भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 415, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 415

काण्ड ] प्रायश्चित्तनिरूपण, चान्द्रायणादि विभिन्न व्रतोंके लक्षण तथा पञ्चगव्य-विधान ४०५

क्षत्रियको छः दिन और वैश्यको दो दिनका सान्तपनव्रत करना चाहिये। यदि प्रमादवश ब्राह्मण और चाण्डाल एक ही वृक्षके नीचे एक साथ फल खा लेते हैं तो वह ब्राह्मण एक दिन-रातके उपवाससे शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मण भोजनोपरान्त बिना आचमन इत्यादि किये चाण्डालका स्पर्श कर लेता है तो उसे आठ हजार गायत्री अथवा एक सौ 'द्रुपदादिव ०' मन्त्रका जप करना चाहिये। चाण्डाल अथवा श्वपचके द्वारा किये गये विष्ठा और मूत्रके स्पर्श हो जानेपर ब्राह्मणको तीन रातका उपवास करना चाहिये। द्विजको अन्त्यजकी स्त्रीके साथ गमन करनेपर पराकव्रत करना चाहिये। परस्त्रीके साथ बिना कामनाके गमन करनेपर पराकव्रत करना चाहिये।

जो द्विज मद्यादिसे अशुद्ध पात्रमें रखे हुए जलका पान करता है, वह कृच्छ्रपादव्रत तथा पुनः संस्कारसे शुद्ध होता है। जो ब्राह्मण वज्र (विद्युत्)-पात अथवा अग्नि, वायुके कारण अकस्मात् उत्पन्न उपद्रवसे ग्रस्त होनेके कारण अपना घर छोड़ने तथा अन्नपानादिको लेकर किसी अन्त्यजके घरमें रहनेके लिये विवश होते हैं तो उन्हें तीन कृच्छ्र और तीन चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। मुनि वसिष्ठने तो उक्त निषिद्ध कर्म करनेपर ब्राह्मणके लिये पुनः जातकर्मादि संस्कारोंके द्वारा शुद्ध होनेका विधान बताया है। कोई स्वयं उच्छिष्ट (भोजनके बाद मुख एवं हाथका प्रक्षालन नहीं किया) है, उसके उच्छिष्ट (भोजन करनेके बाद शेष अन्न)-का भक्षण करनेपर अथवा कुत्ते या शूद्रसे स्पृष्ट सिद्ध अन्नका भक्षण करनेपर द्विज एक दिन-रात्रिपर्यन्त उपवास तथा पञ्चगव्यप्राशनसे शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मण किसी वर्णबहिष्कृत व्यक्तिके द्वारा छू लिया जाता है तो उसे पाँच रात्रियोंका उपवास करना चाहिये। अविच्छिन्नगतिसे गिरनेवाली जलधारा, वायुके झोंकोंसे उड़ायी गयी धूलिके कण, स्त्री, बालक और वृद्ध कभी दूषित नहीं होते। स्त्रियोंका मुख, पक्षियोंके द्वारा गिराया गया फल, प्रसवकालमें बछड़ा तथा हरिणका शिकार करते समय कुत्ता सदैव पवित्र रहता है। जलमें रहनेवाली वस्तु जलमें और स्थलमें पायी जानेवाली वस्तु स्थलमें अपवित्र नहीं होती है। धार्मिक कृत्य करते समय पैरका स्पर्श हो जानेपर द्विज आचमनद्वारा शुद्ध हो जाता है।

जिस कांस्यपात्रमें मदिरा नहीं लगी है, यदि वह अन्य किसी कारणसे अपवित्र हो गया हो तो पवित्र भस्मके द्वारा माँजे जानेपर शुद्ध हो जाता है। मूत्र या मदिराके द्वारा अशुद्ध पात्रको अग्निमें डालकर शुद्ध किया जा सकता है। गौके द्वारा सूँघे गये, शूद्रके द्वारा छुए गये तथा कौए और कुत्तेके द्वारा जूठे किये गये कांस्यपात्र दस बार शुद्ध भस्मसे माँजनेपर शुद्ध होते हैं। जो ब्राह्मण शूद्रके पात्रमें भोजन कर लेता है, वह तीन दिनतक उपवास रखकर पञ्चगव्य-पान करनेसे शुद्ध होता है। जो ब्राह्मण उच्छिष्ट पदार्थ या उच्छिष्ट प्राणीका स्पर्श करता है अथवा कुत्ते या शूद्रका स्पर्श करनेसे अपवित्र हो गया हो, वह भी तीन दिनके उपवास और पञ्चगव्यके पानसे शुद्ध हो जाता है। रजस्वला स्त्रीका स्पर्श करनेपर उपवास करके पञ्चगव्य-पान करनेसे शुद्धि होती है। जलरहित प्रदेश, चोर और हिंसक व्याघ्रादि जीवोंसे परिव्याप्त मार्गमें किसी अशुद्ध होनेयोग्य द्रव्यको हाथमें लिये हुए यदि मल, मूत्रका परित्याग किया जाता है तो वह द्रव्य अशुद्ध नहीं होता है। भूमिपर उस द्रव्यको रखकर शौच कर्म करना चाहिये।

काँजी, दही, दूध, मट्ठा, कृसरान्न शूद्रसे भी ग्राह्य है। मधु अन्त्यजसे भी ग्रहण किया जा सकता है। जो ब्राह्मणादि गुड़ की बनी हुई, पीठीकी बनी