भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 411

काण्ड ] सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि ४०१

वामपार्श्वमें दक्षिणाग्रकुशके ऊपर 'पितृभ्यः स्थानमसि' यह पढ़कर अधोमुख स्थापित करे।

इसके बाद पितामह-प्रपितामह आदिको गन्धादि देकर 'अग्नौकरणं'<sup></sup> करे तथा अवशिष्ट अन्नको प्रपितामह आदिके पात्रमें डाल दे। इसी प्रकार पितामहादिका पात्राभिमन्त्रणपर्यन्त कर्म सम्पन्नकर ब्राह्मणपात्राभिमन्त्रण, अंगुष्ठनिवेशन, तिल-विकरणपूर्वक 'अमुक गोत्र०' इत्यादि वाक्य कहकर घृताक्त अन्न आदिका निवेदन करे।

तत्पश्चात् देवादिक्रमसे ब्राह्मणके हाथमें जल प्रदान करे, यही 'अपोशन' विधि है। अतिथिके आनेपर अतिथिश्राद्ध करते हुए इस समय भी विकरणके लिये अन्न प्रदान करना चाहिये। पितामहादि ब्राह्मणसे 'ॐ स्वदितं भवद्भिः' से सुतृप्तिकी जिज्ञासा कर संतुष्टिका आश्वासन प्राप्त करे। 'अमुक गोत्र०' इत्यादि वाक्यसे पिण्डदान और 'पिण्डपात्रमच्छिद्रमस्तु' कहकर सभी कार्योंकी समाप्तिके बाद पिण्डके दो हिस्से कर 'ये समानाः समनसः०' आदि मन्त्रोंका पाठ करे और पितामह, वृद्धप्रपितामह-पिण्डके साथ पिताका पिण्ड मिला दे। पिण्डके ऊपर गन्धादि रखकर पिण्डचालन करना चाहिये। अतिथि और ब्राह्मणसे स्वदितादि (सुतृप्ति)-का प्रश्न करके ब्राह्मणोंको आचमन एवं ताम्बूल प्रदान करे।

तदनन्तर यजमान 'सुप्रोक्षितमस्तु', 'शिवा आपः सन्तु'—इन दो मन्त्रोंका उच्चारण करके वृद्धप्रपितामहादि-क्रमसे ब्राह्मणके हाथमें जल प्रदान करे और 'गोत्रस्याक्षय्यमस्तु' से पितृ-ब्राह्मणके हाथमें अक्षय्यदान करके 'उपत्तिष्ठताम्' आदि वाक्यसे सतिल जल देना चाहिये।

तत्पश्चात् 'अघोराः पितरः सन्तु' इस वाक्यका उच्चारण करनेपर ब्राह्मण 'अस्तु' इस वाक्यसे प्रतिवचन प्रदान करें एवं 'स्वधां वाचयिष्ये' इस पदका उच्चारण करनेपर ब्राह्मण 'ॐ वाच्यताम्' इस अनुज्ञा-वाक्यसे प्रत्युत्तर दें। 'पितामहादिभ्यः स्वधा उच्चताम्' इस प्रकार यजमानके कहनेपर 'अस्तु स्वधा' ऐसा ब्राह्मण बोलें। फिर 'पितृभ्यः स्वधा उच्चताम्' ऐसा कहकर आज्ञा प्राप्त करे।

तदनन्तर 'ॐ ऊर्जं वहन्ती०' इत्यादि मन्त्रसे दक्षिणाभिमुख होकर जलधारा दे, पुनः 'ॐ विश्वेदेवा अस्मिन् यज्ञे प्रीयन्ताम्' यह मन्त्र पढ़कर देवब्राह्मणके हाथमें यव और जल देकर 'ॐ देवताभ्यः०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करे। पिण्डपात्रोंको परिचालितकर आचमनपूर्वक पितामहादि-क्रमसे दक्षिणा दे। पितृ-ब्राह्मणसे 'आशिषो मे प्रदीयन्ताम्' इस वचनसे आशीर्वादकी प्रार्थना करे। ब्राह्मण 'प्रतिगृह्यन्ताम्' इस वाक्यसे प्रत्युत्तर प्रदान करें। पुनः 'दातारो नोऽभिवर्धन्ताम्०' आदि मन्त्रका पाठकर अर्घ्यपात्रको ऊर्ध्वमुख कर 'वाजे वाजे०' इत्यादि मन्त्रसे देवब्राह्मण एवं 'अभिरम्यताम्' इस मन्त्रसे पितृब्राह्मणका विसर्जन करना चाहिये।

हे व्यास! मैंने आपको सपिण्डीकरणश्राद्धका विधान बताया। श्राद्ध, श्राद्धकर्ता और श्राद्धफल—इन तीनोंको विष्णुरूप जानना चाहिये<sup></sup>

(अध्याय २२०)


१-अग्नौकरण—एक विशेष विधि है। इसमें अपसव्य होकर जलमें दो आहुति दी जाती है।
२-सपिण्डीकरणश्राद्धकी विस्तृत विधि श्राद्धपद्धतियोंसे जानना चाहिये। यहाँ संक्षिप्तरूपमें वर्णन है।