गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] वायुजय-निरूपण ३५७
ॐ माहेन्द्र्यै नमः'—इन मन्त्रोंद्वारा नैर्ऋत्यकोणमें समस्त संसारके सारभूत स्वरूप कपालिभैरव और देवी माहेन्द्रीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। उसके बाद साधकको 'ॐ जालन्धराय नमः, ॐ भीषणाय भैरवाय नमः, ॐ चामुण्डायै नमः'—इन मन्त्रोंसे वायुकोणमें जालन्धर, भीषणभैरव और देवी चामुण्डाका आवाहनपूर्वक पूजन करना चाहिये। तदनन्तर 'ॐ वटुकाय नमः, ॐ संहाराय नमः, ॐ चण्डिकायै नमः'—इन मन्त्रोंसे ईशानकोणमें वटुकदेव, संहारभैरव तथा देवी चण्डिकाका आवाहन करके उनकी पूजा करनी चाहिये।
इसके बाद साधकको रतिदेवी, प्रीतिदेवी, कामदेव और उनके पञ्चबाणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। इस प्रकार सदैव ध्यान, पूजा, जप तथा होम करनेसे देवी सिद्ध हो जाती हैं। नित्यक्लिन्ना, त्रिपुरभैरवी और ज्वालामुखी नामक देवियाँ समस्त व्याधियोंकी विनाशिका हैं। अब मैं ज्वालामुखीदेवीके पूजनका क्रम कहूँगा। पद्मके मध्य देवी ज्वालामुखीकी पूजा करनी चाहिये तथा पद्मके बाह्य दलोंमें क्रमशः—नित्या, अरुणा, मदनातुरा, महामोहा, प्रकृति, महेन्द्राणी, कलनाकर्षिणी, भारती, ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा, अपराजिता, विजया, अजिता, मोहिनी, त्वरिता, स्तम्भिनी, जृम्भिणी तथा देवी कालिकाकी पूजा करनी चाहिये। देवी ज्वालामुखीकी यथाविधि पूजा करनेसे विष आदि दोष दूर हो जाते हैं।
भैरवने पुनः कहा—चूडामणि-यन्त्रके द्वारा प्रश्नकर्ताको शुभ एवं अशुभ समयका परिज्ञान हो जाता है। (अध्याय १९८-१९९)
वायुजय-निरूपण
भैरवने कहा—हे देवि ! अब मैं जय-पराजय तथा विदेश-यात्राके शुभाशुभ मुहूर्तका संकेत देनेवाले 'वायुजय' नामक विद्याका वर्णन करूँगा।
वायु, अग्नि, जल और इन्द्रको माङ्गलिक चतुष्टयके नामसे जाना जाता है। प्रायः प्राणीके शरीरमें वायु अधिकतर वाम और दक्षिणभागकी नाड़ियोंसे प्रवाहित होता है। अग्नि शरीरमें ऊर्ध्वगामी होता है और जल अधोगामी। महेन्द्र तत्त्व शरीरके मध्यभागमें स्थित रहता है, किंतु शुक्लपक्षमें वह वामभाग तथा कृष्णपक्षमें दक्षिण-भागकी नाड़ियोंसे होकर शरीरमें प्रवाहित होता है। प्रत्येक पक्षका प्रारम्भिक तीन-तीन दिन इसका उदयकाल है। अर्थात् शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे लेकर तृतीया तिथितक जो वायु नासिकाके वाम छिद्रसे होकर प्रवहमान रहता है और कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे लेकर तृतीया तिथिपर्यन्त जो वायु नासिकाके दक्षिण छिद्रसे होकर प्रवहमान रहता है, वह उदयकालका वायु माना जाता है। यदि इस नियमके अनुसार वायुका प्रवाह होता है तो अच्छा होता है, किंतु विपरीत होनेपर पतन होता है। यदि प्राणीके शरीरमें वायु सूर्यमार्गमें उदित होकर चन्द्रमार्गमें अस्त हो तो गुणोंमें वृद्धि होती है। इसके विपरीत होनेपर शरीरमें विघ्न होता है।
हे वरानने ! दिन और रातमें सोलह संक्रान्तियाँ मानी गयी हैं। आधे-आधे प्रहरके बाद एक-एक संक्रान्तिका परिमाण है। इसी गतिसे शरीरमें प्रवहमान वायुका संक्रमण-काल आता है। जब वायु शरीरके अन्तर्गत आधे प्रहरके बाद ही संक्रान्त होने लगता है, अर्थात् आधे-आधे प्रहरमें वायुका भ्रमण होता है, तो स्वास्थ्यकी हानि अवश्यम्भावी है। भोजन और मैथुनकालमें दाहिने नासापुटसे वायु भ्रमण करे तो हितकर होता है। इस स्थितिमें हाथमें तलवार लेकर योद्धा युद्धमें यथेच्छ शत्रुओंको जीत सकता है। समस्त कार्योंमें यदि वाम नासापुटसे