणी चाहे अपवित्र हो या पवित्र हो, सभी अवस्थाओंमें रहते हुए भी जो पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णुका स्मरण करता है, वह बाहर और भीतरसे पवित्र हो जाता है'—

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
(४७।५२)
(अध्याय ४७)


प्रेतकल्प ] दुःखी गर्भस्थ जीवका विविध प्रकारका चिन्तन करना ५९१

दुःखी गर्भस्थ जीवका विविध प्रकारका चिन्तन करना, यमयातनाग्रस्त जीवका सदा सुकृत करनेका उपदेश देना

तार्क्ष्यने कहा—हे प्रभो! इस मर्त्यलोकमें अपने पुण्यकी संख्याके अनुसार सभी जातियोंमें जो मनुष्य निवास करते हैं, वे अपना काल आ जानेपर मृत्युको प्राप्त करते हैं—ऐसा लोकमें कहते हैं, इसके विषयमें आप मुझे बतायें। विधाताके द्वारा बनाये गये उस मार्गमें स्थित वे प्राणी अत्यन्त कठिन मार्गसे होकर गुजरते हैं। किस पुण्यसे वे प्रसन्नतापूर्वक जाते हैं और किससे वे यहाँ रहते हैं और कुल, बल तथा आयुका लाभ प्राप्त करते हैं।

सूतजीने कहा—हे ऋषियो! यह सुनकर, जिनके द्वारा इस पृथ्वीका निर्माण हुआ है, जिन्होंने समस्त चराचर जगत्‌की सृष्टि की है और समर्थ यमको अपने विहित कार्यमें नियोजित किया है, उन महाप्रभुने मनुष्यके शरीर, कर्म, भय और रूपका स्मरण करके गरुडसे इस प्रकार कहा—

भगवान्‌ने कहा—हे गरुड! यम-मार्गमें गमन करनेवाले जीवात्माओंका ऐहिक शरीर नहीं, अपितु धर्म, अर्थ, काम तथा चिरकालीन मोक्ष प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखनेवाला अंगुष्ठमात्र परिमाणमें स्थित दूसरा शरीर होता है। वह उसी रूपमें अपने पाप-पुण्यके अनुसार लोक एवं निवासगृह प्राप्त करता है। हे द्विज! उस यातना-शरीरमें स्थित होकर यम-पाशसे बँधा हुआ वह जीव पुनः-पुनः रोदन करता है—अत्यन्त पवित्र देशमें द्विजका शरीर प्राप्त करके भी मैंने न भगवान् विष्णुकी पूजा की, न पितरों एवं देवताओंको तृप्त किया, न मैंने याग, दान आदि किया और न योग्य पुत्रादि संतति ही। मुझ यम-मार्गगामीका कोई बन्धु नहीं है। मुझे पुनः द्विजका शरीर प्राप्त हो इस इच्छासे कोई पुण्य कार्य भी नहीं किया है। अत्यन्त दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त करके वेद और पुराणकी संहिताओंका भी अध्ययन मैंने नहीं किया है। इस प्रकार रुदन करते हुए देहीसे यमदूत कहते हैं कि हे देहिन्! हाथमें आये हुए ब्राह्मणशरीर, पवित्र देश आदि रूपी अनमोल रत्न भी तुमने खो दिये। हे देहिन्! तुम उसीके अनुसार अपना निर्वाह करो, जैसा कि तुमने किया है।'

मनुष्य क्षत्रियवंशका हो अथवा वैश्यवंशका हो, वह शूद्र हो या नीचवर्णका हो, किंतु यदि वह देवता, ब्राह्मण, बालक, स्त्री, वृद्ध, दीन और तपस्वियोंका हन्ता है अथवा इन्हें उपद्रवग्रस्त देखकर (इनके संरक्षणसे) पराङ्मुख हो जाता है तो उसके सभी इष्टदेव उससे विमुख हो जाते हैं। पितृगण उसके द्वारा दिये गये तिलोदकका पान नहीं करते हैं और अग्निदेव उसके द्वारा दिये गये हव्यको भी नहीं स्वीकार करते हैं। हे पक्षीन्द्र! संग्रामके उपस्थित होनेपर शस्त्र लेकर जो क्षत्रिय शत्रु-सेनाके समक्ष द्वेष और भयवश नहीं जाता है तथा बादमें मारा जाता है तो उसका क्षात्रबल मानो व्यर्थ ही हो गया।

जो युद्धमें वीरगति प्राप्त करता है। उसने मानो चन्द्र एवं सूर्यग्रहणके अवसरपर श्रेष्ठ ब्राह्मणको दान दे दिया, श्रेष्ठ तीर्थोंमें जाकर सदा स्नान कर लिया, गयातीर्थमें पहुँचकर सदा पितरोंको पिण्डदान दे दिया। जो क्षत्रिय अपने कर्तव्योंका पालन बिना किये हुए शरीरको छोड़ता है, वह सदा चिंता करता रहता है कि समरभूमिमें मारे गये स्वामीके लिये, बलात् अपहृत गौके लिये, स्त्री-बालककी हत्या रोकनेके लिये तथा मार्गमें लूटे जानेवाले साथियोंके लिये अपने प्राणोंका परित्याग मैंने नहीं

५९२

संक्षिप्त गरुडपुराण

[ धर्मकाण्ड-

किया। यमपाशमें आबद्ध वैश्य अपने किये हुए कर्मोंके विषयमें सोचता है कि मैंने किसी प्रकारका पुण्य-संचय नहीं किया, कुटुम्बके लिये मोहान्ध होकर क्रय-विक्रयमें मैंने सत्यका भी प्रयोग नहीं किया। ऐसे ही शूद्रका शरीर प्राप्त करनेवाला भी अपने कर्तव्यसे विमुख रहते हुए यदि शरीर त्याग करता है तो वह भी यह चिंता करता है कि मैंने ब्राह्मणोंको न तो यशस्कर दान दिया है और न उनकी पूजा की है। मेरे द्वारा इस पृथ्वीपर जलाशयका निर्माण नहीं करवाया गया है। मैंने किसी संस्कारहीन ब्राह्मणश्रेष्ठका संस्कार करानेमें योगदान भी नहीं किया है। शास्त्रविहित अपने कर्मोंका परित्याग करके मदान्ध होकर मैं जीवित रहा। श्रेष्ठ तीर्थमें जाकर अपने शरीरका परित्याग भी नहीं किया। मैंने धर्मार्जन भी नहीं किया है। कभी सद्गति प्राप्त करनेके लिये मैंने देवताओंकी पूजा भी नहीं की है।

समस्त लोकोंमें पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल—ये तीन लोक सारभूत हैं। सभी द्वीपोंमें जम्बूद्वीप, समस्त देशोंमें देवदेश अर्थात् भारतवर्ष और सभी जीवोंमें मनुष्य ही सार है। इस जगत्‌के सभी वर्णोंमें ब्राह्मणादि चार वर्ण तथा उन वर्णोंमें भी धर्मनिष्ठ व्यक्ति श्रेष्ठ हैं। इस लोकयात्राके मार्गमें स्थित जीवात्मा धर्मसे सभी प्रकारका सुख और ज्ञान प्राप्त करता है। हे पक्षिन्! गर्भस्थ जीवको अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान रहता है, वह वहाँ स्मरण करता है कि आयुके समाप्त होनेपर शरीरका परित्याग करके अब मैं मलादिमें रहनेवाले छोटे-छोटे कृमि या कीटाणुओंकी एक विशेष योनिमें स्थित हूँ, मैं सरककर चलनेवाले सर्पादिकी योनिमें पहुँचा, मच्छर हो गया था, चार पैरोंवाला अश्व या वृषभ नामक पशु बन गया था अथवा जंगली सूकरकी योनिमें प्रविष्ट था। इस प्रकार गर्भमें रहते हुए उस जीवात्माको पूर्ण ज्ञान रहता है, किंतु उत्पन्न होते ही वह तत्काल उसे भूल जाता है। गर्भमें पहुँचकर जो जीवात्मा चिन्तन करता है, शरीरधारी वैसा ही जन्म लेकर बालक, युवा और वृद्ध होता है। यदि गर्भमें सोची गयी बात सांसारिक व्यामोहके कारण विस्मृत हो जाती है तो पुनः मृत्युकालमें उसकी याद आ जाती है। यदि शरीरके नष्ट होनेपर वह हृदयमें ही रह गयी है तो पुनः गर्भमें जानेपर उसका स्मरण होना निश्चित है। उसे याद आता है कि मैं दूसरेको छलनेका विचार करता रहा। मैंने शरीरकी रक्षाके लिये धर्मका परित्याग करके द्यूत, छल-कपट और चोरवृत्तिका आश्रय लिया।

अत्यन्त कष्टसे मैंने स्वयं लक्ष्मीको एकत्र किया था, किंतु अभिलषित धनका उपभोग मैं नहीं कर सका। अग्निदेव, अतिथि और बन्धु-बान्धवोंको स्वादिष्ट अन्न, फल, गोरस तथा ताम्बूल दे करके मैं उन्हें संतुष्ट करनेमें असफल रहा। चन्द्रग्रहण हो या मेष-मकर राशियोंपर सूर्यके प्रवेशका पुण्यकाल हो, ऐसे अवसरपर भी श्रेष्ठ तीर्थोंका सेवन मैंने नहीं किया। इसलिये हे देहिन्! तुम मल-मूत्रसे भरे हुए अपने इस कोशको परिपुष्ट करनेमें लगे रहे। अतः तुम्हारा उद्धार कहाँ हो सकता है? इस पृथ्वीपर स्थित त्रिविक्रम भगवान् विष्णुकी प्रतिमाका दर्शन मैंने नहीं किया, उन्हें प्रणाम नहीं किया और न तो उनकी पूजा की है। प्रभासक्षेत्रमें विराजमान भगवान् सोमनाथकी भक्तिपूर्वक पूजा एवं वन्दना भी मेरे द्वारा नहीं हुई है। जब ऐसी चिंता मृत प्राणी करता है, तब यमदूत उससे कहते हैं कि हे देहधारिन्! जैसा तुमने किया है, उसके अनुसार अपना निस्तार करो। हे देहिन्! पृथ्वीके श्रेष्ठतम तीर्थोंकी संनिधिमें जाकर उनमें स्नानकर तुम्हारे द्वारा विद्वानों, ब्राह्मणों एवं गुरुजनोंके हाथमें कुछ नहीं दिया गया, अतः जैसा तुमने किया है, वैसा भोगो। हे जीव! तुमने चन्दन और नैवेद्यादि पञ्चोपचारसे और चन्दनादियुक्त बलि प्रदान करके मातृकापूजा नहीं की, न तो तुम्हारे द्वारा विष्णु,

प्रेतकल्प ] दुःखी गर्भस्थ जीवका विविध प्रकारका चिन्तन करना [ ५९३


शिव, गणेश, चण्डी अथवा सूर्यदेव ही पूजे गये हैं। अतः तुमने जो कर्म किया है, उसीमें अपना निर्वाह करो। हे देहिन्! तुम्हें तो देवत्व प्राप्त करने योग्य मानवयोनिकी प्राप्ति हुई थी, किंतु (लौकिक आसक्तिमें) मोहवश यह सब समास हो गया। विमूढ़बुद्धि तुमने अपनी गतिको नहीं देखा, इसलिये जो तुमने किया है, अब उसीमें निस्तार करो।

हे पक्षिन्! धर्म, अर्थ तथा यशको प्रदान करनेवाले, ऐसे पूर्वोक्त परलोकपथके पथिक जीवोंके पश्चात्ताप-वाक्यका विचार करके इस मनुष्यलोकमें जो धर्माचरण करते हुए पुण्य देशमें निवास करते हैं, वे इसी मनुष्यलोकमें जीवन्मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।

ऊपर किये हुए वर्णनके अनुसार विलाप करते हुए प्रेतको यमदूत अपने कालस्वरूप मुद्गरोंसे बहुत मारते हैं। वह ‘हा दैव! हा दैव!’ यह स्मरण करता हुआ अपनेको कोसते हुए कहता है कि तुमने अपनी कमायीसे जो धन अर्जित किया था, उसमेंसे किसीको दान नहीं दिया। पृथ्वीपर रहते हुए तुमने भूमिदान, गोदान, जलदान, वस्त्रदान, फलदान, ताम्बूलदान अथवा गन्धदान भी नहीं किया तो अब भला क्या सोच रहे हो? तुम्हारे पिता और पितामह मर गये, जिसने तुमको अपने गर्भमें धारण किया वह तुम्हारी माता भी मर गयी, तुम्हारे सभी बन्धु भी नहीं रहे, ऐसा तुमने देखा है। तुम्हारा पाञ्चभौतिक शरीर अग्निमें जलकर भस्म हो गया। तुम्हारे द्वारा एकत्र किया गया सम्पूर्ण धन-धान्य पुत्रोंने हस्तगत कर लिया। जो कुछ तुम्हारा सुभाषित है और जो कुछ तुमने धर्मसंचय किया है, वह तुम्हारे साथ है। इस पृथ्वीपर जन्म लेनेवाला राजा हो अथवा संन्यासी या कोई श्रेष्ठतम ब्राह्मण हो, वह मरनेके बाद पुनः आया हुआ नहीं दिखायी देता है। जो भी इस धरातलपर उत्पन्न हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। हे पक्षीन्द्र! दूतोंके सहित धर्मराजके पार्षद जब प्रेतसे इस प्रकारसे कहते हैं तो दुःखी वह प्रेत उन गणोंकी महान् आश्चर्यपूर्ण बातको सुनकर मनुष्यकी वाणीमें कहने लगता है—

जब दानके प्रभावसे व्यक्ति विमानपर आरूढ़ होता है, उस समय धर्म उसका पिता है, दया उसकी माता है, मधुर एवं अर्थगाम्भीर्ययुक्त वाणी उसकी पत्नी है और सुन्दर तीर्थमें किया गया स्नान उसका हितैषी बन्धु है। जब मनुष्य अपने हाथसे सुकृत करके उसको भगवान्के चरणोंमें अर्पित कर देता है, तब उसके लिये स्वर्ग किंकरकी भाँति हो जाता है। जो प्राणी धर्मनिष्ठ है वह अत्यन्त सुख-सुविधाओंको प्राप्त करता है और जो पापी है वह नाना दुःखोंका भोग करता है। जो धर्मशील, मान-सम्मान तथा क्रोधको जीतनेवाला, विद्या-विनयसे युक्त, दूसरेको कष्ट न देनेवाला, अपनी पत्नीमें संतुष्ट और परायी स्त्रीसे दूर रहनेवाला है, वह पृथ्वीपर हमारे लिये वन्दनीय है। जो मिष्टान्नदाता, अग्निहोत्री, वेदान्ती, हजारों चान्द्रायणव्रत करनेवाला, मासपर्यन्त उपवास रखनेमें समर्थ पुरुष तथा पतिव्रता नारी है—ये छः इस जीवलोकमें मेरे लिये वन्दनीय हैं। इस प्रकारका सम्यक् आचरण करते हुए जो मनुष्य वापी, कूप और जलसे पूर्ण तालाब बनवाता है, जो प्याऊ, जलकुण्ड, धर्मशाला तथा देवमन्दिरका निर्माण कराता है, वह उत्तम धर्म करनेवाला है। वेदज्ञ ब्राह्मणको दिया गया वर्षाशन, कन्याका विवाह, ऋणी ब्राह्मणकी ऋणमुक्ति, सुगमतासे बोयी-जोती जानेवाली भूमिका दान तथा प्याससे दुःखी प्राणियोंके लिये उसीके अनुकूल कूप, तड़ागादिका निर्माण ये ही सब सुकृत हैं।

शुद्ध भावसे जो प्राणी इस सुकृतसाररूप अध्यायको सुनता और पढ़ता भी है वह कुलीन है। वह धर्मनिष्ठ व्यक्ति मृत्युके बाद निश्चित ही उस अनन्त ब्रह्माण्डके एकमात्र आश्रय नारायणको प्राप्त करता है।

(अध्याय ४८)

५९४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड—

भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश, मनुष्य-योनिप्राप्तिकी दुर्लभताका वर्णन, मनुष्य-शरीर प्राप्तकर आत्मकल्याणके लिये सचेष्ट रहना, संसारकी दुःखरूपता तथा अनित्यता और ईश्वरकी नित्यताका वर्णन, कालके द्वारा सभीके विनाशका प्रतिपादन, सत्संग और विवेकज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति, तत्त्वज्ञानरूपी मोक्षप्राप्तिके उपाय, गरुडपुराणकी वक्तृ-श्रोतृपरम्परा तथा गरुडपुराणका माहात्म्य

गरुडने कहा— हे दयाके सागर! अज्ञानके कारण ही जीवकी उत्पत्ति इस संसारमें होती है, इस बातको मैंने सुन लिया। अब मैं मोक्षके सनातन उपायको सुनना चाहता हूँ। हे देवदेवेश! शरणागतवत्सल! प्रभो! सभी प्रकारके दुःखोंसे मलिन बनाये गये इस दुस्तर असार संसारमें नाना प्रकारके शरीरोंमें प्रविष्ट जीवोंकी अनन्त राशियाँ हैं। वे इसी संसारमें जन्म लेती हैं और इसीमें मर जाती हैं, किंतु उनका अन्त नहीं होता है। वे सदैव दुःखसे व्याकुल ही रहती हैं। यहाँ कहीं कोई भी सुखी नहीं है। हे मोक्षदाता स्वामिन्! वे किस उपायसे मुक्त हो सकते हैं? उसको आप मुझे बतानेकी कृपा करें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे तार्क्ष्य! जो तुम मुझसे पूछ रहे हो, जिसको सुनने मात्रसे ही मनुष्य इस संसारके आवागमनके चक्रसे मुक्त हो जाता है, उसे मैं कह रहा हूँ; तुम सुनो।

हे खगेश! इस जगत्से परे परब्रह्मस्वरूप, निरवयव, सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सर्वेश, निर्मल, अद्वय-तत्त्व, स्वयंप्रकाश, आदि-अन्तसे रहित, विकारशून्य, परात्पर, निर्गुण और सच्चिदानन्द शिव हैं, उसीके अंश ये जीव हैं। जो अनादि अविद्यासे वैसे ही आच्छादित हैं, जैसे अग्निमें उसके अंश विस्फुलिङ्ग स्थित हैं। अनादि कर्मोंके प्रभावसे प्राप्त शरीरादि नाना उपाधियोंमें होनेके कारण परस्पर भिन्न-भिन्न हो गये हैं, सुख-दुःख प्रदान करनेवाले पुण्य और पापोंका उनके ऊपर नियन्त्रण है। उसी कर्मके अनुसार उन्हें जाति, देह, आयु तथा भोगकी प्राप्ति होती है। सूक्ष्म या लिङ्ग शरीरके बने रहनेतक पुनः-पुनः जन्म-मरणकी परम्परा चलती रहती है।

स्थावर, कृमि, पक्षी, पशु, मनुष्य, धार्मिक, देवता और मुमुक्षु यथाक्रम चार प्रकारके शरीरोंको धारण करके हजारों बार उनका परित्याग करते हैं। यदि पुण्य कर्मके प्रभावसे उनमेंसे किसीको मानवयोनि मिल जाय तो उसे ज्ञानी बनकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिये। चौरासी लाख योनियोंमें स्थित जीवात्माओंको बिना मानवयोनि मिले तत्त्वज्ञानका लाभ नहीं मिल सकता है। इस मृत्युलोकमें हजार ही नहीं, करोड़ों बार जन्म लेनेपर भी जीवको कदाचित् ही संचित पुण्यके प्रभावसे मानवयोनि मिलती है। यह मानवयोनि मोक्षकी सीढ़ीके समान है। इस दुर्लभ योनिको प्राप्त कर जो प्राणी स्वयं अपना उद्धार नहीं करता है, उससे बढ़कर पापी इस जगत्में दूसरा कौन हो सकता है—

सोपानभूतं मोक्षस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम्।
यस्तारयति नात्मानं तस्मात् पापपरोऽत्र कः॥
(४९।१५)

अन्य योनियोंसे भिन्न सुन्दर-सुन्दर इन्द्रियोंवाले

२६३- भगवान् श्रीहरिकी महिमा तथा उनके सर्वेश्वरत्वका प्रतिपादन, श्रीहरिको श्रीमद्भागवत, विष्णु तथा गरुड—ये तीन पुराण विशेष प्रिय हैं, इनका निरूपण तथा गरुडपुराणका माहात्म्य

प्रेतकल्प] भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश ५१५


इस जन्मका लाभ लेकर जो मनुष्य आत्महितका ज्ञान नहीं रखता है, वह ब्रह्मघाती है। किसीका भी पुरुषार्थ शरीरके बिना सम्भव नहीं है। अतः शरीररूपी धनकी रक्षा करते हुए पुण्य कर्म करना चाहिये। आत्मा सभीका पात्र है, इसलिये उसकी रक्षामें मनुष्य सर्वदा संलग्न रहे। जो व्यक्ति आजीवन उस आत्माकी रक्षामें प्रयत्नशील रहता है, वह जीवित रहते हुए ही अपना कल्याण देखता है। मनुष्यको ग्राम, क्षेत्र, धन, घर, शुभाशुभ कर्म और शरीर बार-बार नहीं प्राप्त होता है। विद्वान् लोग सदैव शरीरकी रक्षाके उपायमें लगे रहते हैं। कुष्ठादि महाभयंकर रोगोंसे ग्रस्त होनेपर भी मनुष्य उस शरीरको छोड़ना नहीं चाहता है। शरीरकी रक्षा धर्मके लिये, धर्मकी रक्षा ज्ञानके लिये और ज्ञानकी रक्षा ध्यानयोगके लिये तथा ध्यानयोगकी रक्षा तत्काल मुक्तिप्राप्तिके लिये होती है। यदि आत्मा ही अहितकारी कार्योंसे अपनेको दूर करनेमें समर्थ नहीं हो सकता है तो अन्य दूसरा कौन ऐसा हितकारी होगा जो आत्माको सुख प्रदान करेगा।

यहीं इसी लोकमें नरकरूपी व्याधिकी चिकित्सा नहीं की गयी तो औषधिविहीन देश (परलोक)-में जाकर रोगी उससे मुक्तिका क्या उपाय करेगा ? बुढ़ापा तो बाघिनके समान है। जिस प्रकारसे फूटे हुए घड़ेका जल धीरे-धीरे बह जाता है, उसी प्रकार आयु भी क्षीण होती रहती है। शरीरमें विद्यमान रोग शत्रुके सदृश कष्ट देते हैं, इसलिये कल्याण इसीमें है कि इन सभीसे मुक्ति प्राप्त करनेका सत्प्रयास किया जाय। जबतक शरीरमें किसी प्रकारका दुःख नहीं होता है, जबतक विपत्तियाँ सामने नहीं आती हैं और जबतक शरीरकी इन्द्रियाँ शिथिल नहीं पड़ती हैं, तबतक ही आत्मकल्याणका प्रयास हो सकता है। जबतक यह शरीर स्वस्थ है, तबतक ही तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये सम्यक् प्रयत्न किया जा सकता है। कोशागारमें आग लग जानेपर मूर्ख कुआँ खोदता है, ऐसे प्रयत्नसे क्या लाभ—

इहैव नरकव्याधेश्चिकित्सां न करोति यः।
गत्वा निरौषधं देशं व्याधिस्थः किं करिष्यति ॥
व्याघ्रीवास्ते जरा चायुर्याति भिन्नघटाम्बुवत्।
निघ्नन्ति रिपुवद्रोगास्तस्माच्छ्रेयः समभ्यसेत् ॥
यावन्नाश्रयते दुःखं यावन्नायान्ति चापदः।
यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावच्छ्रेयः समभ्यसेत् ॥
यावत् तिष्ठति देहोऽयं तावत् तत्त्वं समभ्यसेत्।
संदीप्तकोशभवने कूपं खनति दुर्मतिः॥
(४९। २३—२६)

मनुष्य नाना प्रकारके सांसारिक कार्योंमें व्यस्त रहनेसे (बीतते हुए) समयको नहीं जान पाता है। वह दुःख-सुख तथा आत्महितको भी नहीं जानता है। पैदा होनेवालोंको, रोगियोंको, मरनेवालेको, आपत्तिग्रस्तको और दुःखी लोगोंको देखकर भी मनुष्य मोहरूपी मदिराको पीकर (जन्म-मरणादि दुःखसे युक्त संसारसे) नहीं डरता। सम्पदाएँ स्वप्नके समान हैं, यौवन पुष्पके सदृश है, आयु चञ्चल बिजलीके तुल्य नष्टप्राय है, ऐसा जानकर भी किसको धैर्य हो सकता है ? सौ वर्षका जीवन अत्यल्प है। वह भी निद्रा तथा आलस्यमें आधा चला जाता है। तदनन्तर बाल्यावस्था, रोग, वृद्धावस्था एवं अन्यान्य दुःखोंमें व्यतीत हो गया और जो थोड़ा बचा वह भी निष्फल हो जाता है—

कालो न ज्ञायते नानाकार्यैः संसारसम्भवैः।
सुखं दुःखं जनो हन्त न वेत्ति हितमात्मनः॥
जातानार्तीं मृतानापदभ्रष्टान् दृष्ट्वा च दुःखितान्।
लोको मोहसुरां पीत्वा न बिभेति कदाचन॥
सम्पदः स्वप्नसंकाशा यौवनं कुसुमोपमम्।
तडिच्चपलमायुष्यं कस्य स्याज्जानतो धृतिः॥
शतं जीवितमत्यल्पं निद्रालस्यैस्तदर्धकम्।
बाल्यरोगजरादुःखैरल्पं तदपि निष्फलम्॥
(४९। २७—३०)

२६४- गरुडजीको श्रीकृष्णद्वारा भगवान् विष्णुकी महिमा बताना तथा प्रलयकालके अन्तमें योगनिद्रामें शयन कर रहे उन भगवान् विष्णुको सृष्टि-हेतु अनेक प्रकारकी स्तुति करते हुए जगाना

५९६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

जिस कार्यको तुरंत आरम्भ कर देना चाहिये, उसके संदर्भमें जो उद्योगहीन होकर बैठा है, जहाँ जागते रहना चाहिये, वहाँ जो सोता रहे तथा भयके स्थानपर जो आश्वस्त होकर रहता है—ऐसा वह कौन मनुष्य है, जो मारा नहीं जाता ? जलके फेनके समान इस शरीरको आक्रमण करके जीव स्थित है, यहाँ जिन प्रिय वस्तुओंके साथ संनिवास है, वे अनित्य हैं। अतः जीव कैसे निर्भय होकर नितान्त अनित्य, शरीर, भोग और पुत्र-कलत्रादिके साथ रहता है। जो अहितमें हित, अनिश्चितमें निश्चित और अनर्थमें अर्थको विशेष रूपसे जाननेवाला है, वह व्यक्ति अपने मुख्य प्रयोजनको नहीं जानता। जो देखते हुए भी गिर जाता है, जो सुनते हुए भी सद्-ज्ञानको नहीं प्राप्त कर पाता है, जो सद्ग्रन्थोंको पढ़ते हुए भी उसे नहीं समझ पाता है, वह देवमायासे विमोहित है—

प्रारब्धव्ये निरुद्योगी जागर्तव्ये प्रसुप्तकः।
विश्वस्तश्च भयस्थाने हा नरः को न हन्यते॥
तोयफेनसमे देहे जीवेनाक्रम्य संस्थिते।
अनित्यप्रियसंवासे कथं तिष्ठति निर्भयः॥
अहिते हितसंज्ञः स्यादध्रुवे ध्रुवसंज्ञकः।
अनर्थे चार्थविज्ञानः स्वमर्थं यो न वेत्ति सः॥
पश्यन्नपि प्रस्खलति शृण्वन्नपि न बुध्यति।
पठन्नपि न जानाति देवमायाविमोहितः॥
(४९। ३१—३४)

कालके इस गहरे महासागरमें यह सम्पूर्ण जगत् डूबता-उतराता रहता है। मृत्यु, रोग और बुढ़ापारूपी ग्राहोंसे जकड़े जानेपर भी किसी व्यक्तिको ज्ञान नहीं हो पाता है। मनुष्यके लिये प्रतिक्षण भय है, समय बीत रहा है, किंतु वह उसी प्रकार दिखायी नहीं देता है, जैसे जलमें पड़ा हुआ कच्चा घड़ा गलता हुआ दिखायी नहीं देता। कदाचित् वायुको बाँधकर रखा जा सकता है, आकाशका खण्डन हो सकता है, तरंगोंको किसी सूत्रादिमें पिरोया जा सकता है; किंतु आयुमें विश्वास नहीं किया जा सकता है। जिसके (प्रलयाग्निके) प्रभावसे पृथ्वी दहकती है, सुमेरु पर्वत विशीर्ण हो जाता है तथा सागरका जल सूख जाता है। फिर इस शरीरके सम्बन्धमें तो बात ही क्या ? पुत्र मेरा है, स्त्री मेरी है, धन मेरा है, बन्धु-बान्धव मेरे हैं। इस प्रकार 'में, में' चिल्लाते हुए बकरेकी भाँति कालरूपी भेड़िया बलात् मनुष्यको मार डालता है—

तन्निमज्जज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे।
मृत्युरोगजराग्राहैर्न कश्चिदपि बुध्यते॥
प्रतिक्षणभयं कालः क्षीयमाणो न लक्ष्यते।
आमकुम्भ इवाम्भःस्थो विशीर्णो न विभाव्यते॥
युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्य च खण्डनम्।
ग्रथनञ्च तरङ्गाणामास्था नायुषि युज्यते॥
पृथिवी दह्यते येन मेरुश्चापि विशीर्यते।
शुष्यते सागरजलं शरीरस्य च का कथा॥
अपत्यं मे कलत्रं मे धनं मे बान्धवाश्च मे।
जल्पन्तमिति मर्त्याजं हन्ति कालवृको बलात्॥
(४९। ३५—३९)

यह मैंने किया है, यह मुझे करना है, यह किया गया है या नहीं किया गया है—इस प्रकारकी भावनासे युक्त मनुष्यको मृत्यु अपने वशमें कर लेती है। कल किये जानेवाले कार्यको आज ही कर लेना चाहिये। जो दोपहरके बाद करना है, उसको दोपहरसे पहले ही कर लेना चाहिये, क्योंकि कार्य हो गया है अथवा नहीं हुआ है, इसकी मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती। वृद्धावस्था पथ-प्रदर्शक है, अत्यन्त भयंकर रोग सैनिक है, मृत्यु शत्रु है, ऐसी विषम परिस्थितिमें फँसा हुआ मनुष्य अपने रक्षक भगवान् विष्णुको क्यों नहीं देखता है। तृष्णारूपी सूईसे छिद्रित, विषयरूपी घृतमें डूबे, राग-द्वेषरूपी अग्निकी आँचमें पकाये गये मानवको मृत्यु खा लेती है। बालक, युवा, वृद्ध और गर्भमें स्थित सभी प्राणियोंको मृत्यु अपनेमें समाहित कर लेती है, ऐसा है यह जगत्। यह जीव अपने शरीरको भी छोड़कर यमलोक चला जाता है तो भला स्त्री, माता-पिता और पुत्रादिका जो सम्बन्ध है, वह किस

प्रेतकल्प ] भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश ५९७


कारणसे प्रेरित होकर बनाया गया है। संसार दुःखका मूल है, वह किसका होकर रहा है अर्थात् इसकी ओर जिसका मन अधिक रम गया है, वही दुःखित है। जिसने इस सांसारिक व्यामोहका परित्याग कर दिया है, वह सुखी है। उसके अतिरिक्त कहींपर भी अन्य कोई दूसरा सुखी नहीं है—

इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत्कृताकृतम्।
एवमीहासमायुक्तं कृतान्तः कुरुते वशम्॥
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्रिकम्।
न हि मृत्युः प्रतीक्षेत कृतं वाप्यथ वाऽकृतम्॥
जरादर्शितपन्थानं प्रचण्डव्याधिसैनिकम्।
अधिष्ठितो मृत्युशत्रुं त्रातारं किं न पश्यति॥
तृष्णासूचीविनिर्भिन्नं सिक्तं विषयसर्पिषा।
रागद्वेषानले पक्वं मृत्युरश्नाति मानवम्॥
बालांश्च यौवनस्थांश्च वृद्धान् गर्भगतानपि।
सर्वानविशते मृत्युरेवम्भूतमिदं जगत्॥
स्वदेहमपि जीवोऽयं मुक्त्वा याति यमालयम्।
स्त्रीमातृपितृपुत्रादिसम्बन्धः केन हेतुना॥
दुःखमूलं हि संसारः स यस्यास्ति स दुःखितः।
तस्य त्यागः कृतो येन स सुखी नापरः क्वचित्॥
(४९।४०–४६)

यह जगत् सभी दुःखोंका जनक, समस्त आपदाओंका घर तथा सब प्रकारके पापोंका आश्रय है। अतः क्षणभरमें ही मनुष्यको इसका त्याग कर देना चाहिये। लौह और काष्ठके जालमें फँसा हुआ पुरुष मुक्त हो सकता है; किंतु पुत्र एवं स्त्रीके मोहजालमें फँसा हुआ वह कभी मुक्त नहीं हो सकता। मनुष्य मनको प्रिय लगनेवाले जितने पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध स्थापित करता जाता है, उतनी शोककी कीलें उसके हृदयमें चुभती जाती हैं। विषयका आहार करनेवाले देहस्थित तथा सभी प्रकारके अशेष सामर्थ्यसे वञ्चित कर देनेवाले जिन इन्द्रियरूपी चोरोंके द्वारा लोक विनष्ट हो रहे हैं। हाय, यह बड़े कष्टकी बात है। जैसे मांसके लोभमें फँसी हुई मछली बंसीके काँटेको नहीं देखती है, वैसे ही सुखके लालचमें फँसा हुआ शरीरी यमकी बाधाको नहीं देखता है—

प्रभवं सर्वदुःखानामालयं सकलापदाम्।
आश्रयं सर्वपापानां संसारं वर्जयेत् क्षणात्॥
लोहदारुमयैः पाशैः पुमान् बद्धो विमुच्यते।
पुत्रदारमयैः पाशैर्मुच्यते न कदाचन॥
यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान् मनसः प्रियान्।
तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशङ्कवः॥
वञ्चिताशेषवित्तैस्तैर्नित्यं लोको विनाशितः।
हा हन्त विषयाहारैर्देहस्थेन्द्रियतस्करैः॥
मांसलुब्धो यथा मत्स्यो लोहशंकुं न पश्यति।
सुखलुब्धस्तथा देही यमबाधां न पश्यति॥
(४९।४७–५१)

हे खगेश! अपने हित-अहितको न जानते हुए जो नित्य कुपथगामी हैं, जिनका लक्ष्य मात्र पेट भरना है, वे मनुष्य नारकीय प्राणी हैं। निद्रा, भय, मैथुन तथा आहारकी अभिलाषा सभी प्राणियोंमें समान रूपसे रहती है; उनमें ज्ञानीको मनुष्य और अज्ञानीको पशु माना गया है। मूर्ख व्यक्ति प्रातःकालमें मल-मूत्र, दोपहरमें भूख-प्यास तथा रातमें मैथुन और निद्रासे पीड़ित रहते हैं। बड़े दुःखकी बात है कि अज्ञानसे मोहित होकर सभी प्राणी अपने शरीर, धन एवं स्त्री आदिमें अनुरक्त होकर जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। अतः व्यक्तिको उनकी ओर बढ़ी हुई अपनी आसक्तिका परित्याग करना चाहिये। यदि आसक्ति छोड़ी न जा रही हो तो महापुरुषोंके साथ उस आसक्तिको जोड़ देना चाहिये, क्योंकि आसक्ति-रूपी व्याधिकी औषधि सज्जन पुरुष ही हैं—

हिताहितं न जानन्तो नित्यमुन्मार्गगामिनः।
कुक्षिपूरणनिष्ठा ये ते नरा नारकाः खग॥
निद्राभीमैथुनाहाराः सर्वेषां प्राणिनां समाः।
ज्ञानवान् मानवः प्रोक्तो ज्ञानहीनः पशुः स्मृतः॥